
भारत में उर्वरक सब्सिडी और खाद प्रबंधन को पूरी तरह डिजिटल बनाने की दिशा में सरकार ने एक और कदम बढ़ाया है. केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने रविवार को नई दिल्ली स्थित कर्तव्य भवन में ई-बिल सिस्टम का उद्घाटन किया, जिससे उर्वरक सब्सिडी बिलों की प्रोसेसिंग को अधिक सरल और एकीकृत बनाने के साथ भौतिक बिलों की आवाजाही खत्म करने में मदद मिलेगी. यह पहल ऐसे समय में हुई है, जब इंटीग्रेटेड फर्टिलाइजर मैनेजमेंट सिस्टम यानी iFMS को खाद की बिक्री का रिकॉर्ड रखने वाले प्लेटफॉर्म से आगे बढ़ाकर उत्पादन, सप्लाई, किसान की खरीद और सब्सिडी भुगतान तक पूरी व्यवस्था को जोड़ने वाले डिजिटल नेटवर्क के रूप में विकसित किया जा रहा है.
सरकार का कहना है कि नई व्यवस्था से पारदर्शिता, दक्षता और विभिन्न सरकारी प्रणालियों के बीच समन्वय को मजबूती मिलेगी. iFMS पर 14 करोड़ से ज्यादा आधार-लिंक्ड खाद खरीदार, 2.5 लाख से ज्यादा खुदरा विक्रेता और सालाना करीब 7 करोड़ मीट्रिक टन उर्वरक की बिक्री जुड़ी हुई है. इसके जरिए सालाना लगभग 2 लाख करोड़ रुपये की उर्वरक सब्सिडी के प्रबंधन में भी मदद मिलती है.
नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर यानी NIC ने उर्वरक विभाग के लिए iFMS को विकसित किया है और इसकी तकनीकी सहायता भी कर रहा है. यह प्लेटफॉर्म उर्वरक उत्पादन, आयात, डिस्पैच, परिवहन, स्टॉक उपलब्धता, खुदरा बिक्री और सब्सिडी प्रोसेसिंग जैसे प्रमुख चरणों को एक साथ जोड़ता है. इसका मकसद सरकार को पूरी सप्लाई चेन की बेहतर और समयबद्ध तस्वीर उपलब्ध कराना है, ताकि किसी भी स्तर पर उभरने वाली समस्या पर जल्द कार्रवाई की जा सके.
उर्वरक विभाग ने हाल के वर्षों में iFMS की भूमिका का विस्तार किया है. अब इसे केवल बिक्री के आंकड़े दर्ज करने वाले सिस्टम के बजाय इंटीग्रेटेड मॉनिटरिंग और निर्णय लेने में सहायता करने वाले प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित किया जा रहा है. इसके लिए नए डैशबोर्ड और एनालिटिकल टूल तैयार किए गए हैं, जो उत्पादन, आयात, डिस्पैच, परिवहन, स्टॉक और खुदरा बिक्री की जानकारी को एक जगह उपलब्ध कराते हैं.
iFMS के जरिए राष्ट्रीय, राज्य, जिला और खुदरा विक्रेता स्तर तक उर्वरक की स्थिति पर नजर रखी जा सकती है. डेटा एनालिटिक्स की मदद से असामान्य खरीद, खपत के बदलते पैटर्न और सप्लाई से जुड़ी संभावित समस्याओं की पहचान शुरुआती चरण में करने की कोशिश की जा रही है. खरीदारों की श्रेणी, भूमि स्वामित्व, फसल, जिला और उर्वरक के प्रकार के आधार पर भी खरीद के आंकड़ों का विश्लेषण संभव हो रहा है. इससे केवल यह नहीं पता चलता कि कितनी खाद बिकी, बल्कि यह भी समझने में मदद मिलती है कि अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी खपत का पैटर्न क्या है.
