गन्ना-मक्का का यह मॉडल बना गेमचेंजर, इथेनॉल से किसानों की आय में जबरदस्त बढ़ोतरी

गन्ना-मक्का का यह मॉडल बना गेमचेंजर, इथेनॉल से किसानों की आय में जबरदस्त बढ़ोतरी

ICAR‑IIMR द्वारा विकसित गन्ना–मक्का सहफसली खेती मॉडल किसानों के लिए गेम चेंजर साबित हो रहा है. इससे गन्ने की उपज 28% और मक्का उत्पादन 3.5–5 टन/हेक्टेयर बढ़ा है, जबकि मक्का की लागत 75% तक घट गई. यह तकनीक इथेनॉल प्लांट्स को सालभर कच्चा माल उपलब्ध कराते हुए किसानों की कमाई में 1 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर तक अतिरिक्त बढ़ोतरी करती है.

Sugarcane Maize IntercroppingSugarcane Maize Intercropping
रवि कांत सिंह
  • New Delhi ,
  • Mar 26, 2026,
  • Updated Mar 26, 2026, 4:17 PM IST

देश में गन्ने की खेती का स्वरूप तेजी से बदल रहा है. जहां पहले गन्ना केवल चीनी और गुड़ के उत्पादन तक सीमित था, वहीं अब इथेनॉल उत्पादन के कारण यह किसानों के लिए अधिक लाभकारी फसल बनता जा रहा है. इथेनॉल की बढ़ती मांग ने गन्ना किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है.

भारत में करीब 54 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गन्ने की खेती होती है, जिसमें उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु प्रमुख राज्य हैं. परंपरागत रूप से गन्ने की फसल 10 से 15 महीने तक खेत में खड़ी रहती है, जिससे किसान इस दौरान अन्य फसलें नहीं ले पाते और उन्हें आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. साथ ही, चीनी मिलों की सीमित पेराई अवधि (3–5 महीने) के कारण इथेनॉल उत्पादन भी बाधित होता है.

सहफसली खेती का एक नया मॉडल

इन समस्याओं के समाधान के लिए ICAR-IIMR, लुधियाना ने गन्ना और मक्का की सहफसली खेती का एक नया मॉडल विकसित किया है, जिसे केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय का समर्थन मिला है. इस मॉडल का उद्देश्य उत्पादन बढ़ाना, सालभर चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करना और इथेनॉल के लिए लगातार कच्चा माल उपलब्ध कराना है.

इस सहफसली मॉडल में मक्का गन्ने के साथ उगाया जाता है, जो लगभग 100 दिनों में तैयार हो जाता है. शुरुआती दौर में जब गन्ने की वृद्धि धीमी होती है, तब मक्का तेजी से बढ़ता है और कटाई के बाद बाजार में अच्छा मूल्य दिलाता है. इसके बाद गन्ना अपनी पूरी बढ़वार लेता है. खेती की इस तकनीक में दोनों फसलें एक दूसरे से कुछ नहीं लेतीं, न एक दूसरे को कोई नुकसान पहुंचाती हैं. दोनों फसलों की वृद्धि का अपना चक्र होता है, जिसका इस्तेमाल कर वे बढ़ती और वृद्धि करती हैं.

मक्का की डिटॉपिंग का फायदा

महाराष्ट्र के सोलापुर और उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में किए गए पायलट प्रोजेक्ट में इस तकनीक के बेहद अच्छे रिजल्ट सामने आए हैं. वैज्ञानिकों ने पाया कि एक ही संसाधनों—खाद, पानी और कीटनाशकों—से दो फसलें उगाई जा सकती हैं. साथ ही, मक्का की डिटॉपिंग (ऊपरी कटाई) से गन्ने को पर्याप्त धूप मिलती है, जिससे उसकी वृद्धि तेज होती है और यह चारे के रूप में भी उपयोगी साबित होती है. मक्के की डिटॉपिंग करने से गन्ने को पर्याप्त सूरज की किरण और हवा मिलती रहती है जिससे उसकी वृद्धि में मदद मिलती है. मक्के के कटे हिस्से को मवेशियों को खिलाकर दूध उत्पादन में बढ़ोतरी ली जाती है.

इस तकनीक से गन्ने की पैदावार में 28% तक वृद्धि और मक्का उत्पादन में 3.5 से 5 टन प्रति हेक्टेयर की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. किसानों की आय में लगभग 1 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर तक का इजाफा हुआ है, जबकि मक्का की खेती की लागत में 75% तक कमी आई है. किसानों के लिए इससे अच्छी बात क्या होगी कि उनकी खेती का खर्च घट जाए और उत्पादन भी बढ़ जाए. 

इथेनॉल प्रोडक्शन में बढ़ोतरी

इस मॉडल का एक बड़ा फायदा इथेनॉल उद्योग को भी मिल रहा है. मक्का और गन्ना दोनों इथेनॉल उत्पादन के लिए उपयुक्त हैं, जिससे सालभर डिस्टिलरी को कच्चा माल मिलता रहता है. ICAR-IIMR के अनुसार, यदि इसे गन्ने के 50% क्षेत्र में अपनाया जाए तो हर साल 40–60 लाख टन मक्का का अतिरिक्त उत्पादन संभव है, जो देश की लगभग 500 इथेनॉल डिस्टिलरी के लिए स्थायी सप्लाई सुनिश्चित कर सकता है.

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