
भारत में त्योहारी मौसम की दस्तक होने वाली है लेकिन त्योहार में मुंह मीठा करने वाली चीनी की कीमतें आपका कड़वा कर सकती है. भारत में चीनी की खुदरा कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं. त्योहारी सीजन शुरू होने से पहले ही चीनी महंगी हो रही है, जबकि इस दौरान मिठाइयों और खाद्य पदार्थों में चीनी की मांग आमतौर पर काफी बढ़ जाती है.
बीते एक महीने में ही चीनी की कीमतों में 13% की बढ़ोतरी हुई है और बीते एक साल में 16% से ज्यादा चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है. चीनी की किल्लत की स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसी रायटर्स की रिपोर्ट कहती है कि दुनिया के बड़े चीनी निर्यातकों में शामिल भारत अब चीनी आयात करने पर विचार कर रहा है. हालांकि सरकार की और से इस बात की औपचारिक पुष्टि नहीं की गई है और ना ही औपचारिक रूप से सरकार ने इन खबरों का खंडन किया है.
महाराष्ट्र के कोल्हापुर में थोक चीनी की कीमत अगस्त की शुरुआत से करीब 20% बढ़कर 5,350 रुपये प्रति 100 किलो के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है. केंद्रीय उपभोक्ता मंत्रालय के दैनिक कीमत मॉनिटरिंग में 19 अगस्त को दिल्ली में चीनी की कीमत 58 रुपये प्रति किलो पहुंच गई जबकि एक साल पहले चीनी की कीमत 45 रुपये थी, मुंबई में चीनी की कीमत 54 रुपये प्रति किलो तो कोलकाता में 59 रुपये प्रति किलो, चेन्नई में 58 रुपये प्रति किलो तो रांची में 61 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है.
अगर कुछ दिनों में देश में गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली की धूम होगी और ऐसे में चीनी की मांग बढ़ेगी और ऐसी हुआ तो चीनी की कमी त्योहारों के दौरान महंगाई को और बढ़ा सकती है.
विशेषज्ञों का कहना है कि मुख्य समस्या चीनी की उपलब्धता में कमी है. Prof Bejon Mishra कहते हैं कि डिमांड सप्लाई बड़ी वजह है. कुछ लोग मुनाफाखोरी कर रहे हैं. किसानों को कीमत बढ़ने से फायदा नहीं होता लेकिन बिचौलियों को मुनाफा हो रहा है. चीनी की पैदावार पर आंकड़ा नहीं है कि कितने किसान चीनी की पैदावार छोड़कर स्विच कर रहे हैं, इसलिए एक विश्वसनीय डाटा की जरूरत है.
केंद्रीय कृषि मंत्रालय का डेटा इस कयास को नकार रहा है. सरकार का दावा है कि गन्ने के उत्पादन में बढ़ोतरी हुई है. सरकार के मुताबिक साल 2024-25 में कुल गन्ने का उत्पादन 4546.11 लाख टन रहा तो वहीं साल 2025-26 में कुल गन्ने की पैदावार 5000.11 लाख टन संभावित है. यानी इस साल गन्ने की फ़सल में 454.52 लाख टन की वृद्धि है. हालांकि इस पर अभी विरोधाभास है क्योंकि प्राइवेट एजेंसियां गन्ने का उत्पादन कम होने का अनुमान जता रही हैं. ऐसे में जमाखोरी को दोषी ठहराया जा रहा है जिसने दाम में उछाल लाने का काम किया है.
केंद्र सरकार ने जमाखोरी रोकने के लिए 1 अगस्त से 30 नवंबर तक भंडारण सीमा तय की है और मिलों का फिजिकल वेरिफिकेशन कराया है. लेकिन इन उपायों से अभी तक कीमतें नहीं रुकीं. त्योहारी सीजन से पहले चीनी की जमाखोरी रोकने के लिए केंद्र सरकार ऐक्शन में आई है.