डेटा आधारित उर्वरक प्रबंधन के लिए iFMS को किसान, भूमि और फसल संबंधी सरकारी डेटाबेस से जोड़ने की दिशा में भी काम किया गया है. हरियाणा में मेरी फसल मेरा ब्यौरा यानी MFMB के साथ एकीकरण और बाद में एग्रीस्टैक से जुड़ाव की दिशा में हुई प्रगति ने उर्वरक लेन-देन को कृषि संबंधी जानकारी से जोड़ने का आधार तैयार किया है. इस प्रक्रिया से किसानों और भूमि रिकॉर्ड के मिलान के साथ-साथ डेटा की उपलब्धता और गुणवत्ता से जुड़ी व्यावहारिक चुनौतियों को समझने में भी मदद मिली है.
इन्हीं अनुभवों के आधार पर उर्वरक बिक्री के लिए फ्रेमवर्क यानी FFS को आगे बढ़ाया जा रहा है. इसके तहत मोबाइल ऐप आधारित उर्वरक बुकिंग को मौजूदा iFMS पॉइंट ऑफ सेल यानी PoS नेटवर्क से जोड़ा जा रहा है. किसान एग्रीस्टैक आईडी के आधार पर उर्वरक की जरूरत दर्ज कर सकता है, जबकि भूमि और स्वामित्व संबंधी विवरणों का सत्यापन किया जाता है. इसके बाद QR आधारित बुकिंग तैयार होती है और इसकी जानकारी PoS डिवाइस पर उपलब्ध कराई जाती है.
FFS के जरिए किसान की बताई गई उर्वरक जरूरत और उसकी वास्तविक खरीद के बीच तुलना की जा सकेगी. साथ ही प्रति हेक्टेयर खाद की खपत, अलग-अलग आकार की जोतों में उपयोग, फसल और उत्पाद के हिसाब से उर्वरक की खपत जैसे पहलुओं का विश्लेषण भी संभव होगा. इस फ्रेमवर्क को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है, ताकि व्यापक स्तर पर विस्तार से पहले बुकिंग, भूमि और फसल डेटा तथा परिचालन संबंधी चुनौतियों का अध्ययन किया जा सके.
उर्वरक की सप्लाई चेन की निगरानी को मजबूत करने के लिए व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम यानी VLTS पर भी काम किया गया है. इसमें डिस्पैच की जानकारी को वाहनों की लोकेशन से जोड़ा जाता है, जिससे परिवहन के दौरान उर्वरक खेपों की निगरानी संभव होती है. देरी या असामान्य आवागमन के पैटर्न की पहचान भी इस व्यवस्था से की जा सकती है. इसे iFMS के डिस्पैच, गुड्स-इन-ट्रांजिट और स्टॉक डेटा से जोड़ने पर उर्वरक की यात्रा को डिस्पैच प्वाइंट से अंतिम गंतव्य तक अधिक स्पष्ट तरीके से देखा जा सकता है.
iFMS उर्वरक सब्सिडी प्रबंधन में भी अहम भूमिका निभा रहा है, क्योंकि सब्सिडी भुगतान का आधार PoS नेटवर्क में दर्ज वास्तविक बिक्री से जुड़ा होता है. 1 जनवरी 2026 से सब्सिडी बिलों की इलेक्ट्रॉनिक प्रोसेसिंग, PFMS और ई-बिल प्रक्रियाओं के साथ एकीकरण को आगे बढ़ाया गया. इससे मैनुअल हस्तक्षेप कम करने, दावों और भुगतान की ट्रेसिंग बेहतर बनाने और विभिन्न चरणों की डिजिटल निगरानी में मदद मिलेगी.
DBT से जुड़े बिलों और लेन-देन की जांच को मजबूत करने के लिए रैंडम वेरिफिकेशन और अतिरिक्त एनालिटिकल जांच की व्यवस्था भी विकसित की जा रही है. इसका उद्देश्य सब्सिडी दावों की प्रोसेसिंग को अधिक कुशल बनाने के साथ-साथ डिजिटल नियंत्रण और ऑडिट को मजबूत करना है. इससे पूरी प्रक्रिया में जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ने की उम्मीद है.