
महाराष्ट्र का बीड जिला अक्सर सूखे और किसानों की आत्महत्याओं की खबरों के कारण चर्चा में रहता है. लेकिन इसी जिले के धारूर तहसील के कारी गांव के एक प्रगतिशील किसान दीपक मोरे ने अपनी मेहनत और आधुनिक तकनीक के दम पर सफलता की नई इबारत लिखी है. दीपक ने पारंपरिक खेती के बजाय 'मत्स्य पालन' (Fish Farming) को अपनाया और आज वे लाखों में कमाई कर रहे हैं.
दीपक मोरे ने केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत 25 लाख रुपये का प्रोजेक्ट शुरू किया. इस योजना के माध्यम से उन्हें दो किस्तों में कुल 9 लाख रुपये का सरकारी अनुदान प्राप्त हुआ. इस आर्थिक सहायता ने उन्हें व्यवसाय की मजबूत नींव रखने में मदद की.
बीड जिला मत्स्य विभाग के अधिकारी सोनवणे के मार्गदर्शन में दीपक ने बारामती के पाटस में पेशेवर प्रशिक्षण लिया. प्रशिक्षण के बाद उन्होंने अपनी 5 एकड़ जमीन में से मात्र 7 गुंठा जमीन पर 25 टैंक तैयार किए. ईंटों का घेरा, लोहे की जाली और तारपोलिन (तिरपाल) का उपयोग किया. इनलेट-आउटलेट पाइप, ऑक्सीजन सप्लाई के लिए ब्लोअर मशीन का सेटअप किया.
दीपक की सफलता का सबसे बड़ा कारण उनकी मार्केटिंग रणनीति है. उन्होंने अपने मछली के उत्पादन को बिचौलियों या व्यापारियों को कम दाम में बेचने के बजाय खुद की दुकान खोलकर सीधे ग्राहकों को बेचना शुरू किया. जहां व्यापारियों को बेचने पर कम भाव मिलता, वहीं सीधे बिक्री से उन्हें 500 रुपये प्रति किलो का शानदार भाव मिल रहा है.
दीपक ने 7 रुपये प्रति बीज की दर से 20 हजार मछलियां टैंक में छोड़ी थीं. मात्र 8 महीनों में एक मछली का वजन लगभग 1 किलो तक पहुंच गया है. उन्हें उम्मीद है कि आने वाले समय में वे इस व्यवसाय से 50 लाख रुपये तक की आय अर्जित करेंगे.
दीपक मोरे की यह कामयाबी बताती है कि यदि किसान पारंपरिक खेती के साथ-साथ सरकारी योजनाओं का लाभ उठाकर आधुनिक व्यवसायों (Side Business) की ओर रुख करें, तो खेती न केवल लाभदायक बनेगी बल्कि आत्महत्या जैसे संकटों पर भी रोक लग सकेगी.
वर्ष 2025 के आधिकारिक और प्रशासनिक आंकड़ों ने कृषि संकट की एक भयावह तस्वीर पेश की है. 1 जनवरी 2025 से 31 दिसंबर 2025 के बीच जिले में किसान आत्महत्याओं का आंकड़ा 200 के करीब पहुंच गया है, जो पूरे मराठवाड़ा क्षेत्र में सर्वाधिक है.
प्रशासनिक रिपोर्टों के अनुसार, जनवरी से अक्टूबर 2025 के बीच ही 198 किसानों ने अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली. आंकड़ों का विश्लेषण करें तो बीड जिले में औसतन हर 36 घंटे में एक किसान मौत को गले लगा रहा है. विशेष रूप से खरीफ सीजन के दौरान और उसके ठीक बाद आत्महत्याओं की संख्या में तेजी देखी गई.
साल की शुरुआत में सूखे जैसी स्थिति और फिर बेमौसम भारी बारिश ने फसलों को बर्बाद कर दिया. साहूकारों और बैंकों के बढ़ते कर्ज के बोझ ने किसानों को मानसिक रूप से तोड़ दिया. कपास और सोयाबीन जैसी नकदी फसलों के दाम बाजार में लागत से भी कम रहे. इसका कारण स्थानीय जानकारों और कृषि विशेषज्ञों के अनुसार बताया जा रहा है.
जिला प्रशासन के अनुसार, दर्ज मामलों में से कई मामलों को सरकारी मुआवजे के लिए पात्र माना गया है. हालांकि, कई परिवारों का कहना है कि कागजी कार्रवाई और 'पात्र-अपात्र' के फेर में मदद मिलने में काफी देरी हो रही है. सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि सरकार को केवल मुआवजा देने के बजाय संकट को जड़ से खत्म करने के लिए ठोस नीति बनानी चाहिए.