धान छोड़ने पर सब्सिडी, उगाने पर बोनस और इथेनॉल के लिए बंपर जोटा… कृषि नीति के विरोधाभासों की कहानी

धान छोड़ने पर सब्सिडी, उगाने पर बोनस और इथेनॉल के लिए बंपर जोटा… कृषि नीति के विरोधाभासों की कहानी

सरकार एक तरफ किसानों को धान छोड़कर कम पानी वाली फसलें अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है, तो दूसरी तरफ इथेनॉल के लिए चावल का कोटा बढ़ा रही है और कई राज्य धान पर भारी बोनस भी दे रहे हैं. आंकड़ों से समझिए इस 'गेम' की पूरी कहानी...

Paddy Farming Policy ConfusionPaddy Farming Policy Confusion
ओम प्रकाश
  • New Delhi,
  • Jul 18, 2026,
  • Updated Jul 18, 2026, 2:47 PM IST

ये तो वही बात हो गई कि एक तरफ आप आग बुझाने के लिए फायर ब्रिगेड बुला रहे हैं, और दूसरी तरफ खुद ही चुपके से उसमें पेट्रोल डाल रहे हैं. हमारी सरकार का भी धान और पानी को लेकर यही हाल है. मंच पर आकर नेताजी गला फाड़कर चिल्लाते हैं कि पानी बचाओ, धरती सूख रही है. इस चक्कर में तीन-तीन राज्य सरकारें किसानों के आगे हाथ जोड़ रही हैं कि भैया, धान मत उगाओ, बदले में हमसे नकद पैसे ले लो. लेकिन जैसे ही दिल्ली के बंद कमरों में फाइलें खुलती हैं, वही सरकार गाड़ियों के ईंधन इथेनॉल के लिए चावल का कोटा और बढ़ा देती है. यानी पानी सोखने वाली फसल की मांग खुद ही बढ़ा रही है. कसर बची थी तो चुनाव आते ही कुछ सरकारें धान पर भारी-भरकम बोनस का लालच देकर किसानों को दोबारा उसी दलदल में खींच लेती हैं. पानी और रोटी जैसे गंभीर मुद्दे पर सरकार का ऐसा भयंकर कन्फ्यूजन. यह अफसरों का पागलपन है, या फिर आम जनता की प्यास और किसानों की जिंदगी की कीमत पर वोट बैंक और बड़ी कंपनियों की तिजोरी भरने का कोई बहुत बड़ा डबल गेम?

नीतियों के विरोधाभास का यह कैसा भंवर है? जो सरकार आए दिन एक देश-एक विधान, वन नेशन-वन राशन कार्ड और वन नेशन-वन इलेक्शन का राष्ट्रव्यापी ज्ञान बांटते नहीं थकती, वो देश की सबसे बुनियादी जरूरत यानी अन्न और पानी की नीति पर इतनी भयंकर कंफ्यूज कैसे हो सकती है? आइए, आंकड़ो के आईने में इस 'सरकारी कन्फ्यूजन' की परतों को सिलसिलेवार तरीके से उधेड़ते हैं.

यह जश्न का विषय है या गहरी चिंता का?

सरकारी तंत्र अक्सर इस बात की पीठ थपथपाता है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक और निर्यातक बन गया है. लेकिन खेती और पर्यावरण के जानकारों के लिए यह जश्न का नहीं, बल्कि गहरी चिंता का विषय है. हकीकत यह है कि भारत दुनिया को सिर्फ चावल नहीं बेच रहा, बल्कि चावल के दानों के रूप में अपने देश का अमूल्य जमीनी पानी कौड़ियों के दाम विदेशों में भेज रहा है. 

एक किलो चावल उगाने में लगभग 3,000 से 5,000 लीटर पानी पाताल से खींच लिया जाता है. पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का पाताल धान की इस अंधी दौड़ के कारण पूरी तरह 'डार्क जोन' बन चुका है. ऐसे में जिस फसल ने देश के पानी का गला घोंट दिया हो, उसके उत्पादन में नंबर वन होने का ढोल पीटना नीतिगत दिवालियापन नहीं तो और क्या है?

इथेनॉल का महा-झोल

इस पूरे खेल का सबसे हैरान करने वाला और पोल खोलने वाला हिस्सा है देश का 'इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम. जब इस योजना की शुरुआत हुई थी, तो सरकार ने सीना ठोक कर वादा किया था कि वह मक्के और अन्य कम पानी वाली फसलों से इथेनॉल बनवाएगी, ताकि किसान धान का मोह छोड़ें और खेती का ढर्रा बदले. लेकिन पर्दे के पीछे की हकीकत बिल्कुल उलट निकली.

सरकार ने मक्के जैसी पर्यावरण-अनुकूल फसलों को किनारे लगा दिया और निजी डिस्टिलरी लॉबी की तिजोरियां भरने के लिए भारतीय खाद्य निगम के कोटे से इथेनॉल बनाने के लिए चावल का आवंटन पिछले साल के 52 लाख टन से भारी-भरकम बढ़ाकर सीधे 72 लाख टन कर दिया.

यह दिमाग चकराने वाला कन्फ्यूजन है?

