
भारत में कर्नाटक और तमिलनाडु के पहाड़ी इलाकों तक अपनी पहुंच रखने वाले विदेशी फल एवोकाडो की खेती अब बिहार के मैदानी इलाकों में संभव हो गई है. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (आरपीसीएयू), पूसा, समस्तीपुर के वैज्ञानिकों ने बिहार के जलोढ़ मैदानी इलाके में एवोकाडो (Persea americana) की सफल खेती के साथ इसके पैकेज ऑफ प्रैक्टिस को विकसित करने में सफलता हासिल की है. जिसके बाद अब राज्य की धरती पर एक नए विदेशी फल की खेती को लेकर संभावना बढ़ गई है.
आईसीएआर-अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (एआईसीआरपी) फल के तहत वैज्ञानिकों ने यह उपलब्धि हासिल की. एवोकाडो की खेती को सफल करने में आरपीसीएयू के फल वैज्ञानिक डॉ. आशीष पांडा ने कहा कि विश्वविद्यालय के कुलपति के विशेष निर्देश पर मैदानी इलाके में एवोकाडो की खेती का प्रयोग किया गया, जिसमें उम्मीद से भी ज्यादा सफलता मिली है. वहीं, विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. पी. एस. पाण्डेय ने इससे जुड़े वैज्ञानिकों को बधाई दी.
इस उपलब्धि के बीच विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. पी. एस. पाण्डेय ने कहा कि इससे पहले यह माना जाता था कि ‘बटर फ्रूट’ के नाम से प्रसिद्ध यह विदेशी फल एवोकाडो केवल कर्नाटक के कुर्ग या तमिलनाडु के कोडाइकनाल जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में ही उग सकता है. लेकिन अब एवोकाडो की खेती सिर्फ बिहार में ही नहीं, बल्कि पूर्वी भारत के बागवानी क्षेत्र के लिए एक बड़ी सफलता है.
विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने तरीका विकसित कर साबित कर दिया है कि उच्च मूल्य वाले व्यावसायिक फल भी गंगा के मैदानों में हो सकते हैं. उन्होंने कहा कि अभी एवोकाडो का आयात किया जाता है. अब बिहार में इसकी खेती शुरू होने से आयात पर निर्भरता कम की जा सकेगी.
विश्वविद्यालय ने सितंबर 2023 में एवोकाडो की खेती का परीक्षण शुरू किया गया था, जिसका उद्देश्य यह परखना था कि क्या एवोकाडो उत्तर बिहार के तापमान और आर्द्रता के उतार-चढ़ाव में प्रजनन परिपक्वता हासिल कर सकता है. जिसके बाद अनुसंधान दल ने सफलतापूर्वक टाइप-A किस्म अर्का सुप्रीम को टाइप-B किस्म अर्का रावी के साथ अंतर-रोपित किया, ताकि पर-परागण समकालिक रूप से हो सके. बता दें कि एवोकाडो की जटिल फूल-जीवविज्ञान (डायकोगैमी) की बाधा को दूर करने के लिए, जिसमें नर और मादा फूल अलग-अलग समय पर खिलते हैं.
एवोकाडो की खेती उन इलाकों में नहीं की जाती है, जहां जलजमाव की समस्या रहती है. जिसको देखते हुए वैज्ञानिकों द्वारा विश्वविद्यालय की वैसी जमीनों का चयन किया गया, जो सपाट गड्ढों के बजाय ऊंची मेड़ों या क्यारियों वाली हो.
वैसे ही भूमि पर एवोकाडो का रोपण किया गया. साथ ही, समय से पहले फल गिरने से रोकने के लिए ड्रिप सूक्ष्म सिंचाई और बेसिन मल्चिंग का इस्तेमाल किया गया.
करीब ढाई साल पुराने बाग में परिणाम उम्मीद से कहीं बेहतर रहा. अर्का सुप्रीम किस्म में 750 ग्राम से 950 ग्राम वजन तक के फल प्राप्त हुए हैं, जो आकार में बाजार में मिलने वाले सामान्य आयातित विदेशी फलों से भी बड़े हैं.
जैव-रासायनिक और संवेदी परीक्षणों में पुष्टि हुई है कि बिहार में उगा एवोकाडो स्वाद और मक्खन जैसी क्वालिटी में आयातित उत्पाद के बराबर या उच्च है.
बाजार की दृष्टि से यह फसल अत्यंत लाभकारी है. खेत पर इसका औसत भाव 400 रुपये प्रति किलोग्राम है, जबकि महानगरों में प्रीमियम खुदरा बाजार में इसकी कीमत 1500 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच जाती है.
विश्वविद्यालय के अधिकारियों के अनुसार, नियामक मूल्यांकन और औपचारिक किस्म लॉन्चिंग के बाद किसानों को व्यावसायिक रूप से पौधे बांटे जाएंगे. यह सफलता बिहार को पारंपरिक फसलों से हटकर उच्च मूल्य वाली बागवानी की ओर ले जाने में मील का पत्थर साबित होगी.