
देश में वित्त वर्ष 2026-27 में कृषि और ग्रामीण क्षेत्र के लिए कर्ज की जरूरत मजबूत बनी रह सकती है. नाबार्ड के उप प्रबंध निदेशक अजय कुमार सूद ने कहा है कि खेती की बढ़ती लागत, किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) का बढ़ता दायरा और कृषि से जुड़े क्षेत्रों में निवेश बढ़ने से कृषि लोन की मांग लगातार आगे बढ़ सकती है. अजय कुमार सूद ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में कृषि क्षेत्र में लोन वितरण का दायरा तेजी से बढ़ा है. उन्होंने कहा कि 2014-15 में कृषि लोन वितरण करीब 8.5 लाख करोड़ रुपये था, जबकि 2025-26 में यह आंकड़ा अस्थायी रूप से करीब 30 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. सूद ने कहा कि आगे भी इसमें बढ़ोतरी की संभावना है. हालांकि, बढ़त की रफ्तार पहले की तुलना में कुछ संतुलित रह सकती है.
उप प्रबंध निदेशक अजय कुमार सूद ने बताया कि खेती में उपयोग होने वाले इनपुट की लागत बढ़ने, किसान क्रेडिट कार्ड की पहुंच बढ़ने और डेयरी, पशुपालन, कृषि मशीनरी और कृषि बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ने से कर्ज की मांग मजबूत बनी हुई है. उन्होंने कहा कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अब सिर्फ फसल आधारित लोन पर निर्भरता नहीं रह गई है.
अजय कुमार सूद ने बताया कि कृषि लोन की संरचना भी धीरे-धीरे बदल रही है. अब अल्पकालिक फसल लोन के मुकाबले निवेश आधारित लंबी अवधि वाले लोन पर ज्यादा जोर दिखाई दे रहा है. उनका मानना है कि इससे कृषि क्षेत्र में पूंजी निर्माण बढ़ेगा और भविष्य में उत्पादन क्षमता और कर्ज को उपयोग करने की क्षमता मजबूत होगी.
अजय कुमार सूद ने चेतावनी भी दी कि बढ़ती ब्याज दरें किसानों पर दबाव बढ़ा सकती हैं. उन्होंने कहा कि खेती करने वाले परिवार अक्सर बहुत सीमित लाभ मार्जिन पर काम करते हैं, जो कई मामलों में 5 से 10 प्रतिशत तक होता है. ऐसे में ब्याज दर में 100 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी भी उनकी आय और मुनाफे को प्रभावित कर सकती है. उन्होंने बताया कि देश में करीब 86 प्रतिशत परिचालन जोत छोटे और सीमांत किसानों के पास है.
अजय कुमार सूद ने कहा कि महंगा कर्ज केवल किसानों तक सीमित चुनौती नहीं है. इससे स्वयं सहायता समूहों (SHG) को सस्ती वित्तीय पहुंच प्रभावित हो सकती है और ग्रामीण सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) के विस्तार की गति भी धीमी पड़ सकती है.
ग्रामीण लोन व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने के लिए नाबार्ड ने 2025-26 के दौरान करीब 4.5 लाख करोड़ रुपये की रियायती पुनर्वित्त सहायता और लक्षित अल्पकालिक पुनर्वित्त उत्पाद उपलब्ध कराए. सूद ने कहा कि इससे ग्रामीण वित्तीय संस्थानों की महंगे स्रोतों से उधारी पर निर्भरता कम हुई और किसानों, SHG और ग्रामीण MSME तक लोन पहुंच बनाए रखने में मदद मिली.
वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और हॉर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े जोखिमों पर अजय कुमार सूद ने कहा कि भारत फिलहाल ऐसी परिस्थितियों से निपटने की स्थिति में है. उन्होंने कहा कि देश में गेहूं और चावल का बफर स्टॉक मजबूत है और 2025-26 के दौरान खाद्य महंगाई नियंत्रित रही.
अजय कुमार सूद ने कहा कि सरकार ने खरीफ 2026-27 के लिए वैकल्पिक स्रोतों से उर्वरक आपूर्ति सुनिश्चित करने की तैयारी की है. यूरिया कीमतों में बदलाव नहीं हुआ है और उर्वरक निर्माण के लिए घरेलू एलएनजी उपलब्धता भी बेहतर हुई है. उन्होंने बताया कि उर्वरक और सिंचाई मिलकर कुल फसल उत्पादन लागत का लगभग 11 प्रतिशत हिस्सा ही बनाते हैं.
इसलिए बाहरी झटकों का असर सीमित रह सकता है. अजय कुमार सूद ने कहा कि राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन, पीएम-कुसुम और राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन जैसी पहलें भविष्य में कृषि क्षेत्र को बाहरी चुनौतियों के मुकाबले अधिक मजबूत बनाने में मदद कर सकती हैं. (एएनआई)