
राजस्थान में भूजल संकट अब मौसमी न रहकर स्थायी और गहराती हुई समस्या बनता जा रहा है. गिरते जलस्तर, फ्लोराइड युक्त पानी और उससे बढ़ रही बीमारियों ने राज्य के कई इलाकों में हालात गंभीर कर दिए हैं. बीजेपी नेता विजय सिंह बैंसला की ओर से तैयार किए गए एक विस्तृत विश्लेषण में दावा किया गया है कि राज्य में हर साल भूजल का दोहन उसकी प्राकृतिक भरपाई से कहीं अधिक हो रहा है, जिससे जल संकट लगातार विकराल होता जा रहा है.
रिपोर्ट में वर्ष 2015 से 2024 के बीच के भूजल आंकड़ों, जिला फैक्टशीट, नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी डेटा और स्वास्थ्य संकेतकों का अध्ययन किया गया है. इसके मुताबिक, वर्ष 2022 में राजस्थान में भूजल दोहन वार्षिक रिचार्ज का 151 प्रतिशत तक पहुंच गया था. यानी प्रकृति जितना पानी वापस जमीन में पहुंचा रही थी, उससे डेढ़ गुना अधिक पानी निकाला जा रहा था. उसी वर्ष राज्य का भूजल ओवरड्राफ्ट 4.43 बिलियन क्यूबिक मीटर तक दर्ज किया गया.
विश्लेषण के अनुसार, राज्य में ओवर-एक्सप्लॉइटेड भूजल ब्लॉकों की संख्या 2015 के 198 से बढ़कर 2022 में 219 हो गई. वहीं, सुरक्षित श्रेणी वाले ब्लॉक 52 से घटकर केवल 38 रह गए. प्री-मानसून अवधि में भूजल स्तर भी लगातार नीचे गया है. 2015 में जहां जलस्तर औसतन 24.5 मीटर नीचे था, वह 2024 में घटकर 28.8 मीटर तक पहुंच गया. रिपोर्ट में कहा गया है कि राजस्थान के लगभग हर पांच में से चार भूजल ब्लॉक अब गंभीर या अति-दोहन की श्रेणी में हैं.
रिपोर्ट में पश्चिमी राजस्थान के फ्लोराइड प्रभावित क्षेत्रों नागौर, बाड़मेर, जालौर, जोधपुर, सीकर और झुंझुनूं की स्थिति को बेहद चिंताजनक बताया गया है. अध्ययन के मुताबिक, राज्य के 17 जिलों में फ्लोराइड की मात्रा भारतीय मानक ब्यूरो की तय सीमा 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक पाई गई. नागौर में यह स्तर 5.8 मिलीग्राम प्रति लीटर तक दर्ज हुआ, जो तय सीमा से लगभग चार गुना ज्यादा है.
आईसीएमआर से जुड़े सर्वे के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि नागौर में 68 प्रतिशत लोगों में डेंटल फ्लोरोसिस के लक्षण पाए गए, जबकि 24 प्रतिशत लोग स्केलेटल फ्लोरोसिस से प्रभावित मिले. लंबे समय तक फ्लोराइड युक्त पानी पीने से हड्डियों को स्थायी नुकसान, किडनी संबंधी बीमारियां और हृदय पर दबाव जैसी समस्याएं बढ़ने की आशंका जताई गई है.
विश्लेषण में फ्लोराइड प्रभावित जिलों में स्वास्थ्य संकेतकों को भी गंभीर बताया गया है. जिन जिलों में पानी अधिक दूषित पाया गया, वहां शिशु मृत्यु दर औसतन 45.9 प्रति हजार जीवित जन्म दर्ज की गई, जबकि अपेक्षाकृत स्वच्छ पानी वाले जिलों में यह आंकड़ा 37.5 रहा. बाड़मेर में राज्य की सबसे अधिक शिशु मृत्यु दर 56 प्रति हजार जीवित जन्म दर्ज की गई.
