पेस्टीसाइड्स मैनेजमेंट बिल 2026: क्या सरकार का नया कानून लगा पाएगा नकली कीटनाशकों के सिंडिकेट पर लगाम?

पेस्टीसाइड्स मैनेजमेंट बिल 2026: क्या सरकार का नया कानून लगा पाएगा नकली कीटनाशकों के सिंडिकेट पर लगाम?

देश में करीब 30% पेस्टिसाइड बाजार नकली और घटिया उत्पादों के कब्जे में है. राजस्थान समेत कई राज्यों में ऐसे जहर जैसे केमिकल्स खुलेआम बिक रहे हैं, जिससे फसलें बर्बाद हो रही हैं और किसानों की जान जा रही है. बैन के बावजूद खतरनाक कीटनाशक बाजार में उपलब्ध हैं, जिससे सरकार की निगरानी पर सवाल खड़े हो रहे हैं.

Pesticide Management Bill 2025Pesticide Management Bill 2025
रवि कांत सिंह
  • New Delhi,
  • Jun 08, 2026,
  • Updated Jun 08, 2026, 6:24 PM IST

देश के कीटनाशक बाजार में 30% घटिया या नकली पेस्टिसाइड्स का कब्जा है. इस बात की जानकारी तमाम राज्य सरकारों को है लेकिन भ्रष्टाचार की आड़ में यह धंधा पुरजोर तरीके से चल रहा है. ये ऐसे कीटनाशक हैं जो फसल चौपट करने के साथ ही किसानों की जान ले रहे हैं. ऐसे पेस्टिसाइड्स कृषि एक्सपोर्ट पर बट्टा भी लगा रहे हैं. ताजा उदाहरण राजस्थान का है जहां विधानसभा में सरकार ने माना है कि नकली पेस्टिसाइड्स की वजह से दो साल में 535 किसानों की जान गई है. इसमें मोनोक्रोटोफास जैसे केमिकल भी शामिल है जिस पर देश में प्रतिबंध है. सवाल है, बैन के बावजूद ऐसे कीटनाशक क्यों और कैसे बिक रहे हैं, सरकार इस पर आंखें क्यों मूंदे बैठी है. नए प्रस्तावित कीटनाशक बिल में इस पर रोक की बात की जा रही है, लेकिन कानून कब तक आएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं. कानून आ भी जाए तो क्या निगरानी के अभाव में इस पर कोई अमल हो पाएगा?

खतरा गंभीर, सरकार क्या कर रही है?

सबसे पहले जान लेते हैं कि सरकार पहले और अब क्या कर रही है. अतीत की बात करें तो सरकार ने देश में खतरनाक कीटनाशकों की समीक्षा करने के लिए एक एक्सपर्ट कमेटी बनाई थी. इस कमेटी की अध्यक्षता IARI के पूर्व नेशनल प्रोफेसर डॉ. अनुपम वर्मा ने की. कमेटी को 66 ऐसे कीटनाशकों की जांच करने का काम दिया गया था, जो कई देशों में बैन या सीमित हैं, लेकिन भारत में अब भी इस्तेमाल हो रहे थे. कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने 2016 में फैसला लेते हुए 12 कीटनाशकों पर पूरी तरह बैन लगाया, 6 कीटनाशकों को 2020 तक धीरे-धीरे बंद (फेज आउट) करने का निर्णय लिया.

इसके अलावा, एंडोसल्फान को बाद में सुप्रीम कोर्ट ने बैन कर दिया, जबकि एक अन्य कीटनाशक पहले से ही खेती में प्रतिबंधित था. सरकार समय-समय पर नई रिसर्च और रिपोर्ट्स के आधार पर इन केमिकल्स की सुरक्षा की समीक्षा भी करती रहती है. इसी प्रक्रिया के तहत अब तक 46 कीटनाशकों और 4 फॉर्मुलेशन पर बैन या फेज आउट लागू किया गया है, 8 कीटनाशकों का रजिस्ट्रेशन वापस लिया गया है और 9 कीटनाशकों के इस्तेमाल पर सख्त पाबंदियां लगाई गई हैं.

अब बायोपेस्टिसाइड पर भरोसा

सरकार का कहना है कि अब बायोपेस्टिसाइड (जैविक कीटनाशकों) के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जा रहा है, क्योंकि ये केमिकल कीटनाशकों के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित माने जाते हैं. यह जानकारी कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने राज्यसभा में लिखित जवाब में दी थी. यह जानकारी 2023 में सबके सामने आई. ऐसे में सवाल है जब सरकार ने इतने कीटनाशकों पर बैन लगाया, फिर राजस्थान जैसे कृषि प्रधान राज्य में 2024 से 2026 तक 535 किसानों की मौत कैसे हुई? राज्य सरकार ने विधानसभा में माना कि इसके पीछे घटिया या नकली पेस्टिसाइड्स जिम्मेदार हैं. 

