
खेतों में रासायनिक खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल से मिट्टी की सेहत वेंटिलेटर पर पहुंच गई है. इसी गंभीर संकट को देखते हुए केंद्र सरकार 1 जून से देशव्यापी 'खेत बचाओ अभियान' शुरू करने जा रही है. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस 30 दिवसीय अभियान को पंचायत स्तर तक एक बड़ा जन-आंदोलन बनाने की पूरी तैयारी कर ली है. इसका मकसद किसानों को यूरिया और डीएपी के जाल से निकालकर उनकी लागत घटाना और धरती की उर्वरा शक्ति को वापस लौटना है. यह आम लोगों की सेहत से भी जुड़ा अभियान है.
वैज्ञानिकों के अनुसार मिट्टी की अच्छी सेहत के लिए N:P:K (नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश) का आदर्श अनुपात 4:2:1 होना चाहिए. यानी 1 बोरी पोटाश पर अधिकतम 4 बोरी यूरिया डालना ही सुरक्षित है. लेकिन साल 2024-25 के सरकारी आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि ज्यादा पैदावार के चक्कर में किसान खेतों में यूरिया का जहर घोल रहे हैं.
अक्सर खेती में अत्यधिक केमिकल के इस्तेमाल के लिए पंजाब और हरियाणा को बदनाम किया जाता है. पंजाब में यह आंकड़ा 29.8:6.5:1 और हरियाणा में 29.2:7.3:1 दर्ज किया गया है. यानी इनमें जरूरत से 7 गुना ज्यादा यूरिया डालकर जमीन को खराब किया जा रहा है. लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि बाकी राज्यों ने इससे कोई सबक नहीं लिया. नागालैंड में स्थिति सबसे भयावह है जहां यह अनुपात 101:5.8:1 पर पहुंच गया है यानी वहां पोटाश के मुकाबले 101 गुना यूरिया बहाया जा रहा है. इसके बाद राजस्थान में 45.7:15:1 और झारखंड में 37.3:11:1 के अनुपात के साथ अंधाधुंध रासायनिक खादों का इस्तेमाल हो रहा है.
उत्तर प्रदेश में 22.7:6.7:1 और उत्तराखंड में 22.2:5.1:1 के अनुपात से मिट्टी की प्राकृतिक उपजाऊ शक्ति नष्ट हो रही है. मध्य प्रदेश में अनुपात 15.3:6.8:1 और गुजरात में 14.7:4.6:1 है जो तय मानक से लगभग 4 गुना अधिक है. दक्षिण के तेलंगाना में यह आंकड़ा 12.6:4.8:1 है जबकि छत्तीसगढ़ में 11.2:5.1:1 और बिहार में 11:3.3:1 के अनुपात के साथ जरूरत से करीब 3 गुना ज्यादा यूरिया खेतों में झोंका जा रहा है. आज देश का राष्ट्रीय औसत अनुपात बढ़कर 9.3:3.5:1 हो चुका है जो तय सीमा से दोगुने से भी ज्यादा है. इस असंतुलन से न सिर्फ मिट्टी की सेहत बिगड़ रही है, बल्कि इंसानों की सेहत भी खराब हो रही है. खाद सब्सिडी पर टैक्सपेयर का जो पैसा खर्च हो रहा है वो अलग है. इसलिए यह अभियान चलाने की जरूरत पड़ रही है.
किसान भाई-बहन सबसे बड़ी गलती यह कर रहे हैं कि वे यूरिया की 'कृत्रिम हरियाली' को अच्छी फसल मान बैठते हैं. हकीकत में अत्यधिक नाइट्रोजन से पौधा अंदर से खोखला हो जाता है, तने कमजोर होने से फसल जल्दी गिर जाती है और कोमल पत्तियों पर कीड़े व बीमारियों का हमला बढ़ जाता है जिससे अंततः किसानों की जेब पर कीटनाशकों का खर्च भारी पड़ता है.
इसके अलावा यूरिया का असली दुष्प्रभाव पर्यावरण और इंसानी सेहत पर पड़ रहा है जिसके बारे में किसान अनजान हैं. खेतों में जरूरत से ज्यादा डाला गया यूरिया पानी में घुलकर जमीन के नीचे चला जाता है. इससे भू-जल में नाइट्रेट की मात्रा खतरनाक स्तर तक बढ़ जाती है. जब इस पानी को इंसान या मवेशी पीते हैं, तो यह कैंसर और बच्चों में 'ब्लू बेबी सिंड्रोम' जैसी जानलेवा बीमारियों का कारण बनता है.
फसल में यूरिया डालने के बाद अतिरिक्त नाइट्रोजन हवा में उड़कर 'नाइट्रस ऑक्साइड' गैस बनती है. यह गैस कार्बन डाइऑक्साइड से 300 गुना ज्यादा खतरनाक बताई जाती है, जो ओजोन परत को नुकसान पहुंचाकर ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ा रही है. यानी किसान जिस यूरिया को बहुत अच्छा समझकर खेतों में जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं वह हवा और पानी को धीमा जहर बना रहा है.
इस पूरे संकट में सबसे बड़ा सवाल उन रासायनिक खाद कंपनियों पर उठता है, जिन्होंने सालों से किसानों को खाद बेचकर अरबों रुपये का मुनाफा कमाया. लेकिन इन कंपनियों ने कभी भी किसानों को जागरूक करने के लिए जमीनी स्तर पर प्रयास नहीं किए कि यूरिया का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल मिट्टी को बंजर बना देगा. विज्ञापनों में हरी-भरी फसलों का लालच दिखाकर सिर्फ बोरियां बेचने पर ध्यान दिया गया, जबकि नैतिक जिम्मेदारी के तहत उन्हें 'सॉइल हेल्थ' और सीमित उपयोग की सही सलाह देनी चाहिए थी. इस बड़ी भूल को सुधारने के लिए ही केंद्र सरकार अब 'खेत बचाओ अभियान' शुरू कर रही है. देखना यह है कि कृषि वैज्ञानिक और किसान इसे कितनी गंभीरता से लेते हैं.