व‍िश्व युद्ध के बाद कैसे अमेर‍िका के बम बनाने वाले कारखानों से शुरू हुई थी फर्ट‍िलाइजर क्रांति?

व‍िश्व युद्ध के बाद कैसे अमेर‍िका के बम बनाने वाले कारखानों से शुरू हुई थी फर्ट‍िलाइजर क्रांति?

Worl War Fertilizer Revolution History: दुनिया में फर्टिलाइजर क्रांति की शुरुआत उन अमेरिकी मिलिट्री प्लांट्स से हुई जहां पहले और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बम बनाए जाते थे. युद्ध के बाद अमोनियम नाइट्रेट और अमोनिया प्लांट्स को खाद उत्पादन में बदला गया. IFDC के डॉ. यशपाल सहरावत ने ‘किसान तक’ के पॉडकास्ट अन्नगाथा में बताया कि कैसे विस्फोटक बनाने वाली यह तकनीक आगे चलकर आधुनिक कृषि का आधार बनी.

Fertilizer Revolution HistoryFertilizer Revolution History
ओम प्रकाश
  • New Delhi ,
  • Mar 02, 2026,
  • Updated Mar 02, 2026, 6:41 PM IST

Fertilizer Revolution History: रूस-यूक्रेन और पाक‍िस्तान-अफगान‍िस्तान के बीच चल रही जंग के बीच अब मध्य पूर्व के देश भी अत्यंत गंभीर सैन्य संघर्ष और भारी बमबारी की चपेट में आ गए हैं. इसे तीसरे विश्व युद्ध की आहट माना जा रहा है. लेक‍िन क्या आपको पता है क‍ि दुन‍िया में फर्टिलाइजर क्रांति की शुरुआत अमेर‍िका के उन्हीं प्लांट्स से हुई थी, ज‍िनमें पहले और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बम बनाए जाते थे. बम बनाने वाले कारखानों में मौजूद नाइट्रोजन और अमोनियम नाइट्रेट को फर्टिलाइजर के रूप में बदला गया. इंटरनेशनल फर्टिलाइजर डेवलपमेंट सेंटर (IFDC), अमेर‍िका में रेजि‍लिएंस और पर्यावरण के डायरेक्टर डॉ. यशपाल सहरावत ने विस्फोटक से खाद बनने तक के सफर की यह द‍िलचस्प जानकारी 'क‍िसान तक' के पोडकास्ट अन्नगाथा (Annagatha) में दी. 

डॉ. सहरावत ने बताया क‍ि प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, अमेरिकी सरकार ने बमों के लिए नाइट्रोजन की सप्लाई करने के ल‍िए कई बड़े अमोनिया प्लांट बनाए थे. अमोनियम नाइट्रेट (NH₄NO₃) का उपयोग मुख्य तौर पर युद्ध के समय विस्फोटकों में किया जाता था. दूसरे विश्व युद्ध के अंत के बाद सरकार के पास अमोनियम नाइट्रेट का विशाल भंडार बच गया. यानी विस्फोटक बनाने वाले कारखाने बेकार हो रहे थे. वैज्ञानिक जानते थे कि यही केम‍िकल पौधों के लिए नाइट्रोजन का बेहतरीन स्रोत हैं. युद्ध समाप्त होने के बाद, इन म‍िल‍िट्री प्लांट्स को कृषि के लिए नाइट्रोजन फर्टिलाइजर बनाने के काम में लगा दिया गया. 

फर्ट‍िलाइजर क्रांत‍ि 

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद नाइट्रोजन फर्ट‍िलाइजर की उपलब्धता इतनी बढ़ गई कि इसने अमेरिका और यूरोप में खाद्य उत्पादन में जबरदस्त वृद्धि की. इस पूरी प्रक्रिया का मूल हैबर-बॉश (Haber-Bosch) विधि थी, जिसे जर्मन वैज्ञानिकों ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान विस्फोटक बनाने के लिए विकसित किया था. अमेरिका ने बाद में इसी तकनीक का इस्तेमाल अपनी फर्ट‍िलाइजर इंडस्ट्री को खड़ा करने के लिए किया. हैबर-बॉश अमोनिया उत्पादन के लिए मुख्य औद्योगिक प्रक्रिया है. 

आज दुनिया भर में उपयोग होने वाले 75 फीसदी से अधिक आधुनिक फर्ट‍िलाइजर या उन्हें बनाने की प्रक्रिया का विकास अमेर‍िका के अलाबामा स्टेट स्थ‍ित मासेल स्योल्स (Muscle Shoals)  की प्रयोगशालाओं में हुआ बताया जाता है. वहां पर फर्टिलाइजर क्रांति को दो प्रमुख संस्थाओं ने आगे बढ़ाया, जिनकी स्थापना के पीछे अलग-अलग मकसद और समय थे. प्रथम व‍िश्व युद्ध के बाद 18 मई, 1933 को अमेर‍िका ने टेनेसी वैली अथॉरिटी (TVA) की स्थापना हुई. जहां सबसे पहले बड़े पैमाने पर फर्ट‍िलाइजर की शुरुआत हुई थी. उसी से अलग होकर इंटरनेशनल फर्टिलाइजर डेवलपमेंट सेंटर बना. इस सेंटर का मुख्यालय मासेल स्योल्स में TVA की ही जमीन पर बना है, लेकिन यह एक स्वतंत्र संस्था है. 

