
Urea Overuse Impact: देश में उर्वरकों के असंतुलित इस्तेमाल को लेकर नीति आयोग ने गंभीर चिंता जताई है. नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी ने कहा कि खेती में नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों, खासकर यूरिया, का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल मिट्टी की क्वालिटी को नुकसान पहुंचा रहा है. इसका असर फसलों की उत्पादकता और पोषक तत्वों के संतुलन पर भी पड़ रहा है. उन्होंने संतुलित खाद इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए जल्द ठोस कदम उठाने की जरूरत बताई है.
अशोक कुमार लाहिड़ी ने कहा कि खेती में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश (NPK) का औसत इस्तेमाल अनुपात फिलहाल करीब 9.8:3.7:1 है, जबकि वैज्ञानिक रूप से 4:2:1 का अनुपात बेहतर माना जाता है. उन्होंने कहा कि मौजूदा स्थिति यह दिखाती है कि किसान बड़ी मात्रा में नाइट्रोजन आधारित खादों पर निर्भर हैं, जबकि फॉस्फेट और पोटाश का उतना इस्तेमाल नहीं हो रहा है.
नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने बताया खादों के इस्तेमाल में यह असंतुलन काफी हद तक सरकारी सब्सिडी की मौजूदा व्यवस्था से जुड़ा है. यूरिया अपेक्षाकृत सस्ता होने के कारण उसका अधिक इस्तेमाल हो रहा है, जिससे पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ रहा है. उन्होंने कहा कि लगातार अधिक नाइट्रोजन देने से मिट्टी की उर्वरता प्रभावित होती है और लंबे समय में फसलों की पैदावार पर भी नकारात्मक असर पड़ता है.
लाहिड़ी ने कहा कि खेती को टिकाऊ बनाने के लिए संतुलित उर्वरक इस्तेमाल, पोषक तत्वों के दक्ष प्रबंधन और जलवायु अनुकूल कृषि पद्धतियों को तेजी से अपनाना होगा. इसके साथ ही फॉस्फेट और पोटाश आधारित उर्वरकों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना जरूरी है, ताकि मिट्टी की सेहत सुधरे और उर्वरकों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित हो सके.
उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कृषि क्षेत्र में व्यापक बदलाव आवश्यक हैं. केवल कच्चा कृषि उत्पादन बढ़ाने के बजाय मूल्य संवर्धित उत्पादों पर जोर देना होगा. इसके साथ ही छोटे और बिखरे हुए किसानों को मजबूत उत्पादक संगठनों से जोड़ना तथा अधिक इनपुट आधारित खेती से टिकाऊ और जलवायु अनुकूल कृषि की ओर बढ़ना समय की मांग है.
लाहिड़ी ने कहा कि भारतीय कृषि आज भी खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार और अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है. देश के करीब 43 प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर हैं, इसलिए किसानों की आय और समृद्धि बढ़ाना राष्ट्रीय प्राथमिकता है. हालांकि कृषि और संबद्ध क्षेत्रों का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान लगभग 16 से 18 प्रतिशत ही है, इसलिए इस क्षेत्र की उत्पादकता और मूल्यवर्धन बढ़ाने पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. (पीटीआई)