
अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रहे तनाव की वजह से देश में एलपीजी सिलेंडरों की किल्लत देखने को मिल रही है. विशेष तौर पर बिहार में इन दिनों एलपीजी सिलेंडर लेने के लिए गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं. लेकिन राज्य के भागलपुर जिले के गोराडीह प्रखंड अंतर्गत आने वाली विशनपुर ग्राम पंचायत के लोग घरेलू यानी एलपीजी सिलेंडरों के लिए लाइन में नहीं लग रहे हैं, बल्कि इनके घरों के चूल्हों तक गैस पहुंच रही है. क्योंकि इस गांव में बायोगैस प्लांट स्थापित है. आज यह ग्राम पंचायत न केवल ग्रामीण विकास और पर्यावरण संरक्षण का एक प्रेरणादायक उदाहरण बन रही है, बल्कि उच्च क्वालिटी वाले जैविक कंपोस्ट के उत्पादन और अतिरिक्त आय के स्रोत के रूप में भी अपनी पहचान बना रही है.
बता दें कि गोबर-धन योजना के तहत स्थापित बायोगैस प्लांट ने न केवल ग्रामीणों को धुआं-रहित ईंधन उपलब्ध कराया है, बल्कि इस पहल ने गांव के लोगों की सोच को भी बदल दिया है. इसने साबित कर दिया है कि गोबर केवल एक अपशिष्ट नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन का मजबूत माध्यम बन सकता है. बिहार के कई जिलों में इस योजना के तहत बायोगैस प्लांट स्थापित किए गए हैं, लेकिन उनमें से कई प्लांट सुचारु रूप से नहीं चल रहे हैं. वहीं कुछ स्थानों के बायोगैस प्लांट न केवल सुचारु रूप से संचालित हो रहे हैं, बल्कि इन दिनों गैस की किल्लत को काफी हद तक कम भी कर रहे हैं.
विशनपुर पंचायत में अधिकांश परिवारों की आजीविका कृषि और पशुपालन पर निर्भर है. इसकी वजह से गांव में प्रतिदिन बड़ी मात्रा में गोबर उपलब्ध होता था. लेकिन इसके समुचित प्रबंधन के अभाव में गोबर को सड़कों के किनारे फेंक दिया जाता था. वहीं बरसात के मौसम में गांव के अलग-अलग हिस्सों में जमा गोबर गंदगी, दुर्गंध और संक्रमण का कारण बनता था. लेकिन बायोगैस प्लांट स्थापित होने के बाद अब गांव की सड़कों के किनारे गोबर नहीं दिखाई देता, बल्कि उसी गोबर से गैस बनती है और इसी गैस पर घरों की गृहिणियां खाना बनाती हैं. ग्रामीणों का कहना है कि पहले जहां गोबर गंदगी और परेशानी का कारण माना जाता था, अब वही गोबर आय, ऊर्जा और उन्नत खेती का साधन बन गया है. इससे लोगों के बीच स्वच्छता के प्रति जागरूकता भी बढ़ी है.
ग्रामीणों की इस समस्या को देखते हुए जिला जल और स्वच्छता समिति, भागलपुर ने गोबर-धन योजना के अंतर्गत बायोगैस प्लांट स्थापित करने का निर्णय लिया. इसके लिए पंचायत क्षेत्र के सरमसपुर कोहड़ा गांव में भूमि चयन, आवश्यक अनापत्ति प्रमाण-पत्र और अन्य प्रक्रियाओं को पूरा किया गया. इसके बाद यहां आधुनिक बायोगैस प्लांट की स्थापना की गई. प्लांट की स्थापना के साथ ही गांव में गोबर और जैविक अपशिष्ट के वैज्ञानिक प्रबंधन की शुरुआत हुई. ग्रामीणों को जागरूक किया गया कि गोबर को फेंकने के बजाय प्लांट तक पहुंचाया जाए, जिससे उसका उपयोग स्वच्छ ऊर्जा और जैविक खाद के उत्पादन में किया जा सके.
बायोगैस प्लांट स्थापित होने के बाद जहां लोगों को गैस की किल्लत से राहत मिली है. वहीं, स्वयं सहायता समूह से जुड़ी जीविका दीदियों को इसके संचालन की जिम्मेदारी भी सौंपी गई है. जीविका दीदियां न केवल इस प्लांट का सफलतापूर्वक संचालन कर रही हैं, बल्कि अपनी आर्थिक स्थिति को भी बेहतर बना रही हैं. उनकी मेहनत की बदौलत आज उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार हुआ है. इस प्लांट के जरिए वे ग्रामीण परिवारों को सुबह और शाम भोजन बनाने के लिए गैस की आपूर्ति करती हैं. वहीं प्लांट से निकलने वाली जैविक स्लरी और कंपोस्ट किसानों के लिए उत्कृष्ट जैविक खाद के रूप में उपयोगी साबित हो रही है.