
किसान आमतौर पर अपने खेत की बुवाई से पहले उसकी कई बार जुताई करवाते हैं. उन्हें लगता है कि ज्यादा जुताई से फायदा मिलेगा. लेकिन, क्या यह धारणा खेती के लिए ठीक है या फिर नुकसानदायक, एक बार इसे समझ लेते हैं. कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक अत्यधिक जुताई करने से मिट्टी की संरचना में गिरावट आती है. अत्यधिक जुताई करने से मिट्टी बारीक कणों (पाउडर की तरह) में बदल जाती है. जब तेज हवा चलती है तब ये बारीक कण आसानी से उड़कर दूसरे जगह चले जाते हैं. इसके साथ ही ये कण आसानी से वर्षा जल के साथ मिलकर खेत से दूर बह जाते हैं. परिणाम यह होता है कि मिट्टी की उत्पादकता में कमी आ जाती है. हालांकि, यह कंडीशन बारानी क्षेत्रों में ही लागू होती है. बारानी क्षेत्र (Dryland farming) में खेतों की ज्यादा जुताई से किसानों को बचना चाहिए.
देश के कुल कृषि क्षेत्र का लगभग 52 फीसदी हिस्सा बारानी कृषि के तहत आता है. लेकिन, आप कहेंगे कि यह बारानी क्षेत्र और बारानी कृषि क्या है? दरअसल, यह असिंचित क्षेत्र होता है यानी जहां सिंचाई के साधन नहीं हैं और मिट्टी में पर्याप्त नमी नहीं है. बारिश कम होती है लेकिन खेती बारिश के पानी पर ही निर्भर होती है. बारानी कृषि एक पद्धति है, जो फसल उत्पादन के लिए बारिश के पानी पर निर्भर करती है. इसलिए ऐसे क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील होते हैं. मॉनसून में बदलाव से इन क्षेत्रों के किसानों को बड़ा असर पड़ता है.
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भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) से जुड़े कृषि वैज्ञानिकों अशोक कुमार इंदोरिया, सुमंत कुंडू, जी. प्रतिभा, के. श्रीनिवास, विनोद कुमार सिंह, सुवना सुकुमारन और केवी राव ने अपने एक लेख में बारानी कृषि के बारे में विस्तार से जानकारी दी है. इसमें बताया गया है कि बारानी कृषि एक पद्धति है, जो फसल उत्पादन के लिए वर्षाजल पर निर्भर करती है.
वर्षा आधारित क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील होते हैं. इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर आर्थिक रूप से कमजोर किसान रहते हैं. देश के बारानी क्षेत्रों में कुल जनसंख्या का 40 प्रतिशत एवं पशुधन जनसंख्या का 75 प्रतिशत हिस्सा निवास करता है. बारानी क्षेत्रों से कुल खाद्यान्नों का 44 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त होता है.
बारानी क्षेत्रों में काली मिट्टी, लाल मिट्टी, जलोढ़ मिट्टी, लेटराइट मिट्टी, पहाड़ी मिट्टी, मिश्रित मिट्टी और रेगिस्तानी मिट्टी प्रमुखता से पाई जाती हैं. इन क्षेत्रों में मुख्य तौर पर गेहूं, मक्का, सरसों, ज्वार, अरहर, मूंग, मोठ, बाजरा, कपास, सोयाबीन, धान और सरसों की खेती होती है. बारानी क्षेत्रों की मिट्टी अम्लीयता, क्षारीयता और लवणता, सतह पर पपड़ी के बनने, कम नमी धारण करने की क्षमता, कठोरता और फसल पोषक तत्वों की कमी से जूझ रही है.
कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक वर्तमान में तापमान में वृद्धि के साथ अन्य मौसमी आपदाएं जैसे-बाढ़, सूखा, चक्रवात, शीत लहर और अत्यधिक ठंड से कृषि उत्पादकता पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है. इससे खाद्य सुरक्षा पर गंभीर संकट मंडरा रहा है. भारतीय कृषि मॉनसून पर निर्भर है इसलिए यहां मौसम पैटर्न में बदलाव से किसानों को नुकसान हो रहा है. यही नहीं, मिट्टी की उर्वरा शक्ति कमजोर होने से भी संकट बढ़ रहा है. एक अनुमान के अनुसार वर्ष 1960 के दशक में 1 किलोग्राम उर्वरक देने से लगभग 30-40 किलोग्राम अनाज उत्पादन में बढ़ोतरी होती थी, जो आज घटकर महज 5-6 किलोग्राम रह गई है.
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