
आजकल बढ़ती गर्मी सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि फसलों के लिए भी बड़ा खतरा बनती जा रही है. सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि गर्मी का असर तुरंत दिखाई नहीं देता. खेत में फसल ऊपर से हरी-भरी और ठीक नजर आती है, लेकिन अंदर ही अंदर वह कमजोर होने लगती है. किसान को जब तक नुकसान समझ आता है, तब तक पैदावार पर असर पड़ चुका होता है.
विशेषज्ञों के अनुसार जब तापमान 35 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंचता है, तब फसलों पर हीट स्ट्रेस यानी गर्मी का दबाव बढ़ने लगता है. यह ऐसा खतरा है जो बिना शोर या दिखाई दिए धीरे-धीरे फसल को नुकसान पहुंचाता है. पौधों के अंदर कई जरूरी चीजें प्रभावित होने लगती हैं.
सबसे पहले परागण यानी पोलिनेशन कमजोर हो जाता है, जिससे फूल सही तरीके से फल या दाने में नहीं बदल पाते. इसके बाद पौधों के छोटे-छोटे छेद, जिन्हें स्टोमेटा कहा जाता है, बंद होने लगते हैं. इससे पौधे में पानी और पोषक तत्वों का प्रवाह रुकने लगता है. धीरे-धीरे पौधा कमजोर पड़ जाता है और उत्पादन कम हो जाता है.
पहले गर्मी कुछ दिनों के लिए पड़ती थी, लेकिन अब जलवायु परिवर्तन के कारण लंबे समय तक तेज तापमान बना रहता है. यही वजह है कि हीट स्ट्रेस अब खेती के लिए सबसे बड़ा “खतरा” बन चुका है. इसका असर गेहूं, सब्जियों, फलों और दालों जैसी कई फसलों पर साफ देखने को मिल रहा है.
कई किसान अब नई तकनीकों और छोटे-छोटे उपायों से अपनी फसल को गर्मी से बचाने की कोशिश कर रहे हैं. खेतों में काओलिन क्ले स्प्रे का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे पौधों पर गर्मी का असर कम पड़ता है. कुछ किसान शेड नेट लगाकर फसलों को सीधी धूप से बचा रहे हैं.
इसके अलावा हीट-टॉलरेंट यानी गर्मी सहने वाली किस्मों का चयन और बुवाई की तारीख बदलना भी काफी मददगार साबित हो रहा है. सही समय पर किया गया छोटा कदम किसानों की पूरी फसल बचा सकता है.
विशेषज्ञ मानते हैं कि अब खेती सिर्फ मेहनत से नहीं, बल्कि मौसम की समझ से भी चलेगी. अगर किसान समय रहते गर्मी के खतरे को समझ लें और तैयारी कर लें, तो पैदावार को काफी हद तक बचाया जा सकता है. क्योंकि कई बार फसल का सबसे बड़ा दुश्मन वही होता है, जो दिखाई ही नहीं देता.
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