
देश के एक बड़े हिस्से में तापमान लगातार बढ़ रहा है और भीषण गर्मी यानी लू का प्रकोप तेज होता जा रहा है. ऐसे माहौल में सबका ध्यान यहां से हजारों किलोमीटर दूर प्रशांत महासागर में बन रहे एक मौसमी चक्र पर टिक गया है. दरअसल, भारत इस समय अपने सालाना दक्षिण-पश्चिमी मॉनसून का बेसब्री से इंतजार कर रहा है, जो हमारे देश के लिए किसी जीवन रेखा से कम नहीं है क्योंकि जून से सितंबर के बीच होने वाली देश की 70% बारिश इसी मॉनसून से मिलती है. मगर मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि साल 2026 में प्रशांत महासागर में 'सुपर अल नीनो' की शुरुआत हो रही है, जो मॉनसून के गणित को बिगाड़ सकती है.
आसान शब्दों में कहें तो 'अल नीनो' एक ऐसी प्राकृतिक घटना है, जिसमें समुद्र का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है. लेकिन जब यह तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस से भी ऊपर चला जाए, तो इसे 'सुपर अल नीनो' कहते हैं. आम दिनों में समुद्र की हवाएं भारत की तरफ नमी लाती हैं जिससे यहां अच्छी और समय पर बारिश होती है. मगर अल नीनो के आने से ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं और गर्म पानी दूसरी तरफ खिसक जाता है. समुद्र के तापमान में होने वाले इस बड़े बदलाव की वजह से भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया में मॉनसून का चक्र बिगड़ जाता है और देश में सूखा पड़ने का खतरा काफी बढ़ जाता है.
यह मौसमी संकट हमारे किसानों, बांधों और गांवों की अर्थव्यवस्था की कड़ी परीक्षा ले सकता है. हालांकि, यह मौसमी घटना कभी भी एक तय ढर्रे पर नहीं चलती. यही वजह है कि मौसम वैज्ञानिक भी इसे लेकर पूरी तरह पक्के नहीं हैं और इस गंभीर चुनौती के बीच उम्मीद की कुछ किरणें भी छिपी हुई हैं. राहत की बात यह भी है कि इस बार हमारे बांधों में पानी का स्तर पिछले सूखे सालों के मुकाबले काफी बेहतर है.
इस पूरी चुनौती को देखते हुए केंद्र सरकार ने खरीफ फसलों को बचाने के लिए एक ठोस इमरजेंसी प्लान तैयार कर लिया है. खुद केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हाई-लेवल बैठकें करके इन तैयारियों का जायजा लिया है. इसके तहत सरकार ने सूखा-संभावित जिलों के लिए उनकी स्थानीय जरूरतों के हिसाब से खास नीतियां बनाई हैं. इसमें सबसे बड़ी तैयारी यह है कि सरकार ने संकट के समय के लिए कम पानी में उगने वाले बीजों का एक बड़ा 'बफर स्टॉक' जमा किया है.
अगर मॉनसून में देरी होने या सूखा पड़ने से किसानों की पहली बुवाई खराब भी होती है, तो सरकार तुरंत कम समय में तैयार होने वाली वैकल्पिक फसलों के बीज बांटेगी ताकि किसान बिना समय गंवाए दोबारा बुवाई कर सकें.
भारत में जून से सितंबर के बीच होने वाला मॉनसून देश की खेती के लिए जीवन रेखा है, क्योंकि यहां की लगभग 60% खेती आज भी बारिश के भरोसे ही होती है. भारतीय मौसम विभाग (IMD) का अनुमान है कि 2026 में केवल 92% बारिश होगी, जिसे पिछले 26 सालों में सबसे कमजोर शुरुआती अनुमानों में से एक माना जा रहा है. इस साल कम बारिश या सूखा पड़ने की आशंका 35% तक है. इसका सीधा असर चावल, मक्का, सोयाबीन और दालों की पैदावार पर पड़ सकता है. फसलें खराब होने से बाजारों में अनाज और सब्जियों के दाम बढ़ सकते हैं. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी चेतावनी दी है कि अल नीनो की वजह से खाने-पीने की चीजें महंगी हो सकती हैं, जिसका सीधा बोझ आम जनता की जेब पर पड़ेगा.
हालांकि स्थिति चिंताजनक है, लेकिन कुछ ऐसे प्राकृतिक और इंसानी कारण भी हैं जो इस संकट के असर को कम करेंगे. पहला है 'पॉजिटिव इंडियन ओशन डायपोल' (IOD), जिसे सरल भाषा में हिंद महासागर का अल नीनो कह सकते हैं. यह भारत के लिए फायदेमंद होता है और अनुमान है कि मॉनसून के दूसरे हिस्से अगस्त-सिंबर में यह सक्रिय होकर कम बारिश की भरपाई कर देगा. दूसरी तरफ, अब हमारी कृषि व्यवस्था पहले से ज्यादा मजबूत है और सिंचाई के साधन बेहतर हुए हैं. ऐसे में संकट से बचने के लिए किसानों को एक काम जरूर करना चाहिए—वे अपनी फसलों का 'फसल बीमा' जरूर करवाएं ताकि नुकसान होने पर आर्थिक सुरक्षा मिल सके.
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि समझदारी से काम लेकर इस संकट को टाला जा सकता है. जिन इलाकों में कम बारिश का अनुमान है, वहां किसानों को धान जैसी ज्यादा पानी वाली फसलों की जगह कम पानी में उगने वाले मोटे अनाज जैसे बाजरा, रागी, दालें और तिलहन बोने चाहिए.
इसके अलावा, ड्रिप इरिगेशन और फव्वारा तकनीक अपनाकर पानी की 30 से 50 प्रतिशत तक बचत की जा सकती है. सरकार को भी 'प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना' का दायरा बढ़ाकर छोटे किसानों को तुरंत जोड़ना होगा. अंत में, मौसम विभाग की डिजिटल सेवाओं और मोबाइल ऐप के जरिए किसानों तक समय पर मौसम की जानकारी पहुंचाना बहुत जरूरी है ताकि वे सही समय पर बुवाई और कटाई का सही फैसला ले सकें.