
धान की खेती को करीब 1 से 2 महीने का समय पूरा हो चुका है और अब फसल धीरे-धीरे बढ़ने के साथ किसानों के लिए एक नई चुनौती भी सामने आ रही है. इस समय खेत में कीट और रोगों का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में किसान खेत की नियमित निगरानी जरूर करें. कहीं पौधों की पत्तियां मुड़ तो नहीं रही हैं, तना अंदर से कमजोर तो नहीं हो रहा या खेत में सूखी और सफेद बालियां तो दिखाई नहीं दे रहीं. इन लक्षणों को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. समय रहते इन कीटों की पहचान कर सही तरीके से नियंत्रण किया जाए, तो फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है. बिहार कृषि विभाग ने भी तना छेदक और पत्ता लपेटक कीट की पहचान के साथ-साथ इनके प्रबंधन के कई आसान उपाय बताए हैं. आइए जानते हैं.
तना छेदक कीट धान के पौधे के तने के अंदर घुसकर उसके मुलायम हिस्से को खाता है. इससे पौधे को अंदर से नुकसान पहुंचता है. शुरुआती अवस्था में कीट के प्रकोप को पहचानना जरूरी है. इसके बाद जब पौधे प्रभावित होते हैं तो गभ्भा सूख जाता है. फसल की आगे की अवस्था में पौधों की बालियां सफेद दिखाई देने लगती हैं. ऐसी सूखी बालियों को आसानी से खींचकर बाहर निकाला जा सकता है. खेत में इस तरह की सूखी या सफेद बालियां दिखाई दें तो तना छेदक के प्रकोप की आशंका हो सकती है.
कृषि विभाग की जानकारी के अनुसार तना छेदक की निगरानी और नियंत्रण के लिए खेत में 8 से 10 फेरोमोन ट्रैप प्रति हेक्टेयर लगाए जा सकते हैं. इससे कीटों की निगरानी और संख्या कम करने में मदद मिल सकती है. जरूरत पड़ने पर कीटनाशकों का प्रयोग भी करना चाहिए. जानकारी के अनुसार, कार्बोफ्यूरान 3 जी की 25 किलोग्राम मात्रा या फिप्रोनिल 0.3 जी की 20 से 25 किलोग्राम मात्रा और कार्टैप हाइड्रोक्लोराइड 4 जी की 20 से 25 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में नमी की स्थिति में इस्तेमाल किया जा सकता है.
फसल में बालियां निकलने की अवस्था में कुछ दवाओं के छिड़काव की भी सलाह दी गई है. इसमें ऐसिफेट 75 प्रतिशत एसपी 1.5 ग्राम, फिप्रोनिल 5 प्रतिशत एससी 2 मिलीलीटर, क्लोरपाइरीफॉस 50 प्रतिशत + साइपरमेथ्रिन 5 प्रतिशत ईसी 1.5 मिलीलीटर, लेम्बडा साइहेलोथ्रिन 5 प्रतिशत ईसी 1 मिलीलीटर या क्विनालफॉस 25 प्रतिशत ईसी 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करने की जानकारी दी गई है.
धान में दूसरा प्रमुख कीट पत्ता लपेटक है. इसका कीट हरे रंग का होता है और यह पौधे की पत्तियों को दोनों किनारों से रेशमी धागे की मदद से जोड़कर उनके अंदर छिप जाता है. इसके बाद यह पत्ती के हरे हिस्से को खाता रहता है. इस कीट के प्रकोप के कारण पत्तियों पर नुकसान के निशान दिखाई देने लगते हैं और पौधे की प्रकाश संश्लेषण क्षमता प्रभावित होती है. ज्यादा प्रकोप होने पर पौधे की बढ़वार और फसल की उत्पादकता पर असर पड़ता है.
कृषि विभाग ने सबसे पहले मित्र कीटों का संरक्षण करने की सलाह दी है. जरूरत पड़ने पर नीम आधारित कीटनाशक एजाडिरेक्टिन 1500 पीपीएम की 5 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव किया जा सकता है. इसके अलावा क्लोरपाइरीफॉस 20 प्रतिशत ईसी की 3 मिलीलीटर, लेम्बडा साइहेलोथ्रिन 5 प्रतिशत ईसी की 1 मिलीलीटर या क्विनालफॉस 25 प्रतिशत ईसी की 2 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने की जानकारी दी गई है.
धान की फसल में कीट नियंत्रण के लिए सबसे जरूरी है कि किसान खेत की नियमित निगरानी करते रहें. सूखी या सफेद बालियां, पत्तियों का मुड़ना और पत्तियों के अंदर कीट छिपा होना जैसे लक्षण दिखाई देने पर तुरंत ध्यान देना दें. हर बार सीधे रासायनिक कीटनाशक का इस्तेमाल करने के बजाय पहले फेरोमोन ट्रैप, बर्ड पर्चर, प्रकाश फंदे और मित्र कीटों के संरक्षण जैसे उपायों को भी अपना सकते हैं. दवा का छिड़काव करते समय उसकी सही मात्रा और लेबल पर दिए निर्देशों का पालन करना भी जरूरी है. कृषि विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि किसी भी तरह की अतिरिक्त जानकारी या समस्या होने पर वे अपने सहायक निदेशक, पौधा संरक्षण, जिला कृषि पदाधिकारी या कृषि समन्वयक से संपर्क कर सकते हैं.