
ये तो वही बात हो गई कि एक तरफ आप आग बुझाने के लिए फायर ब्रिगेड बुला रहे हैं, और दूसरी तरफ खुद ही चुपके से उसमें पेट्रोल डाल रहे हैं. हमारी सरकार का भी धान और पानी को लेकर यही हाल है. मंच पर आकर नेताजी गला फाड़कर चिल्लाते हैं कि पानी बचाओ, धरती सूख रही है. इस चक्कर में तीन-तीन राज्य सरकारें किसानों के आगे हाथ जोड़ रही हैं कि भैया, धान मत उगाओ, बदले में हमसे नकद पैसे ले लो. लेकिन जैसे ही दिल्ली के बंद कमरों में फाइलें खुलती हैं, वही सरकार गाड़ियों के ईंधन इथेनॉल के लिए चावल का कोटा और बढ़ा देती है. यानी पानी सोखने वाली फसल की मांग खुद ही बढ़ा रही है. कसर बची थी तो चुनाव आते ही कुछ सरकारें धान पर भारी-भरकम बोनस का लालच देकर किसानों को दोबारा उसी दलदल में खींच लेती हैं. पानी और रोटी जैसे गंभीर मुद्दे पर सरकार का ऐसा भयंकर कन्फ्यूजन. यह अफसरों का पागलपन है, या फिर आम जनता की प्यास और किसानों की जिंदगी की कीमत पर वोट बैंक और बड़ी कंपनियों की तिजोरी भरने का कोई बहुत बड़ा डबल गेम?
नीतियों के विरोधाभास का यह कैसा भंवर है? जो सरकार आए दिन एक देश-एक विधान, वन नेशन-वन राशन कार्ड और वन नेशन-वन इलेक्शन का राष्ट्रव्यापी ज्ञान बांटते नहीं थकती, वो देश की सबसे बुनियादी जरूरत यानी अन्न और पानी की नीति पर इतनी भयंकर कंफ्यूज कैसे हो सकती है? आइए, आंकड़ो के आईने में इस 'सरकारी कन्फ्यूजन' की परतों को सिलसिलेवार तरीके से उधेड़ते हैं.
सरकारी तंत्र अक्सर इस बात की पीठ थपथपाता है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक और निर्यातक बन गया है. लेकिन खेती और पर्यावरण के जानकारों के लिए यह जश्न का नहीं, बल्कि गहरी चिंता का विषय है. हकीकत यह है कि भारत दुनिया को सिर्फ चावल नहीं बेच रहा, बल्कि चावल के दानों के रूप में अपने देश का अमूल्य जमीनी पानी कौड़ियों के दाम विदेशों में भेज रहा है.
एक किलो चावल उगाने में लगभग 3,000 से 5,000 लीटर पानी पाताल से खींच लिया जाता है. पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का पाताल धान की इस अंधी दौड़ के कारण पूरी तरह 'डार्क जोन' बन चुका है. ऐसे में जिस फसल ने देश के पानी का गला घोंट दिया हो, उसके उत्पादन में नंबर वन होने का ढोल पीटना नीतिगत दिवालियापन नहीं तो और क्या है?
इस पूरे खेल का सबसे हैरान करने वाला और पोल खोलने वाला हिस्सा है देश का 'इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम. जब इस योजना की शुरुआत हुई थी, तो सरकार ने सीना ठोक कर वादा किया था कि वह मक्के और अन्य कम पानी वाली फसलों से इथेनॉल बनवाएगी, ताकि किसान धान का मोह छोड़ें और खेती का ढर्रा बदले. लेकिन पर्दे के पीछे की हकीकत बिल्कुल उलट निकली.
सरकार ने मक्के जैसी पर्यावरण-अनुकूल फसलों को किनारे लगा दिया और निजी डिस्टिलरी लॉबी की तिजोरियां भरने के लिए भारतीय खाद्य निगम के कोटे से इथेनॉल बनाने के लिए चावल का आवंटन पिछले साल के 52 लाख टन से भारी-भरकम बढ़ाकर सीधे 72 लाख टन कर दिया.
सरकार तीन राज्यों-हरियाणा, पंजाब और छत्तीसगढ़ की सरकारें धान की खेती छोड़ने वाले किसानों को पैसे दे रही है. पंजाब में प्रति एकड़ 7000, हरियाणा में 8000 और छत्तीसगढ़ में 15000 रुपये देने का प्रावधान है, ताकि धान की खेती कम हो और भू-जल स्तर ठीक हो.
दूसरी तरफ इथेनॉल कंपनियों के लिए उसी पानी पीने वाली फसल से निकले चावल का कोटा बढ़ाकर रिकॉर्ड 72 लाख टन कर दिया गया है. अगर सरकार को हर साल लाखों टन चावल गाड़ियों की टंकियों में ही फूंकना है, तो फिर किसानों को पानी बचाने का उपदेश देने का नाटक क्यों किया जा रहा है?
कन्फ्यूजन का तीसरा सिरा राज्य सरकारों के राजनीतिक पाखंड से जुड़ा है. इसमें डबल इंजन वाली सरकारें भी शामिल हैं. केंद्र सरकार कहती है कि वह खेती के पैटर्न में बदलाव चाहती है. लेकिन इसी तंत्र की राज्य सरकारें अपने राजनीतिक मुनाफे और वोट बैंक के लिए केंद्र की ही मंशा की धज्जियां उड़ा रही हैं. एक तरफ केंद्र पानी बचाने की गुहार लगा रहा है, वहीं दूसरी तरफ राज्य सरकारें धान की एमएसपी (MSP) के ऊपर भारी-भरकम बोनस बांटने की होड़ में चुकी हैं.
खरीफ मार्केटिंग सीजन (KMS) 2025-26 के लिए केंद्र सरकार ने सामान्य धान का MSP 2,369 और ग्रेड-A धान का एमएसपी 2,389 प्रति क्विंटल तय किया.
जब एक किसान को यह दिख रहा है कि धान उगाने पर बिना किसी रिस्क के उसे 3,100 रुपये प्रति क्विंटल का भाव और सुनिश्चित सरकारी बाजार मिल रहा है, तो वह पागल नहीं है कि वो थोड़ी से पैसे के लालच में जोखिम उठाए और मक्का या तिलहन फसल उगाए, जिनकी 100 फीसदी सरकारी खरीद की कोई गारंटी ही नहीं है. सरकार एक हाथ से धान छुड़ाने का पैसा फेंक रही है, और दूसरे हाथ से धान उगाने का लालच दे रही है.
बहरहाल, चावल से संबंधित यह नीतियां किसी कन्फ्यूजन या नासमझी में नहीं बनाई गई हैं. बल्कि इन्हें प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर बेहद सुनियोजित तरीके से तैयार किया गया लगता है. इसका मकसद कंपनियों को सस्ता कच्चा माल देकर इथेनॉल का मुनाफा बढ़ाना और चुनाव वाले राज्यों में लोक-लुभावन बोनस बांटकर वोट बैंक सुरक्षित करना प्रतीत होता है. लेकिन, इस पूरे खेल में अगर कोई ठगा जा रहा है, तो वह है इस देश का पर्यावरण, आने वाली पीढ़ियों का पानी और वह आम किसान जो सरकार की इस कथनी और करनी के चक्रव्यूह में उलझकर रह गया है.