भूजल संकट, जल गुणवत्ता, गरीबी, स्वास्थ्य बोझ और सामाजिक संकेतकों को मिलाकर तैयार संयुक्त सूचकांक में नागौर, बाड़मेर, जालौर और जैसलमेर को सबसे अधिक संवेदनशील जिलों में रखा गया है. रिपोर्ट के मुताबिक करीब 4.6 करोड़ लोग ऐसे जिलों में रह रहे हैं जिन्हें ‘हाई’ या ‘एक्सट्रीम’ वल्नरेबिलिटी श्रेणी में रखा गया है.
रिपोर्ट में बांसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़ जैसे दक्षिणी आदिवासी जिलों का भी जिक्र किया गया है. यहां भूजल गुणवत्ता अपेक्षाकृत बेहतर बताई गई, लेकिन गरीबी, स्कूल ड्रॉपआउट और बाल विवाह जैसी सामाजिक समस्याएं ज्यादा सामने आईं. अध्ययन में कहा गया कि राजस्थान में अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तरह की कमजोरियां मौजूद हैं, इसलिए पूरे राज्य के लिए एक जैसी नीति कारगर नहीं होगी.
विजय सिंह बैंसला ने मुख्यमंत्री कार्यालय को "राजस्थान ग्राउंडवॉटर रिचार्ज एंड सस्टेनेबिलिटी पॉलिसी 2026" नाम से एक नीति प्रस्ताव भी सौंपा है. इसमें विधायकों और सांसदों के लिए वार्षिक भूजल रिचार्ज लक्ष्य तय करने का सुझाव दिया गया है. प्रस्ताव के मुताबिक, जनप्रतिनिधियों की अगुवाई में भूजल रिचार्ज समितियां बनाई जाएं और स्थानीय क्षेत्र विकास निधि का कम से कम 30 प्रतिशत हिस्सा शुरुआती दो वर्षों में जल संरक्षण कार्यों पर खर्च किया जाए.
रिपोर्ट में अगले 12 महीनों के लिए आपात कदम सुझाए गए हैं, जिनमें सबसे अधिक प्रभावित जिलों में डिफ्लोरिडेशन प्लांट लगाना, फ्लोरोसिस जांच शिविर चलाना और अति-दोहन वाले ब्लॉकों में नए भूजल दोहन परमिट पर रोक लगाना शामिल है. मध्यम अवधि की योजना में जिला स्तर पर वल्नरेबिलिटी टास्क फोर्स, एक्विफर रिचार्ज प्रोजेक्ट और ब्लॉक स्तर पर जल दोहन की निगरानी का सुझाव दिया गया है. वहीं, दीर्घकालिक रणनीति में सैटेलाइट आधारित एक्विफर प्रबंधन, अपशिष्ट जल रीसाइक्लिंग, फ्लोरोसिस पुनर्वास केंद्र और ड्रिप व स्प्रिंकलर सिंचाई को बड़े स्तर पर बढ़ावा देने की बात कही गई है.
चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के अतिरिक्त निदेशक डॉ. नरोत्तम शर्मा ने बताया कि राज्य में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत नेशनल फ्लोरोसिस कंट्रोल प्रोग्राम चलाया जा रहा है. जिला अस्पतालों में पानी और यूरिन की मुफ्त फ्लोराइड जांच की सुविधा उपलब्ध है और आशा व एएनएम कार्यकर्ता प्रभावित गांवों और स्कूलों में मरीजों की पहचान कर रहे हैं.
वहीं, चिकित्सक डॉ. प्रवीण मंगलूनिया ने कहा कि फ्लोराइड युक्त पानी से जोड़ों में दर्द, दांतों को नुकसान और हाथ-पैरों में विकृति जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं. भूवैज्ञानिक प्रो. एमके पंडित ने तेजी से बढ़ते शहरीकरण को भूजल गिरावट का बड़ा कारण बताया और कहा कि जल संरक्षण नियमों को केवल औपचारिकता बनाकर नहीं छोड़ा जाना चाहिए. जल संरक्षण विशेषज्ञ डॉ. एसके जैन ने तालाबों, झीलों, नदियों और चेकडैम के पुनर्जीवन पर जोर दिया, ताकि भूजल रिचार्ज को मजबूत किया जा सके. (पीटीआई)