इथेनॉल नीति बदली, मक्का किसान उजड़ा: बिहार में खुशहाल सरकार बनाम बदहाल किसान की कहानी

इथेनॉल नीति बदली, मक्का किसान उजड़ा: बिहार में खुशहाल सरकार बनाम बदहाल किसान की कहानी

इथेनॉल नीति में बदलाव से बिहार के मक्का किसान संकट में हैं. 60 परसेंट मक्का और 40 परसेंट चावल की शर्त ने मक्के की मांग आधी कर दी, MSP से नीचे गिरते दामों ने किसानों को सड़कों पर ला खड़ा किया.

Bihar Maize Farmers CrisisBihar Maize Farmers Crisis
रवि कांत सिंह
  • New Delhi ,
  • Jan 29, 2026,
  • Updated Jan 29, 2026, 6:13 PM IST

मक्का और इथेनॉल के बहाने यह कहानी बदहाल किसान और खुशहाल सरकार की है. इस कहानी का केंद्र है बिहार, मक्का और केंद्र सरकार की बदली हुई इथेनॉल नीति. कागजों पर मामूली दिखने वाला एक नियम बदलाव आज बिहार के मक्का किसानों के लिए आफत बन गया है. हालात ऐसे हैं कि जो किसान कल तक इथेनॉल फैक्ट्रियों को मक्का बेचकर खुश था, आज वही किसान सरकार और इथेनॉल नीति को कोस रहा है.

इथेनॉल नीति में क्या बदला?

अब तक बिहार में इथेनॉल प्लांट पूरी तरह मक्का आधारित थे. इथेनॉल बनाने के लिए केवल मक्के का इस्तेमाल होता था. लेकिन हाल के महीनों में केंद्र सरकार ने नियम बदल दिया. 

नए नियम के मुताबिक, इथेनॉल बनाने में 60 परसेंट मक्का और 40 परसेंट चावल का इस्तेमाल होगा. चावल केवल FCI गोदामों से खरीदा जाएगा. इन दोनों बदले नियम से ही बिहार में मक्का किसानों की परेशानी शुरू हो गई.

चावल की शर्त क्यों?

सरकार के पास FCI में चावल का भारी स्टॉक है. इस स्टॉक को खपाने के लिए इथेनॉल प्लांट एक नया रास्ता बन गए. मक्का किसानों से फैक्ट्रियां 2000–2200 रुपये प्रति क्विंटल में खरीद कर रही थीं, जबकि FCI से चावल लगभग 2400 रुपये के आसपास दिया जा रहा है. इससे सरकार को बड़ा फायदा हुआ. इससे सरकारी चावल खपा, सरकारी तेल कंपनियों को सस्ता  इथेनॉल मिला और पेट्रोल में ब्लेंडिंग से बचत हुई. लेकिन इसकी कीमत किसानों ने चुकाई.

मक्के की मांग आधी, किसान बेहाल

नए नियम के बाद इथेनॉल फैक्ट्रियों ने मक्के की खरीद करीब 50 फीसद तक घटा दी. इसका सीधा असर ये हुआ कि मक्के के दाम MSP से काफी नीचे गिर गए, किसानों की आमदनी ध्वस्त हो गई.

अब किसान सरकार को इसलिए कोस रहा है क्योंकि कोसी-सीमांचल जैसे इलाकों में सरकार के कहने पर मक्का बोया था. बिहार देश का तीसरा सबसे बड़ा मक्का उत्पादक राज्य भी है. केंद्र सरकार ने बिहार के किसानों को भरोसा दिलाया था कि मक्का MSP पर खरीदा जाएगा और इथेनॉल प्लांट स्थायी बाजार बनेंगे.

सरकार की इन बातों पर किसानों ने भरोसा किया, मक्के का उत्पादन बढ़ाया और कुछ समय तक फायदा भी हुआ. लेकिन नियम बदलते ही वही किसान अधर में लटक गया. इथेनॉल फैक्ट्रियां भी संकट में आ गईं.

फैक्ट्रियां बंद, रोजगार खत्म

बदले नियम से मक्का आधारित कई इथेनॉल फैक्ट्रियां अब या तो बंद हैं या आधी क्षमता पर चल रही हैं. इन फैक्ट्रियों से किसानों को बेहतर दाम मिलता था, गांव के युवाओं को स्थानीय रोजगार मिला था और दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों में पलायन रुका था. अब हालात फिर वहीं लौट आए हैं जहां बेरोजगारी, पलायन और कर्ज का खतरा मंडरा रहा है.

सरकार की नीति, किसानों की सजा

इसमें कोई दोराय नहीं कि इथेनॉल की बदली नीति से सरकार का खजाना भर रहा है, लेकिन बिहार जैसे गरीब राज्य के किसान बदहाली की ओर धकेले जा रहे हैं. मक्का किसान आज खुद से सवाल कर रहा है-“सरकार की बात मानना गलती थी क्या?”

इस पूरी कहानी का निष्कर्ष साफ है कि इथेनॉल नीति में बदलाव से सरकार खुशहाल हुई, लेकिन बिहार का मक्का किसान बदहाल हो गया.

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