पूरी दुन‍िया को पहुंचाया फायदा 

डॉ. सहरावत ने बताया क‍ि इंटरनेशनल फर्ट‍िलाइजर डेवलपमेंट सेंटर (IFDC) साल 1974 में बनाया गया था. ज‍िसके आसपास विश्व युद्ध के दौरान व‍िस्फोटक बनाए जाते थे. साल 1973 के अंदर ऊर्जा क्राइस‍िस थी. ऑयल प्राइसेस बढ़ गए थे. इसके बाद अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने संयुक्त राष्ट्र में कहा था क‍ि हमारे पास फर्ट‍िलाइजर बनाने की टेक्नोलॉजी है. यह टेक्नोलॉजी उनके पास आई थी फर्स्ट और सेकेंड वर्ल्ड वार में बने बमों से. एक तरह से हम यह कह सकते हैं क‍ि शुरुआत में जो बम बने थे उन्हीं के बाई प्रोडक्ट फर्ट‍िलाइजर हैं. साल 1977 में इसे राष्ट्रपति जिमी कार्टर द्वारा 'पब्लिक इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन' का दर्जा दिया गया था. TVA ने अमेरिका को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाया, जबकि IFDC उसी तकनीक को पूरी दुनिया, विशेषकर गरीब देशों तक पहुंचाने का माध्यम बना. 

रासायनिक खाद का आविष्कार

हालांक‍ि, रासायनिक खाद का सबसे पहला सफल व्यावसायिक आविष्कार 1842 में हुआ. इंग्लैंड के सर जॉन बेनेट लॉज (Sir John Bennet Lawes) ने फास्फेट रॉक (पत्थर) को सल्फ्यूरिक एसिड के साथ मिलाकर 'सुपरफॉस्फेट' बनाया. यह दुनिया की पहली पेटेंट रासायनिक खाद थी. ठीक इसी समय, 1840 में जर्मनी के वैज्ञानिक जस्टस वॉन लिबिग ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक प्रकाशित की. उन्होंने साबित किया कि पौधों को बढ़ने के लिए नाइट्रोजन (N), फास्फोरस (P) और पोटेशियम (K) की जरूरत होती है. उनके इसी शोध के कारण उन्हें 'खाद उद्योग का जनक' कहा जाता है. सबसे क्रांतिकारी बदलाव तब आया जब हवा से नाइट्रोजन लेकर खाद बनाना संभव हुआ. इसकी 1909 में पहली बार प्रयोगशाला में सफलता मिली और 1913 में इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू हुआ. 

रासायन‍िक खाद का योगदान 

डॉ. सहरावत ने हमारे पोडकास्ट में कहा क‍ि उर्वरक एक आवश्यक बुराई है. इसका ज्यादा इस्तेमाल करेंगे तो घातक होगा और संतुल‍ित इस्तेमाल होगा तो मानवता के ल‍िए यह एक बेहतरीन चीज साब‍ित होगी. फर्ट‍िलाइजर के ब‍िना हम इस दुन‍िया को ख‍िला भी नहीं सकते और फर्ट‍िलाइजर के जो दोष हैं उसके कारण हमारे पर्यावरण पर स्वायल पर एयर पर पानी पर और इंसान की सेहत पर कुल म‍िलाकर वन हेल्थ पर उसके काफी दुष्पर‍िणाम आते हैं. 

अगर हम प‍िछले कुछ वर्षों की स्टडीज को देखें तो यद‍ि फर्ट‍िलाइजर की खोज नहीं होती तो हमारी जनसंख्या आज के द‍िन आधा होती. यह 2015 में की एक साइंट‍िफ‍िक स्टडीज का न‍िष्कर्ष है. उर्वरक नहीं होते तो भुखमरी के कारण आधी दुन‍िया खत्म हो जाती. वर्ल्ड बैंक की स्टडी में यह तथ्य सामने आया है. हम जब हर‍ित क्रांत‍ि की बात करते हैं तो अक्सर बीजों तक ही सीम‍ित रहते हैं, जबक‍ि उसमें फर्ट‍िलाइजर का बहुत बड़ा योगदान था. जबक‍ि उत्पादन बढ़ाने में फर्ट‍िलाइजर का योगदान 40 से लेकर 60 फीसदी तक का है.

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