कृषि मंत्रालय में 'सफाई' अभियान शुरू, संयुक्त सचिव प्रियरंजन से छिना 2,000 करोड़ के बजट वाला बागवानी मिशन

कृषि मंत्रालय में 'सफाई' अभियान शुरू, संयुक्त सचिव प्रियरंजन से छिना 2,000 करोड़ के बजट वाला बागवानी मिशन

एकीकृत बागवानी विकास मिशन (MIDH) के तहत देश में फलों, सब्जियों, मसालों, फूलों, औषधीय पौधों और नारियल जैसी बागवानी फसलों के उत्पादन, उत्पादकता और गुणवत्ता को बढ़ाकर किसानों की आय में वृद्धि करना होता है. इस योजना में ग्रीनहाउस, पॉलीहाउस, कोल्ड स्टोरेज और ड्रिप सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीकों के लिए आर्थिक मदद दी जाती है.

कृषि मंत्रालय में प्रशासनिक बदलावकृषि मंत्रालय में प्रशासनिक बदलाव
ओम प्रकाश
  • New Delhi,
  • Jul 17, 2026,
  • Updated Jul 17, 2026, 6:48 PM IST

केंद्रीय कृषि मंत्रालय में एक ऐसा फेरबदल हुआ है जिसने पूरे प्रशासनिक गलियारे को हिलाकर रख दिया है. संयुक्त सचिव प्रियरंजन के पंख कतर दिए गए हैं. करोड़ों रुपये के बजटीय और आर्थिक फैसलों की फाइलें साइन करने वाले प्रियरंजन से तमाम प्रशासनिक अधिकार तत्काल प्रभाव से छीन लिए गए हैं. उन्हें अब बेहद ठंडे माने जाने वाले राजभाषा (हिंदी) डिवीजन की जिम्मेदारी सौंप दी गई है. जबकि, केंद्रीय बागवानी आयुक्त डॉ. प्रभात कुमार को मिशन का जिम्मा सौंप दिया गया है.

प्रियरंजन जैसे कद्दावर अधिकारी को, जिनका केंद्रीय प्रतिनियुक्ति कार्यकाल सितंबर 2026 में खत्म होने वाला है, महज दो महीने पहले इस तरह अचानक साइडलाइन किए जाने से मंत्रालय के भीतर हलचल  शुरू हो गई है. सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या बागवानी विभाग में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था?

क्या सब्सिडी में हुआ कोई खेल?

प्रियरंजन जिस एकीकृत बागवानी विकास मिशन (MIDH) के सर्वेसर्वा थे, उसका सालाना बजट 2,000 करोड़ रुपये से अधिक का है. सरकार ने 2021 से 2026 के लिए इस योजना में 10,000 करोड़ का भारी-भरकम प्रावधान रखा है. 

इस विशाल बजट का इस्तेमाल देश भर में कोल्ड स्टोरेज, पॉलीहाउस, ग्रीनहाउस और नर्सरी की स्थापना के लिए भारी सरकारी सब्सिडी बांटने में होता है. चर्चा तेज है कि क्या इस अरबों रुपये की सब्सिडी के आवंटन और चहेतों को फायदा पहुंचाने के खेल में कोई बड़ा 'गोलमाल' या वित्तीय अनियमितता हुई है? हालांकि इस बात का खुलासा नहीं हुआ है.

अचानक कार्रवाई के मायने

प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि कार्यकाल खत्म होने से ठीक पहले रातों-रात किसी संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी से इतना बड़ा  महकमा छीनकर उसे सिर्फ हिंदी से जुड़े कामकाज में लगा देना साफ इशारा करता है कि दाल में कुछ काला है.

सवाल यह है कि क्या प्रियरंजन किसी बड़ी प्रशासनिक चूक के शिकार हुए हैं या फिर कोई बड़ा घोटाला परदे के पीछे दबाया जा रहा था, यह आने वाला वक्त ही बताएगा. लेकिन, इस कार्रवाई ने सरकार की जीरो-टॉलरेंस नीति और विभाग के भीतर चल रही गड़बड़ियों पर बहुत बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं. सवाल यह भी है कि कहीं इस बदलाव के पीछे कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी को दी गई सब्सिडी से जुड़ा मामला तो नहीं है?

नाकारे अफसरों की उड़ी नींद

प्रियरंजन पर गिरे इस प्रशासनिक गाज का असर सिर्फ बागवानी विभाग तक सीमित नहीं है. इस बड़ी कार्रवाई के बाद मंत्रालय के एक्सटेंशन डिवीजन में भी हड़कंप है. सूत्रों के मुताबिक, पीएम मोदी के किसान कल्याण और खेतों में रासायनिक यूरिया का इस्तेमाल कम करने के विजन को जमीन पर उतारने में यह डिवीजन पूरी तरह नाकाम रहा है. किसानों को अंधाधुंध यूरिया के खतरों के प्रति जागरूक न कर पाने की वजह से देश की तिजोरी पर हर साल लाखों करोड़ की सब्सिडी का बोझ बढ़ रहा है.

बहरहाल, प्रियरंजन से मलाईदार काम छीने जाने को मंत्रालय में एक बड़े सफाई अभियान की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है. मंत्रालय के लोग कह रहे हैं कि बागवानी की 'सफाई' तो हो गई, अब एक्सटेंशन डिवीजन के नाकारे और कुर्सीतोड़ अफसरों का नंबर कब आएगा?

तो क्यों किनारे लगाए गए?

इस अप्रत्याशित और कड़ी कार्रवाई को केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के उस बयान से जोड़कर देखा जा रहा है, जिसमें वो प्रशासनिक कमियों पर जीरो-टॉलरेंस नीति की बात करते हैं. उन्होंने पहले ही खुले तौर पर चेतावनी दी थी कि कृषि क्षेत्र में किसी भी तरह की अनियमितता या गड़बड़ी को सरकार कतई बर्दाश्त नहीं करेगी और दोषियों के खिलाफ जांच कर तत्काल सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी. प्रियरंजन का पत्ता साफ होना क्या इसी नीति का हिस्सा है? और अगर सब कुछ ठीक चल रहा था तो फिर प्रियरंजन को क्यों साइडलाइन किया गया?

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