
आज हमारा देश एक बहुत बड़े चुनौती से गुजर रहा है. एक तरफ जहाँ आबादी रॉकेट की रफ्तार से बढ़ रही है और शहर फैलते जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ हमारी खेती की सबसे बुनियादी जरूरतें यानी पानी और उपजाऊ मिट्टी तेजी से खत्म हो रही हैं आंकड़े डराने वाले हैं; भारत की करीब 14.5 करोड़ हेक्टेयर खेती लायक जमीन आज मिट्टी के कटाव की मार झेल रही है. सबसे बड़ी फिक्र की बात यह है कि क्लाइमेट चेंज की वजह से अब बारिश का कोई भरोसा नहीं रह गया है. कभी सूखा मुहाने पर आकर खड़ा हो जाता है, तो कभी अचानक आई बाढ़ सब कुछ तबाह कर देती है.अंधाधुंध दोहन का नतीजा यह है कि जमीन के नीचे का पानी अब खतरनाक लेवल से भी नीचे जा चुका है. पहले हम पानी बचाने के लिए सिर्फ बड़े-बड़े बांधों के भरोसे बैठे रहते थे, लेकिन भारी-भरकम खर्च, पर्यावरण की बर्बादी और लोगों के विस्थापन जैसे बड़े नुकसानों ने इन बांधों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. ऐसे नाजुक दौर में'वॉटरशेड मैनेजमेंट' ग्रामीण भारत और हमारे किसानों के लिए वक्त की सबसे बड़ी पुकार बनकर उभरा है.
अगर आसान और वैज्ञानिक भाषा में समझें, तो वॉटरशेड एक ऐसा प्राकृतिक या भौगोलिक इलाका होता है, जहां से बारिश का पूरा पानी बहकर एक ही आउटलेट जैसे किसी नाले, नदी या तालाब में जाकर मिलता है. ये वॉटरशेड आकार में एक छोटे से तालाब से लेकर किसी बड़ी नदी के पूरे बेसिन जितने बड़े हो सकते हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पूरे देश को पूरे देश को 6 रीजन्स, 35 रिवर बेसिन, 112 कैचमेंट्स, 500 सब-कैचमेंट्स और 3,200 से ज्यादा वॉटरशेड्स में बांटा गया है।भारत के सूखाग्रस्त, पहाड़ी और आदिवासी इलाकों में में इसकी जरूरत सबसे ज्यादा है. इन इलाकों में सिंचाई के साधन न के बराबर हैं, जिससे गरीबी और भुखमरी का खतरा हमेशा मंडराता रहता है. जब मॉनसून दगा दे जाए और फसलें सूखने लगें, तब वॉटरशेड के जरिए बहते पानी को रोककर न सिर्फ मिट्टी की नमी को महफूज रखा जा सकता है, बल्कि गांवों से रोजगार की तलाश में शहरों की तरफ होने वाले पलायन पर भी ब्रेक लगाया जा सकता है. यह तकनीक बेहद कम लागत में, लोकल लेवल पर पानी और मिट्टी को बचाने का सबसे खास तरीका है.
इस पूरे मैनेजमेंट का असल मकसद जमीन, पानी और पेड़-पौधों के बीच एक बेहतरीन तालमेल कायम करना है. इसके तहत बारिश के बहते हुए पानी की रफ्तार को धीमा किया जाता है, ताकि पानी सीधे बहकर वेस्ट न हो, बल्कि जमीन के अंदर समा सके. जब ऐसा होगा, तभी हमारे कुएं और बोरवेल फिर से रिचार्ज हो पाएंगे. इससे मिट्टी का बहना रुकेगा, बाढ़-सूखे का खतरा टलेगा और हरियाली बढ़ेगी।इस पूरे मिशन को जमीन पर उतारने के लिए एक खास '5J फॉर्मूला' काम करता है, जो जनताकी भागीदारी से चलता है:जल,जंगल, जमीन, जानवर,,जन य़ानि लोगों की एकता और मेहनत वॉटरशेड मैनेजमेंट का '5J फॉर्मूला' असल में आम लोगों की ताकत से प्रकृति को बचाने का एक अनोखा तरीका है. इसके तहत बारिश की हर बूंद को रोकना, खूब पेड़ लगाकर मिट्टी का बहने से रोकना , उपजाऊ खेतों की नमी बचाना और मवेशियों के लिए चरागाह संवारना शामिल हैलेकिन इस पूरे सिस्टम की असली जान 'जन-भागीदारी' है, जिसके बिना एक बेहतर भविष्य मुमकिन ही नहीं है. जब ये पांचों 'J' एक साथ मिलते हैं, तभी एक आत्मनिर्भर और मजबूत ग्रामीण व्यवस्था खड़ा होता है.
वॉटरशेड को कामयाब बनाने के लिए जमीन की ढलान और बारिश के मिजाज को देखते हुए तीन मुख्य तरीके अपनाए जाते हैं:वॉटरशेड को अमली जामा पहनाने के लिए तीन तरीके अपनाए जाते हैं: पहला कृषि उपाय, इसमें जमीन की ढलान के विपरीत आड़ी लाइनें बनाकर कंटूर खेती की जाती है पट्टियों में फसलें उगाई जाती है जिसे स्ट्रिप क्रॉपिंग कहते हैं और एक साथ कई तरह की फसलें मिश्रित खेती लगाई जाती हैं ताकि मिट्टी की पकड़ मजबूत रहे. दूसरा जैविक उपाय, जिसमें खेतों के मेड़ों किनारोंपर कटीली या घनी झाड़ियों की बाड़ लगाई जाती है. तेज हवाओं से मिट्टी को उड़ने से रोकने के लिए कतार में पेड़ लगाए जाते हैं और खाली पड़ी जमीनों पर घास उगाई जाती है; और तीसरा इंजीनियरिंग उपाय, जो पानी रोकने का सबसे तगड़ा हथियार है, जिसके जरिए बरसाती नालों पर चेक डैम, खेत-तालाब और पहाड़ी ढलानों पर सीढ़ीदार खेत बनाकर पानी की रफ्तार और मिट्टी का बहाव पूरी तरह रोक दिया जाता है.
आज के इस चुनौतीपूर्ण दौर में वॉटरशेड मैनेजमेंट कोई ऐसा काम नहीं है जिसे हम अपनी मर्जी पर छोड़ दें,बल्कि यह हमारी खेती को जिंदा रखने के लिए एक बेहद जरूरी रणनीतिक जरूरत बन चुका है।जैसे-जैसे मौसम अपना मिजाज बदल रहा है, हमारी पारंपरिकसूझबूझ में वैज्ञानिक तरीकों का तड़का लगाना बेहद लाजिमी हो गया है. जब हम साइंटिफिक तरीकों और स्थानी )समाज की ताकत को एक सूत्र में पिरो देते हैं, तो जादुई बदलाव देखने को मिलते हैं।इससे न सिर्फ पाताल में जा चुका वाटर लेवल वापस ऊपर आता है और फसलों की पैदावार बढ़ती है,बल्कि हमारी बंजर और बीमार हो चुकी जमीनें भी फिर से लहलाहा उठती हैं. आने वाली पीढ़ियोंको पानी के इस घोर संकट से बचाने और भारतीय कृषि को क्लाइमेट चेंज के खतरों से महफूज रखने के लिए वॉटरशेड मैनेजमेंट ही एकमात्र और सबसे टिकाऊ रास्ता है.
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