युद्ध और कमजोर मॉनसून का डबल अटैक! खरीफ सीजन पर मंडरा रहा बड़ा खतरा

युद्ध और कमजोर मॉनसून का डबल अटैक! खरीफ सीजन पर मंडरा रहा बड़ा खतरा

क्या इस बार किसानों की राह आसान नहीं रहने वाली? खरीफ सीजन की दस्तक के साथ ही खेती-किसानी पर कई बड़े खतरे मंडराने लगे हैं. एक तरफ मानसून को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, तो दूसरी ओर अल नीनो के असर की आशंका भी बढ़ रही है.

युद्ध और कमजोर मॉनसून का डबल अटैक (AI- तस्वीर)युद्ध और कमजोर मॉनसून का डबल अटैक (AI- तस्वीर)
क‍िसान तक
  • नई दिल्ली,
  • May 22, 2026,
  • Updated May 22, 2026, 6:13 PM IST

खरीफ सीजन की दस्तक के साथ ही खेती-किसानी पर कई बड़े खतरे मंडराने लगे हैं. दरअसल, रेटिंग एजेंसी ICRA के मुताबिक, अगर मॉनसून सामान्य से कम रहता है,दूसरी ओर अल नीनो का असर बढ़ता है और अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण खाद की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो इसका सीधा असर खेती से लेकर आम लोगों की रसोई तक देखने को मिल सकता है. कम बारिश और खाद की कमी से फसलों का उत्पादन घट सकता है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा और लोगों की खरीदारी क्षमता भी प्रभावित हो सकती है और खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं.

एजेंसी का मानना है कि यदि हालात ज्यादा बिगड़ते हैं, तो कृषि क्षेत्र की विकास रफ्तार भी धीमी पड़ सकती है. फिलहाल वित्त वर्ष 2026-27 में कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर करीब 3 प्रतिशत रहने का अनुमान है, ऐसे में इस बार खरीफ सीजन सिर्फ किसानों के लिए ही नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ताओं के लिए भी बेहद अहम रहने वाला है.

किसानों पर कमजोर मॉनसून की चिंताएं

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने अनुमान लगाया है कि साल 2026 में मॉनसून सामान्य रह सकता है. अगर ऐसा होता है, तो इसका सबसे बड़ा असर खरीफ फसलों की बुवाई पर पड़ सकता है. कम बारिश होने से खेतों में पर्याप्त नमी नहीं मिलेगी, जलाशयों में पानी कम जमा होगा जिससे खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हो सकता है. इसके अलावा, मौसम वैज्ञानिकों ने मॉनसून के दौरान अल नीनो की स्थिति बनने की आशंका भी जताई है.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के एक अध्ययन के अनुसार, अल नीनो वाले वर्षों में कई जिलों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई, विशेषकर जुलाई और अगस्त के दौरान. ये दोनों महीने खरीफ फसलों की बढ़वार के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं. ऐसे में बारिश की कमी फसलों की पैदावार को प्रभावित कर सकती है.

अध्ययन में यह भी पाया गया कि धान, मक्का, बाजरा और ज्वार जैसी फसलें मॉनसून की बारिश के सहारे ही अच्छी पैदावार देते हैं. यदि बारिश कम होती है, तो इन फसलों की उपज में काफी गिरावट आ सकती है. शोध में 77 धान उत्पादक और 65 मक्का उत्पादक जिलों की पहचान की गई, जहां अल नीनो वाले वर्षों में फसल उत्पादन में 10 प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज की गई थी. इससे साफ है कि कमजोर मॉनसून और अल नीनो का असर किसानों की आय और देश के खाद्यान्न उत्पादन दोनों पर पड़ सकता है.

खाद संकट भी बिगाड़ सकता है खेल

मौसम से जुड़े खतरों  के अलावा, भारत का कृषि क्षेत्र आयातित उर्वरकों पर अपनी निर्भरता के कारण वैश्विक आपूर्ति में आने वाली रुकावटों के जोखिम से भी घिरा रहता है. उर्वरक विभाग के आंकड़ों के अनुसार, यूरिया की खपत का लगभग 80 प्रतिशत और NPK उर्वरक की मांग का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा घरेलू उत्पादन से पूरा होता है. हालांकि, DAP उर्वरक अभी भी काफी हद तक आयात पर निर्भर हैं, जिनकी केवल लगभग 40 प्रतिशत आपूर्ति ही स्थानीय स्तर पर होती है.

हाल के वर्षों में भारत ने आयातित यूरिया पर अपनी निर्भरता कम की है. यूरिया का उत्पादन 2019–20 में 244.6 लाख टन से बढ़कर 2024–25 में 306.7 लाख टन हो गया, जबकि आयात 92.4 लाख टन से घटकर 81.3 लाख टन रह गया. इस बीच, DAP अभी भी चिंता का विषय बना हुआ है. इसी अवधि के दौरान घरेलू उत्पादन 45.5 लाख टन से घटकर 37.7 लाख टन रह गया, जिससे आयात पर निर्भरता बनी रही, हालांकि आयात में थोड़ी वृद्धि हुई और यह 55.5 लाख टन से बढ़कर 58.6 लाख टन हो गया. 2019–20 और 2024–25 के बीच NPK का उत्पादन 93.3 लाख टन से बढ़कर 121.1 लाख टन हो गया. हालांकि, आयात में भी भारी वृद्धि हुई और यह 11.7 लाख टन से बढ़कर 28.7 लाख टन हो गया.

खाद की उपलब्धता पर निर्भर खरीफ सीजन

भारत में कृषि सिर्फ खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका का मुख्य आधार भी है. रसायन और उर्वरक मंत्रालय की मार्च 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, देश की करीब 46 प्रतिशत आबादी अपनी रोजी-रोटी के लिए कृषि और उससे जुड़े कामों पर निर्भर है. वहीं, कृषि क्षेत्र का देश की कुल GDP में लगभग 16 प्रतिशत योगदान है. खेती में खाद की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि ये फसलों की अच्छी पैदावार सुनिश्चित करने में मदद करते हैं अगर किसानों को समय पर पर्याप्त मात्रा में खाद नहीं मिलती या उनकी कीमतें अचानक बढ़ जाती हैं, तो इसका सीधा असर फसल उत्पादन पर पड़ सकता है.

विशेष रूप से खरीफ सीजन के दौरान उर्वरकों की कमी या महंगाई से किसानों की लागत बढ़ सकती है, फसलों की पैदावार घट सकती है और ग्रामीण क्षेत्रों की आय प्रभावित हो सकती है. इसका असर सिर्फ किसानों तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाद्यान्नों की कीमतें बढ़ने से आम लोगों को भी महंगाई का सामना करना पड़ सकता है, इसलिए कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा बनाए रखने के लिए उर्वरकों की पर्याप्त उपलब्धता बेहद जरूरी है. (प्रतीक सचान की रिपोर्ट)

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