
दुनिया के नक्शे पर इस समय 'पेट' और 'पहिये' के बीच एक ऐसा संघर्ष छिड़ा है जो भारत जैसे आयात-निर्भर देश की नींद उड़ाने वाला है. एक तरफ अमेरिका, ईरान और इजराइल के बीच सुलगते तनाव ने कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों को आग लगा दी है, तो दूसरी तरफ इंडोनेशिया और मलेशिया के 'बायोडीजल मैंडेट' ने खाद्य तेल के मामले में भारत की टेंशन बढ़ा दी है. दुनिया के सबसे बड़े पाम तेल उत्पादक, इंडोनेशिया ने अपनी ऊर्जा रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए 1 जुलाई से B-50 मैंडेट लागू करने का फैसला किया है. इसका मतलब यह है कि अब वहां के डीजल में 50 फीसदी हिस्सा पाम ऑयल से तैयार होने वाले बायोडीजल का होगा. अब तक वहां B-40 लागू था, लेकिन इस बढ़ोत्तरी का मतलब है कि लाखों टन खाने वाला तेल अब सड़कों पर धुआं बनकर उड़ेगा. मलेशिया भी इसी राह पर है, जहां B-10 को बढ़ाकर B-15 करने की तैयारी है. बायोडीजल मुख्य तौर पर पाम ऑयल से तैयार होता है.
यहां बड़ा सवाल यह है कि इंडोनेशिया और मलेशिया के बायोडीजल मैंडेट से भारत का क्या लेना देना? दरअसल, भारत की चिंता की सबसे बड़ी वजह यह है कि हमारी जरूरत का लगभग 60 फीसदी खाद्य तेल आयात पर निर्भर है, जिसमें अकेले 75 प्रतिशत हिस्सेदारी पाम ऑयल की है. हमारी यह पूरी निर्भरता इंडोनेशिया और मलेशिया के 'ऑयल गेम' की बंधक बनी हुई है. अब जब ये देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाने वाले तेल को गाड़ियों के ईंधन (बायोडीजल) में झोंकने की जिद पर अड़े हैं, तो वैश्विक बाजार से पाम ऑयल का कम होना तय है. आपूर्ति में आने वाली यह कृत्रिम कमी न केवल खाद्य तेल के विश्व व्यापार को असंतुलित करेगी, बल्कि भारत के मध्यम वर्ग की थाली पर महंगाई का एक ऐसा बड़ा हमला भी करेगी जिसे संभालना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी
अखिल भारतीय खाद्य तेल व्यापारी संघ के अध्यक्ष शंकर ठक्कर ने इस हालात पर गंभीर चिंता जताई है. उनका स्पष्ट मानना है कि इंडोनेशिया और मलेशिया के इस कदम से अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेलों की सप्लाई में कमी आएगी. चूंकि भारत आयात पर टिका है, इसलिए घरेलू बाजारों में खाद्य तेलों के दाम बढ़ना लगभग तय है. पिछले दो दशक से देख रहा हूं कि जब भी किसी कारण से कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं तब खाने के तेल की कीमतें भी उछाल मारती हैं. इसकी मुख्य वजह यह है कि दुनिया भर में खाने के तेल को 'खाद्य' के बजाय 'ईंधन' के रूप में इस्तेमाल करने का चलन बढ़ा है. जब कच्चा तेल महंगा होता है, तो कई देश देश आत्मनिर्भरता के लिए पाम तेल जैसे खाद्य तेलों को बायोडीजल में झोंकने लगते हैं.
मिडल-ईस्ट में अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के तनाव ने कच्चे तेल की कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया है. इसी बात ने इंडोनेशिया को अपनी 'ऑयल पॉलिसी' को लेकर आक्रामक रुख अपनाने पर मजबूर कर दिया है. जिस इंडोनेशिया ने 2006 में महज 1 फीसदी बायोडीजल (B-01) से अपना सफर शुरू किया था, वह अब अपनी ऊर्जा नीति को निर्णायक मोड़ पर ले आया है.
फरवरी 2023 में B-35 और हाल ही में B-40 को सफलतापूर्वक लागू करने के बाद, वहां की सरकार ने 1 जुलाई, 2026 से पूरे देश में 'B-50 मैंडेट' का बिगुल फूंक दिया है. यह ऐलान वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए एक खतरे की घंटी है, क्योंकि अब इंडोनेशियाई डीजल का आधा हिस्सा सीधे रसोई में इस्तेमाल होने वाले पाम तेल से तैयार होगा. ऊर्जा के इस नए 'विदेशी खेल' ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाम ऑयल के अकाल और बेतहाशा महंगाई का रास्ता साफ कर दिया है.
खाद्य तेल के इस कूटनीतिक दंगल में मलेशिया भी पीछे रहने को तैयार नहीं है. अपनी ऊर्जा सुरक्षा को ढाल बनाकर मलेशिया अब पाम तेल की घरेलू खपत को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा है. वहां पर जिस 'नेशनल बायोफ्यूल पॉलिसी' की नींव 2006 में रखी गई थी, वह अब भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए 'सिरदर्द' बनने वाली है.
फिलहाल B-10 (10 फीसदी ब्लेंडिंग) पर चल रहा मलेशिया अब B-15 की ओर कदम बढ़ा चुका है. तैयारी का आलम यह है कि मलेशिया के 70 फीसदी से ज्यादा ब्लेंडिंग डिपो अब अपनी मशीनों में खाने वाला तेल झोंकने के लिए पूरी तरह 'सेट' हैं. साफ है कि जब मलेशिया जैसा बड़ा खिलाड़ी अपनी पाइपलाइनों में खाने का तेल दौड़ाएगा, तो वैश्विक बाजार में पाम ऑयल की किल्लत भारत की रसोई में महंगाई का तड़का लगाने के लिए काफी होगी.
खाद्य तेलों के संभावित संकट के बहाने ही हमें अपने खाद्य तेल आत्मनिर्भरता वाले दिनों को भी याद करना चाहिए. बताते हैं कि 90 के दशक में भारत अपनी जरूरत का लगभग 97 फीसदी खाद्य तेल पैदा करता था. लेकिन, 1994 में जब भारत ने WTO समझौते पर हस्ताक्षर किए, तो आयात नीतियां उदार कर दी गईं. विदेशी पाम तेल पर आयात शुल्क (Import Duty) कम होने से बाजार में सस्ता विदेशी तेल भर गया. इसकी वजह से घरेलू तिलहन किसानों को नुकसान होने लगा और वे दूसरी फसलों की ओर मुड़ गए.
इस संकट से निपटने का एकमात्र समाधान घरेलू तिलहन उत्पादन (सरसों, सोयाबीन, मूंगफली) को युद्धस्तर पर बढ़ाना है. यह काम मिशन के नाम पर पैसा फूंकने से नहीं होगा. कड़वी बात यह है कि जब तक किसानों को तिलहन फसलों की अच्छी कीमत नहीं मिलेगी तब तक 'नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल' कागजों से निकलकर खेतों तक नहीं पहुंचेगा. जब तक भारत अपनी 'खेत से रसोई' तक की कूटनीति को मजबूत कर विदेशी निर्भरता की बेड़ियां नहीं काटेगा, तब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार की हर हलचल भारतीय रसोई में महंगाई की आग लगाती रहेगी.
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