Fertilizer Subsidy: खाद सब्सिडी में बदलाव के संकेत से चिंता में किसान, जानिए क्‍या हैं मुख्‍य कारण

Fertilizer Subsidy: खाद सब्सिडी में बदलाव के संकेत से चिंता में किसान, जानिए क्‍या हैं मुख्‍य कारण

उर्वरक सब्सिडी को सीधे किसानों के खाते में देने की केंद्र की योजना पर पंजाब में चिंता गहरा रही है. किसानों को डर है कि 270 रुपये की यूरिया बोरी के लिए पहले 2,400 रुपये चुकाने पड़ सकते हैं. यह बदलाव खेती की लागत और कर्ज दोनों बढ़ा सकता है.

Urea Subsidy Pattern Change IssueUrea Subsidy Pattern Change Issue
क‍िसान तक
  • Noida,
  • Feb 28, 2026,
  • Updated Feb 28, 2026, 5:15 PM IST

केंद्र सरकार एक बार फिर उर्वरक सब्सिडी को सीधे किसानों के बैंक खाते में देने की दिशा में आगे बढ़ रही है. इसे “ट्रू डीबीटी” मॉडल कहा जा रहा है. सरकार का दावा है कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी, कालाबाजारी रुकेगी और किसान अपनी जरूरत के मुताबिक उर्वरक चुन सकेंगे. लेकिन, खेती पर सबसे ज्यादा निर्भर राज्यों में शामिल पंजाब में इस प्रस्ताव को लेकर गहरी बेचैनी है. दरअसल, मौजूदा व्यवस्था में किसान यूरिया जैसी खाद तय सब्सिडी वाले दाम पर खरीदते हैं. सरकार सब्सिडी की रकम सीधे कंपनियों को देती है, जिससे किसान को सस्ती खाद मिलती है. 

उदाहरण के तौर पर 45 किलो यूरिया की बोरी किसान को करीब 265-270 रुपये में मिल जाती है, जबकि इसकी वास्तविक लागत करीब 2,400 रुपये बताई जाती है. नए DBT मॉडल में किसान को पहले पूरी बाजार कीमत चुकानी पड़ सकती है और बाद में सब्सिडी की रकम उसके खाते में डाली जाएगी. यानी जो बोरी आज 270 रुपये में मिल रही है, उसके लिए किसान को पहले 2,400 रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं.

पंजाब में चिंता की जड़ क्या है?

पंजाब देश के उन राज्यों में है जहां सबसे ज्यादा उर्वरक की खपत होती है. धान-गेहूं चक्र वाली खेती में प्रति एकड़ औसतन दो बोरी यूरिया का इस्तेमाल होता है. इंडियन एक्‍सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा सिस्टम में एक एकड़ पर यूरिया का खर्च करीब 540 रुपये बैठता है. लेकिन, अगर DBT मॉडल लागू हुआ तो यही खर्च एक झटके में लगभग 4,800 रुपये हो सकता है. यही अंतर किसानों को डरा रहा है. 

छोटे और सीमांत किसानों के पास बुवाई के समय पहले से ही बीज, डीजल, मजदूरी और कीटनाशकों का भारी खर्च होता है. ऐसे में खाद के लिए हजारों रुपये पहले चुकाना उनके लिए आसान नहीं होगा. किसान नेताओं का कहना है कि इससे किसानों की निर्भरता फिर से आढ़तियों और गैर-औपचारिक कर्ज पर बढ़ सकती है.

क्या सब्सिडी धीरे-धीरे खत्म होगी?

रिपोर्ट के मुता‍बिक, किसान संगठनों और कृषि विशेषज्ञों को आशंका है कि यह बदलाव केवल भुगतान का तरीका भर नहीं है. उन्हें डर है कि भविष्य में सब्सिडी की राशि में कटौती, देरी या सीमा तय की जा सकती है. पहले भी रसोई गैस जैसी योजनाओं में DBT लागू होने के बाद सब्सिडी का दायरा धीरे-धीरे सिमटता गया. किसान संगठन ऐसा तर्क दे रहे हैं.

एक और चिंता अंतरराष्ट्रीय दबावों को लेकर है. आलोचकों का मानना है कि वैश्विक व्यापार समझौतों और वित्तीय दबावों के चलते सरकार लंबे समय में कृषि इनपुट सब्सिडी को कम करने की राह पकड़ सकती है. ऐसे में DBT को वे इस प्रक्रिया का पहला कदम मान रहे हैं.

किराएदार किसानों के सामने नई मुश्किल

पंजाब में बड़ी संख्या में किसान किराए की जमीन पर खेती करते हैं. जमीन के कागज अक्सर मालिक के नाम पर होते हैं, न कि वास्तविक खेती करने वाले के. किसान नेताओं का कहना है कि अगर सब्सिडी को भूमि रिकॉर्ड से जोड़ा गया तो असली किसान को पैसा न मिलकर जमीन मालिक के खाते में जा सकता है.

इसके अलावा बाढ़ या कटाव से प्रभावित जमीनों के मामलों में पात्रता तय करना भी जटिल हो सकता है. किसानों का तर्क है कि जब तक वास्तविक खेती करने वाले की पहचान का मजबूत तंत्र नहीं बनता, तब तक DBT मॉडल कई जरूरतमंद किसानों को बाहर कर सकता है.

सरकार का कहना है कि DBT से किसान सशक्त होंगे और उन्हें ज्यादा विकल्प मिलेंगे. वहीं, पंजाब के किसान इसे लिक्विड‍िटी क्रासिस, कर्ज बढ़ने और सब्सिडी के भविष्य पर खतरे के रूप में देख रहे हैं.

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