
देश में कृषि एक ऐसा क्षेत्र बनता जा रहा है जिस क्षेत्र में आकर अब हर कोई आकर अपनी किस्मत आजमाना चाहता है. खास कर कोरोना काल के बाद देश में कृषि और उससे संबद्ध क्षेत्रों में स्टार्टअप्स की जैसे बाढ़ आ गई. कॉरपोरेट सेक्टर में अच्छी सैलरी पाने वाले लोगों ने भी अपना प्रोफेशन चेंज किया और वापस जमीन की तरफ मुड़ गए. प्रिंस राज एक ऐसे ही व्यक्ति हैं जिन्होंने मार्केटिंग में एमबीए किया और फाइनांनस कंपनी में जॉब कर रहे थे. पर उन्होंने नौकरी छोड़ दी और वर्मी कंपोस्ट तैयार करने के लिए एक फार्म की शुरुआत की. आज उनके फार्म में लगभग 100 बेड हैं और अच्छा उत्पादन कर रहे हैं.
किसान तक से बात करते हुए प्रिंस राज ने कहां कि फाइनेंस कंपनी छोड़कर कृषि के क्षेत्र में आने का फैसला करना एक बड़ा फैसला था, इसमें रिस्क भी था पर पत्नी और परिवार ने साथ दिया इसके बाद वो इस क्षेत्र में आ गए. सबसे पहले उन्होंने अपने दोस्त के साथ मिलकर दो एकड़ जमीन लीज में लिया. यहां उन्होंने जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए वर्मी कंपोस्ट बनाने का कार्य शुरु किया. शुरुआत में उन्होंने केंचुआ खाद बनाने के लिए 30 बेड का निर्माण किया, इसके बाद धीरे-धीरे उन्होंने इसकी संख्या बढ़ाई और आज उनके पास 100 बेड हैं.
एक बेड में वर्मी कंपोस्ट तैयार होने में तीन साढ़े तीन महीने का समय लगता है. एक बेड से तीन महीने में तीन से चार क्विंटल वर्मी कंपोस्ट निकलता है. एक बार वर्मी कंपोस्ट के लिए केंचुआ खाद तैयार करने के बाद फिर से इसे खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है. केंचुआ की संख्या बढ़ती ही जाती है. वर्मी कंपोस्ट बनाने के लिए बेड में गोबर बिछाना पड़ता है. इसके बाद इसमें नमी बनाए रखने के लिए इसमें सिंचाई की जाती है और इसके उपर पुआल से मल्चिंग की जाती है. खाद तैयार होने के बाद उसे बेड से हटा दिया जाता है.
वर्मी कंपोस्ट बनाने में कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है. हालांकि खाद के अंदर जो केचुंआ रहता है, वह जीरो डिग्री तापमान से लेकर 50 डिग्री तापमान तक सहने में सक्षम होता है. हालांकि बारिश के मौसम में बेड में जलजमाव होने का खतरा और बह जाने का खतरा बना रहता है, इसलिए बेड को इस तरह से बनाया जाना चाहिए कि उसमें पानी का बहाव तेज नहीं हो. प्रिंस राज ने कहा कि वह चाहते हैं झारखंड में जहरमुक्त खेती जाए. ताकि लोगों की सेहत अच्छी तरह बनी रहे.