
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की ताजा भविष्यवाणी के बाद उत्तर प्रदेश में मौसम का मिजाज कुछ बदला-बदला रहेगा. मौसम विभाग का कहना है कि आने वाले 3 से 5 दिनों तक आसमान में बादलों की आवाजाही बनी रहेगी और धूल भरी आंधी के साथ हल्की बारिश की भी पूरी गुंजाइश है. आम के बागवानी करने वाले किसानों के लिए यह वक्त बहुत ही नाजुक है, क्योंकि बागों में आम के फल इस समय अपनी 'बढ़वार के दौर' में हैं. ऐसे में आंधी और बारिश से कच्चे फलों के गिरने का खतरा बढ़ जाता है. हालांकि, छोटे फलों का गिरना एक प्राकृतिक प्रक्रिया भी है, लेकिन आंधी की वजह से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए बागवानों को चौकन्ना रहना होगा. जो फल गिर जाएं, उन्हें बेकार समझकर फेंकने के बजाय उनका इस्तेमाल अचार या आमचूर जैसे कीमती उत्पाद बनाने में करना चाहिए, ताकि किसान आपदा में भी कुछ मुनाफा कमा सकें.
सीआईएसएच लखनऊ के अनुसार, आम के बागों में अक्सर देखा जाता है कि फल नीचे से काले पड़ने लगते हैं या फटने लगते हैं, जिसे आम बोलचाल में 'कोयली' रोग भी कहा जाता है. असल में यह कोई बीमारी नहीं बल्कि मिट्टी में 'बोरॉन' नाम के पोषक तत्व की कमी का नतीजा है. इसकी कमी को दूर करने के लिए बागवानों को फलों के विकास के दौरान 'सोलुबोर' या 'फॉलीबोर' का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर छिड़काव करें. अगर छिड़काव नहीं कर पा रहे हैं, तो मिट्टी के जरिए भी इसकी कमी पूरी की जा सकती है. इसके लिए बरसात के मौसम में या मानसून के तुरंत बाद 50 से 100 ग्राम बोरेक्स प्रति पेड़ की दर से जड़ों के पास मिट्टी में मिला देना चाहिए. बोरॉन का सही इंतजाम न सिर्फ फलों को गिरने से रोकता है, बल्कि उनकी चमक और मिठास में भी इजाफा करता है.
मई के महीने में जब गर्मी परवान चढ़ती है, तब आम के दुश्मन 'फल छेदक कीट' और कई तरह की सूंडियां बागों पर हमला बोल देती हैं. ये सूंडियां इतनी खतरनाक होती हैं कि शुरू में नई और मुलायम पत्तियों को निशाना बनाती हैं और फिर धीरे-धीरे फलों के भीतर तक पैठ बना लेती हैं. अक्सर देखा गया है कि जहां दो फल आपस में छू रहे होते हैं, वहां ये सूंडियां जाला बुनकर छिप जाती हैं और छिलके को कुतरकर अंदर घुस जाती हैं. इनके हमले की पहचान यह है कि प्रभावित फलों से चिपचिपा लासा या द्रव्य निकलने लगता है. इसके बाद सड़न पैदा करने वाली फफूंद वहां पनपने लगती है, जिससे पूरा फल अंदर से गल जाता है. इससे निजात पाने के लिए सबसे पहले गिरे हुए और खराब फलों को इकट्ठा करके जमीन में दबा देना चाहिए. रासायनिक रोकथाम के लिए 'लैम्ब्डा-साइलोथ्रिन' की 1.0 मिलीलीटर मात्रा को प्रति लीटर पानी में घोलकर 15-15 दिनों के अंतराल पर दो बार स्प्रे करना बेहद असरदार साबित होता है.
अक्सर किसान इस बात से परेशान रहते हैं कि उनके बाग में छोटे-छोटे फल बहुत ज्यादा गिर रहे हैं. यहां यह समझना जरूरी है कि जिन फलों में परागण सही से नहीं हो पाता, उनका गिरना तय है और उन्हें किसी भी दवा से रोका नहीं जा सकता. अमूमन 2 से 5 ग्राम वजन वाले ऐसे फल खुद-ब-खुद झड़ जाते हैं. लेकिन जो फल परागण युक्त हैं और फिर भी गिर रहे हैं, उनके बचाव के लिए सिंचाई का खास ख्याल रखना चाहिए. बाग की जमीन में हमेशा नमी बरकरार रखें ताकि पेड़ों को पानी की किल्लत न हो. जब फल मटर के दाने के बराबर हो जाएं, तब 'नेप्थलीन एसिटिक एसिड' का छिड़काव करना लाभकारी होता है. इसके लिए 20 फीसदी नेप्थलीन एसिटिक एसिड' वाले फॉर्मूलेशन की 0.5 से 1.0 मिलीलीटर मात्रा को एक लीटर पानी में घोलकर इस्तेमाल करें. यह छिड़काव फलों की पकड़ मजबूत करता है और उन्हें समय से पहले गिरने से बचाता है.
बढ़ती तपिश और लू के थपेड़ों से आम की फसल को बचाने के लिए सिंचाई का इंतजाम सबसे अहम है. जब तापमान 30-35 डिग्री के पार जाने लगे, तो बागों में नमी बनाए रखने के लिए हल्की सिंचाई करते रहना चाहिए. नमी की कमी से फल सूखकर गिर सकते हैं या उनकी बढ़त रुक सकती है. इसके साथ ही, फलों की बेहतर क्वालिटी और अच्छी पैदावार के लिए 0.5 प्रतिशत 'सल्फेट ऑफ पोटाश' और 0.5 प्रतिशत 'जिंक सल्फेट' का छिड़काव भी किया जाना चाहिए. पोटाश फलों में शक्कर की मात्रा बढ़ाता है जिससे आम ज्यादा रसीला और मीठा होता है, वहीं, जिंक पेड़ों की सेहत दुरुस्त रखता है. इन छोटे-छोटे मगर जरूरी एहतियाती उपायों को अपनाकर न सिर्फ की फल की हिफाजत कर सकते हैं, बल्कि बाजार में अपने उपज की बेहतर कीमत भी हासिल कर सकते हैं.