राजस्थान की घटनाएं आंखें खोलने वाली

यह घटना सबकी आंखें खोलने के लिए पर्याप्त है कि कोई एक कीटनाशक बैन होता है, तो पिछले दरवाजे से दो-चार नकली कीटनाशक बाजार में आ जाते हैं. भोले-भाले किसान असली-नकली का फर्क नहीं समझ पाते और दुकानदार सस्ते माल के बहाने किसानों को 'जहर' चेंप देते हैं. नकली माल का यह धंधा किस कदर हावी है, इसे राजस्थान की हालिया घटनाओं से समझ सकते हैं. हाल के महीनों में यहां 30 से ज्यादा फैक्ट्रियों पर छापेमारी की गई, जहां मार्बल की धूल, पत्थर का चूरा और खतरनाक केमिकल्स मिलाकर उन्हें ब्रांडेड खाद और बीज उपचार के नाम पर बेचा जा रहा था.

छापेमारी के दौरान नकली कीटनाशकों का भी खुलासा हुआ. राज्य के कृषि मंत्री किरोड़ी लाल मीणा के मुताबिक, ये महंगे दामों पर बिकने वाले नकली कीटनाशक कपास की फसल को सफेद मक्खी (whitefly) से बचाने में पूरी तरह नाकाम रहे, जिससे किसानों को भारी नुकसान हुआ. उन्होंने कहा कि नकली कीटनाशक न सिर्फ कीटों को नहीं मारते, बल्कि फसलों में जहरीले अंश छोड़ सकते हैं, जो खाने की सुरक्षा के लिए खतरनाक हैं. इन नकली पेस्टिसाइड्स की कीमत किसानों को जान देकर भी चुकानी होती है.

क्या कहता है पेस्टिसाइड्स मैनेजमेंट बिल?

मामला केवल राजस्थान तक सीमित नहीं है, कई राज्य इसकी चपेट में हैं. फिर सरकार इसे क्यों संज्ञान में नहीं ले रही है? ऐसा नहीं है कि सरकार इस घटना के प्रति गंभीर नहीं है. सरकार पेस्टिसाइड्स मैनेजमेंट बिल, 2025 ला रही है जिसमें कई प्रावधानों का जिक्र है. यह प्रस्तावित पेस्टिसाइड मैनेजमेंट बिल देश में कीटनाशकों के कानून को बड़ा अपडेट देने वाला है. यह 1968 के पुराने कानून की जगह लेगा, जो सिर्फ इनसेक्टिसाइड्स तक सीमित था. इस नए बिल में केमिकल और जैविक—दोनों तरह के कीटनाशकों को एक ही नियम के तहत लाया जाएगा. साथ ही, इसमें पहली बार जोखिम (रिस्क) को ठीक से बताया गया है, जिसमें केमिकल के असर, उसके इस्तेमाल और पर्यावरण पर प्रभाव को ध्यान में रखा जाएगा.

इसका मतलब यह है कि अगर किसी कीटनाशक से लोगों की सेहत या पर्यावरण को खतरा दिखता है, तो सरकार पहले ही कार्रवाई कर सकेगी. नया कानून बढ़ते प्रदूषण, खाद्य सुरक्षा और किसानों से जुड़ी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए ज्यादा सख्त और आधुनिक बनाया जा रहा है. हालांकि विशेषज्ञों ने इस मसौदा बिल की कुछ कमियों पर भी सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि कीटनाशकों से होने वाली घटनाओं के लिए ना तो अलग से राहत फंड का प्रावधान है और ना ही किसी तरह की राष्ट्रीय स्तर की मॉनिटरिंग या रजिस्ट्रेशन सिस्टम बनाया गया है, जिससे ऐसे मामलों का सही रिकॉर्ड रखा जा सके.

पेस्टिसाइड्स पर राज्यों के अधिकार कम!

कई विशेषज्ञ चाहते हैं कि राज्य सरकारों को ज्यादा अधिकार दिए जाएं, क्योंकि मौजूदा ड्राफ्ट में राज्यों को किसी खतरनाक कीटनाशक पर रोक लगाने की शक्ति सिर्फ एक साल तक सीमित है, उसके बाद केंद्र की मंजूरी जरूरी हो जाती है. इसके अलावा, बिल में “जहरखोरी (poisoning)” और “वर्कर (worker)” जैसे अहम शब्दों की साफ परिभाषा नहीं दी गई है, जिससे कानून को लागू करने में दिक्कत आ सकती है.

कुल मिलाकर, सरकार जब तक इन छोटी मगर अहम बातों पर गौर नहीं करती और शंका समाधान नहीं निकालती, तब तक किसी भी कानून के धरातल पर उतरने और किसान हित में काम करने की संभावना कम है. अगर नया प्रस्तावित कानून भी पुराने ढर्रे पर काम करेगा, तो मान कर चलें कि किसान नकली कीटनाशकों का शिकार होते रहेंगे और खेतों में कीटों के मरने की जगह उनकी खुद की जान दांव पर लगेगी.

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