
सिनेमा के पर्दे पर सनी देओल का वह मशहूर डायलॉग तो आपने सुना ही होगा कि 'तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख... लेकिन इंसाफ नहीं मिला माई लॉर्ड.' आज देश के किसानों के साथ ठीक यही फिल्मी ड्रामा असल जिंदगी में खेला जा रहा है. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को प्रभावी और पारदर्शी बनाने का वादा करके बनाई गई एमएसपी कमेटी को गठित हुए आज पूरे 4 साल हो गए हैं, लेकिन किसानों के हाथ में इंसाफ के नाम पर अब तक एक कोरा कागज भी नहीं आया है.
अंदरखाने की खबर यह है कि अब कमेटी के भीतर ही बगावत और सवालों का दौर शुरू हो चुका है. कमेटी के गैर-सरकारी सदस्य अब ब्यूरोक्रेसी पर दबाव बना रहे हैं कि भाई, रिपोर्ट जल्दी जारी करो, क्योंकि हमें वापस किसानों के बीच जाना है, हम उन्हें क्या मुंह दिखाएंगे? लेकिन ऐसा लगता है कि कमेटी के शीर्ष पर बैठे बाबुओं और ब्यूरोक्रेट्स के हित कुछ और ही हैं, तभी तो वे इस बेहद संवेदनशील रिपोर्ट पर 'कुंडली' मारकर बैठे हुए हैं.
इस पूरी कहानी को समझने के लिए हमें उस राजनीतिक टाइमिंग को देखना होगा, जिसके तहत इस कमेटी की नींव रखी गई थी. साल 2020-21 के ऐतिहासिक किसान आंदोलन की रीढ़ पंजाब के किसान थे. नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने और एमएसपी पर एक विशेष कमेटी बनाने का बड़ा ऐलान किया. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यूपी और पंजाब चुनाव के ठीक पहले किया गया यह वादा एक बड़ा 'पॉलिटिकल मास्टरस्ट्रोक' था, ताकि पंजाब और यूपी के किसानों के गुस्से को शांत कर आंदोलन खत्म कराया जा सके और चुनावी नुकसान से बचा जा सके.
अब जब घूम-फिरकर फिर से पंजाब और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों का अगला विधानसभा चुनाव सिर पर आ गया है, तो इस रिपोर्ट की लेट-लतीफी खुद बीजेपी के लिए भी एक बड़ी राजनीतिक चपत साबित हो सकती है. राजनीतिक विश्लेषकों का साफ मानना है कि अगर समय रहते यह रिपोर्ट आ गई होती, तो बीजेपी के लिए पंजाब के किसानों को रिझाने का यह एक बेहतरीन बहाना रहता.
बीजेपी मंचों से सीना ठोककर किसानों के बीच कह सकती थी कि देखो, हमारे पीएम ने पंजाब के किसानों का सम्मान करते हुए न सिर्फ कृषि कानून वापस लिए, बल्कि अब किसानों के ही पक्ष में कमेटी की शानदार रिपोर्ट भी निकाल दी. पंजाब ही क्यों, अगर यह रिपोर्ट समय पर आती तो उत्तर प्रदेश के चुनावों में भी पश्चिमी यूपी के किसानों को रिझाने और साधने के बड़े काम आती. बीजेपी इसके जरिए ग्रामीण वोट बैंक पर अपनी मजबूत पकड़ दोबारा बना सकती थी. लेकिन अफसोस, आज शीर्ष अधिकारियों की खुली मनमानी, अकर्मण्यता और ढीले रवैये की वजह से ऐसा नहीं हो सका. बाबुओं की सुस्ती ने सरकार के हाथ से किसानों के बीच जाने का एक बहुत बड़ा राजनीतिक और चुनावी नैरेटिव छीन लिया है.
आरटीआई (RTI) से तथ्य बताते हैं कि यह कमेटी रिपोर्ट देने में भले ही फुस्स साबित हुई हो, लेकिन जनता का पैसा फूंकने में अव्वल रही है. 18 जुलाई 2022 को बनी यह कमेटी अब तक बैठकों और चाय-समोसों पर करीब 54 लाख रुपये डकार चुकी है. कमेटी अब तक 6 मुख्य बैठकें और उप-समितियों के जरिए 42 से ज्यादा बैठकें कर चुकी है. आखिरी बैठक 14 मई 2026 को हुई थी, लेकिन नतीजा आज भी 'ढाक के तीन पात' है.
