हिमाचल के सेब बागानों में बढ़ा रोगों का खतरा, वैज्ञानिकों ने जारी की एडवाइजरी, जानें बचाव के उपाय

हिमाचल के सेब बागानों में बढ़ा रोगों का खतरा, वैज्ञानिकों ने जारी की एडवाइजरी, जानें बचाव के उपाय

हिमाचल प्रदेश के सेब बागानों में अल्टरनेरिया लीफ स्पॉट, मार्सोनिना लीफ ब्लॉच और अन्य रोगों के बढ़ते खतरे को देखते हुए नौणी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने किसानों के लिए विशेष एडवाइजरी जारी की है. विशेषज्ञों ने रोग पहचान, संतुलित पोषण प्रबंधन, मिट्टी-पत्ती जांच, जल निकासी व्यवस्था और फफूंदनाशकों के सही उपयोग पर जोर देते हुए सेब उत्पादकों को समय रहते बचाव उपाय अपनाने की सलाह दी है.

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क‍िसान तक
  • New Delhi,
  • Jul 24, 2026,
  • Updated Jul 24, 2026, 6:37 PM IST

हिमाचल प्रदेश के सेब उत्पादक क्षेत्रों में पेड़ों पर कुछ बीमारियों का प्रकोप देखा जा रहा है. इसे देखते हुए डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी (यूएचएफ) के अलग-अलग वैज्ञानिक दल ने पिछले दो सप्ताह से प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया है. दौरे के दौरान वैज्ञानिकों ने सेब उगाने वाले किसानों को सेब में अल्टरनेरिया लीफ स्पॉट, मार्सोनिना लीफ ब्लॉच, सेब स्कैब और अन्य बीमारियों की समय पर पहचान और बचाव के उपायों पर विशेष जोर दिया. 

वैज्ञानिकों ने सेब बागानों से पत्तियों के नमूने लेकर उनकी जांच की और रोगों व पोषक तत्वों की कमी की पहचान की. इसके आधार पर किसानों को उनके क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुसार उचित सलाह दी गई. निरीक्षण के दौरान कुछ बागानों में मार्सोनिना लीफ ब्लॉच और अल्टरनेरिया रोग का हल्का प्रकोप देखने को मिला. इसके अलावा जड़ सड़न, कॉलर रॉट, पत्तियों के पीले पड़ने, पौधों के मुरझाने और तनों की छाल सड़ने जैसी समस्याओं पर भी वैज्ञानिकों ने किसानों को जानकारी दी. वैज्ञानिकों ने खेतों में अच्छी जल निकासी व्यवस्था बनाए रखने, जलभराव से बचने और बाचव के वैज्ञानिक उपाय अपनाने की सलाह दी.

सेब बागवानी में किसानों की गलती

बागवानों से बातचीत के दौरान यह भी सामने आया कि अधिकांश किसान मिट्टी और पत्तियों की नियमित जांच नहीं करवा रहे हैं. कई किसान खादों का इस्तेमाल वैज्ञानिक सलाह के बजाय अपने अनुभव के आधार पर कर रहे हैं, जिससे पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ रहा है. कई बागानों में फॉस्फेट खादों के अधिक प्रयोग के कारण जिंक की कमी के लक्षण भी पाए गए. इसके अलावा कुछ किसान जरूरत के अनुसार पौध संरक्षण उपाय अपनाने के बजाय पोषक तत्वों के स्प्रे का बहुत अधिक उपयोग कर रहे हैं या बिना तकनीकी सलाह के उन्हें कीटनाशकों के साथ मिला रहे हैं. इससे स्प्रे का असर कम हो सकता है और फसलों में फाइटोटॉक्सिसिटी यानी रासायनिक नुकसान का खतरा भी बढ़ जाता है.

मैदानी इलाकों में निरीक्षण के आधार पर विश्वविद्यालय ने सेब उगाने वाले किसानों के लिए नीचे बताई गई सलाह जारी की है-

  • अल्टरनेरिया लीफ स्पॉट, मार्सोनिना लीफ ब्लॉच और अन्य रोगों की लगातार निगरानी करें.
  • खरपतवार, संक्रमित पत्तियों और गिरी हुई पत्तियों को हटाकर बगीचे की सफाई बनाए रखें. संक्रमित गिरी हुई पत्तियों को जुटा कर उन पर 5 प्रतिशत यूरिया घोल का छिड़काव करें ताकि संक्रमण खत्म किया सके.
  • वैज्ञानिक विधि से छंटाई (प्रूनिंग) और कैनोपी प्रबंधन अपनाकर पर्याप्त वेंटिलेशन और रोशनी आने का इंतजाम करें और जड़ रोगों, कैंकर और कीटों का समय पर प्रबंधन करें.
  • संतुलित पोषण प्रबंधन के लिए मिट्टी और पत्तियों की वैज्ञानिक जांच करवाएं. किसानों को मध्य जुलाई से मध्य अगस्त के बीच पत्तियों के नमूने और फसल कटाई के बाद मिट्टी के नमूने जांच के लिए भेजने की सलाह दी गई है.
  • विश्वविद्यालय के सुझाए फफूंदनाशी स्प्रे अनुसूची का पालन करें और स्प्रे के बीच निर्धारित अंतराल बनाए रखें. फफूंदनाशकों को कीटनाशकों, सूक्ष्म पोषक तत्वों, ग्रोथ रेगुलेटर या हार्मोनों के साथ बिना वैज्ञानिक सलाह के न मिलाएं. 
  • केवल लाइसेंसी दुकानदारों से ही कीटनाशक खरीदें और विश्वविद्यालय और उद्यान विभाग की ओर से ही बताए गए प्रोडक्ट का ही उपयोग करें.

रोकथाम के लिए (Prophylactic/Protective Spray)

मेटिराम (Metiram) @ 600 ग्राम/200 लीटर पानी या जिराम (Ziram) @ 500 ग्राम/200 लीटर पानी.

अधिक रोग प्रकोप की स्थिति में

Lustre 5% SE @ 160 मि.ली./200 लीटर पानी या Cabrio Top 60 WG @ 200 ग्राम/200 लीटर या Shamir @ 500 मि.ली./200 लीटर या Kohicap Plus @ 600 मि.ली./200 लीटर या Avtaar @ 500 ग्राम/200 लीटर या Merivon @ 50 मि.ली./200 लीटर या LUNA Experience @ 126 मि.ली./200 लीटर पानी.

वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि वैज्ञानिक सलाह पर फफूंदनाशकों का बारी-बारी से (Alternately) प्रयोग करें और उन्हें अन्य कीटनाशकों, सूक्ष्म पोषक तत्वों, ग्रोथ रेगुलेटर या हार्मोनों के साथ न मिलाएं, क्योंकि इससे फाइट टॉक्सिसिटी, फलों पर रसेटिंग (Russeting) और दवाओं के असर में कमी आ सकती है. जरूरत होने पर इनका अलग-अलग प्रयोग किया जाना चाहिए.

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