सरकार तीन राज्यों-हरियाणा, पंजाब और छत्तीसगढ़ की सरकारें धान की खेती छोड़ने वाले किसानों को पैसे दे रही है. पंजाब में प्रति एकड़ 7000, हरियाणा में 8000 और छत्तीसगढ़ में 15000 रुपये देने का प्रावधान है, ताकि धान की खेती कम हो और भू-जल स्तर ठीक हो. 

दूसरी तरफ इथेनॉल कंपनियों के लिए उसी पानी पीने वाली फसल से निकले चावल का कोटा बढ़ाकर रिकॉर्ड 72 लाख टन कर दिया गया है. अगर सरकार को हर साल लाखों टन चावल गाड़ियों की टंकियों में ही फूंकना है, तो फिर किसानों को पानी बचाने का उपदेश देने का नाटक क्यों किया जा रहा है?

पैसे देकर धान छुड़वा रहे, बोनस देकर लालच बढ़ा रहे

कन्फ्यूजन का तीसरा सिरा राज्य सरकारों के राजनीतिक पाखंड से जुड़ा है. इसमें डबल इंजन वाली सरकारें भी शामिल हैं. केंद्र सरकार कहती है कि वह खेती के पैटर्न में बदलाव चाहती है. लेकिन इसी तंत्र की राज्य सरकारें अपने राजनीतिक मुनाफे और वोट बैंक के लिए केंद्र की ही मंशा की धज्जियां उड़ा रही हैं. एक तरफ केंद्र पानी बचाने की गुहार लगा रहा है, वहीं दूसरी तरफ राज्य सरकारें धान की एमएसपी (MSP) के ऊपर भारी-भरकम बोनस बांटने की होड़ में चुकी हैं.

कहां क‍ितना है धान पर बोनस

खरीफ मार्केटिंग सीजन (KMS) 2025-26 के ल‍िए केंद्र सरकार ने सामान्य धान का MSP 2,369 और ग्रेड-A धान का एमएसपी 2,389 प्रति क्विंटल तय किया.

  • तेलंगाना में राज्य सरकार ने 'फाइन राइस' (बारीक धान) की किस्मों पर 500 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस दिया. इस तरह यहां पर ए ग्रेड के धान की कीमत 2,889 प्रति क्विंटल हो गई.
  • छत्तीसगढ़ में बोनस सह‍ित धान की खरीद 3,100 प्रति क्विंटल की दर से हो रही है. यहां सरकार ने सामान्य धान पर 731 और ग्रेड ए धान पर 711 रुपये का बोनस द‍िया.
  • तमिलनाडु सरकार ग्रेड-A धान पर 156 और सामान्य धान पर 131 रुपये का बोनस दे रही. इस तरह यहां पर ग्रेड ए धान का सरकारी दाम 2,545 और सामान्य धान का 2,500 रुपये प्रत‍ि क्व‍िंटल है.
  • ओडिशा सरकार ने धान की खरीद पर 800 प्रति क्विंटल का भारी बोनस देने का ऐलान क‍िया. यह इनपुट सब्सिडी के तौर पर द‍िया जा रहा है. यहां पर सामान्य धान की सरकारी कीमत 3,169 और ग्रेड-A धान का दाम 3,189 रुपये प्रत‍ि क्विंटल हो गया है.
  • केरल में धान पर 631 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस है. इस तरह यहां सामान्य धान का सरकारी दाम 2,369 एमएसपी और 631 रुपये का बोनस म‍िलाकर 3,000 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है.
  • बोनस के अलावा, केरल में धान के खेत मालिकों को अपनी भूमि को धान के खेत के रूप में बनाए रखने के लिए 3,000 रुपये प्रति हेक्टेयर की रॉयल्टी और खाद-बीज के लिए 5,000 रुपये प्रति हेक्टेयर की मदद अलग से दी जाती है.

कन्फ्यूजन का सिरा समझिए

जब एक किसान को यह दिख रहा है कि धान उगाने पर बिना किसी रिस्क के उसे 3,100 रुपये प्रति क्विंटल का भाव और सुनिश्चित सरकारी बाजार मिल रहा है, तो वह पागल नहीं है क‍ि वो थोड़ी से पैसे के लालच में जोखिम उठाए और मक्का या त‍िलहन फसल उगाए, जिनकी 100 फीसदी सरकारी खरीद की कोई गारंटी ही नहीं है. सरकार एक हाथ से धान छुड़ाने का पैसा फेंक रही है, और दूसरे हाथ से धान उगाने का लालच दे रही है.

बहरहाल, चावल से संबंध‍ित यह नीतियां किसी कन्फ्यूजन या नासमझी में नहीं बनाई गई हैं. बल्कि इन्हें प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर बेहद सुनियोजित तरीके से तैयार किया गया लगता है. इसका मकसद कंपन‍ियों को सस्ता कच्चा माल देकर इथेनॉल का मुनाफा बढ़ाना और चुनाव वाले राज्यों में लोक-लुभावन बोनस बांटकर वोट बैंक सुरक्षित करना प्रतीत होता है. लेक‍िन, इस पूरे खेल में अगर कोई ठगा जा रहा है, तो वह है इस देश का पर्यावरण, आने वाली पीढ़ियों का पानी और वह आम किसान जो सरकार की इस कथनी और करनी के चक्रव्यूह में उलझकर रह गया है.

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