जब देश के जागरूक नागरिकों ने आरटीआई के जरिए पूछा कि भाई! इन 48 से अधिक बैठकों में आखिर देश के किसानों के लिए क्या खिचड़ी पकी, तो कृषि मंत्रालय के केंद्रीय जन सूचना अधिकारी ने यह कहकर साफ मना कर दिया कि 'बैठक की बातें पूरी तरह गोपनीय हैं, इसे साझा नहीं किया जा सकता. सवाल यह उठता है कि लोकतंत्र में किसानों की तकदीर का फैसला करने वाली कमेटी बंद कमरों में ऐसा कौन सा 'टॉप सीक्रेट' मिशन चला रही है, जिसे देश के किसानों से ही छिपाया जा रहा है?
किसानों की नाराजगी और तीखे सवालों के घेरे में सीधे कमेटी के चेयरमैन हैं. जो पूर्व कृषि सचिव संजय अग्रवाल हैं. यही वह अधिकारी हैं जिनके कार्यकाल के दौरान साल 2020 में वे तीन विवादित कृषि कानून थोपे गए थे, जिसके विरोध में मुख्य रूप से पंजाब के किसानों को साल भर से ज्यादा समय तक सड़कों पर बैठना पड़ा था. जिसकी वजह से प्रधानमंत्री को माफी मांगनी पड़ी.
दिलचस्प और हैरान करने वाली बात यह है कि एक तरफ जहां संजय अग्रवाल भारत सरकार की इतनी महत्वपूर्ण एमएसपी कमेटी के मुखिया हैं, वहीं दूसरी तरफ वे एक बड़े अंतरराष्ट्रीय कृषि अनुसंधान संस्थान इकरिसेट (ICRISAT - International Crops Research Institute for the Semi-Arid Tropics) के असिस्टेंट डायरेक्टर जनरल (ADG) के तौर पर भी जुड़े हुए हैं.
अब किसान संगठन बेहद तीखा सवाल दाग रहे हैं: 'जो अधिकारी इकरिसेट (ICRISAT) जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था में एडीजी का कामकाज संभाल रहा है, और जिसके कृषि सचिव रहते देश का किसान सड़क पर आ गया था, क्या उनके पास भारत के किसानों के लिए समय है? जब उनके खुद के हित और काम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बंटे हुए हैं, तो वे भारत के किसानों की एमएसपी रिपोर्ट पर कुंडली मारकर क्यों नहीं बैठेंगे?'
कमेटी की इस जानबूझकर की जा रही देरी से न सिर्फ कमेटी के सदस्य परेशान हैं, बल्कि संसद से लेकर सड़क तक संग्राम छिड़ा हुआ है. कमेटी में शामिल कृषि विशेषज्ञों और किसान प्रतिनिधियों को डर सता रहा है कि यदि वे पंजाब और अन्य राज्यों के आगामी चुनावों में बिना किसी ठोस रिपोर्ट के गांवों में गए, तो किसान उनका घेराव कर काले झंडे दिखाएंगे.
आरोप लग रहे हैं कि कमेटी के शीर्ष पर बैठे अधिकारी जानबूझकर मामले को लटका रहे हैं, ताकि और व्यापारियों व कॉर्पोरेट घरानों के हितों को आंच न आए. एक तरफ यह सरकारी कमेटी सो रही है, वहीं दूसरी तरफ संसद की कृषि मामलों की स्थायी समिति ने साफ कह दिया है कि बिना 'एमएसपी की कानूनी गारंटी' और स्वामीनाथन आयोग के 'C2+50%' फॉर्मूले के, किसानों की बदहाली को नहीं रोका जा सकता.
पंजाब का यह अगला विधानसभा चुनाव एमएसपी कमेटी की नाकामी का सबसे बड़ा गवाह बनने जा रहा है. चार साल का यह लंबा इंतजार यह साबित करने के लिए काफी है कि एमएसपी कमेटी किसानों की समस्याओं को सुलझाने के लिए नहीं, बल्कि आंदोलन को टालने और पंजाब के पिछले चुनाव को निकालने का एक राजनीतिक हथकंडा थी. कमेटी के भीतर सदस्यों का बढ़ता दबाव, चेयरमैन की दोहरी और अंतरराष्ट्रीय भूमिकाओं (ICRISAT ADG) को लेकर उठते सवाल और पंजाब के गांवों में सुलगता किसानों का गुस्सा इस बात का साफ संकेत है कि अगर बाबुओं ने अपनी 'कुंडली' नहीं हटाई, तो पंजाब में एक बार फिर बीजेपी को मुंह की खानी पड़ेगी.