सितंबर 2026 से चीनी की स्टॉक लिमिट घटाकर 15 दिन कर दी गई. महीने में 10 मीट्रिक टन से ज्यादा चीनी इस्तेमाल करने वाले बड़े खरीदार 15 दिन से ज्यादा का स्टॉक नहीं रख सकेंगे. नियम 30 नवंबर 2026 तक लागू रहेगा. दायरे में कन्फेक्शनरी, सॉफ्ट ड्रिंक निर्माता, फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री, मिठाई विक्रेता शामिल हैं. इनकी पहचान पिछले 1 साल की औसत मासिक खपत के आधार पर होगी. चीनी मिलों से Bulk Consumers को सीधे या Dealers के जरिए होने वाली बिक्री की निगरानी होगी. GST Returns और चीनी के HSN Code के आधार पर बिक्री और खपत का वेरिफिकेशन किया जाएगा.
केंद्र/राज्य सरकार, UT प्रशासन और Local Bodies की संस्थाएं इस आदेश से बाहर रहेंगी. सरकार का मकसद चीनी की जमाखोरी रोकना, उपलब्धता बढ़ाना और कीमतों पर नियंत्रण रखना है. त्योहारी सीजन से पहले यह कदम अहम है, क्योंकि अगस्त-नवंबर में चीनी की मांग बढ़ती है और कीमतें हाल में रिकॉर्ड स्तर तक पहुंची हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि इसका एक बड़ा कारण है किसानों को गन्ने की पर्याप्त कीमत ना मिलना और एक हिस्सा चीनी बनाने के बजाय इथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल किया जाना है. प्रो बेजॉन मिश्रा कहते हैं कि एक आशंका है कि इथेनॉल पैदा करने के लिए बड़े बड़े दिग्गज मैदान में उतर गए हैं और बड़े किसान भी उतर गए हैं. बड़े किसान ज्यादा फायदे के लिए इथेनाल का रुख कर रहे हैं लेकिन छोटे किसानों को वो फायदा नहीं मिलेगा.
दरअसल भारत सरकार पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की नीति को बढ़ावा दे रही है और E20 लक्ष्य हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रही है. इसका मतलब है कि पेट्रोल में 20% तक इथेनॉल मिश्रण की दिशा में देश आगे बढ़ रहा है. इथेनाल बनाने के लिए गन्ने का इस्तेमाल किया जाता है. इसलिए बड़े किसान गन्ने का जो हिस्सा पहले चीनी बनाने में जाता था, उसका कुछ हिस्सा अब इथेनॉल उत्पादन की ओर जा रहा है.
ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन के अनुसार, 2025 के मध्य तक देश में लगभग 499 स्थानों पर इथेनॉल उत्पादन क्षमता करीब 1,822 करोड़ लीटर सालाना हो चुकी थी. इथेनॉल के कच्चे माल में लगभग 30–35% हिस्सा गन्ने का होता है. बाकी हिस्सा मुख्य रूप से मक्का और चावल से आता है.
भारत दुनिया में ब्राजील के बाद दूसरा सबसे बड़ा चीनी निर्यातक है. लेकिन घरेलू कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए सरकार ने पहले ही चीनी के निर्यात पर कई प्रतिबंध लगाए हैं. 2025-26 सीजन के लिए भारत ने करीब 20 लाख मीट्रिक टन चीनी निर्यात की अनुमति दी थी, जो 2021-22 में हुए 1.2 करोड़ टन से काफी कम है. इसके बाद 13 मई 2026 से 30 सितंबर तक चीनी निर्यात पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई. माना जा रहा है कि सरकार कथित तौर पर चीनी पर लागू 100% आयात शुल्क हटाने पर विचार कर रही है. इससे विदेशी चीनी भारत में आसानी से आ सकेगी और घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ सकती है.
मीठी चीनी की बढ़ती कीमतों पर कड़वी सियासत भी शुरू हो गई है. आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने सीधे केंद्र सरकार को घेरते हुए सवाल उठाया है कि तेल आयात पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा बचाने के लिए गन्ने से इथेनॉल बनाना शुरू किया लेकिन अब उससे चीनी कम हो गई है और अब उस विदेशी मुद्रा से चीनी आयात करेंगे.
उत्पादन में कमी, निर्यात और इथेनॉल उत्पादन के कारण सीजन के अंत में चीनी का स्टॉक रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचने की संभावना है. त्योहारी सीजन में मांग बढ़ने से कीमतें और बढ़ सकती हैं.