
धान की खेती में सबसे बड़ा और सिरदर्द भरा काम होता है नर्सरी से पौध उखाड़कर कीचड़ भरे खेतों में उसकी रोपाई करना. पारंपरिक तरीके से जब किसान हाथ से धान की रोपाई करते हैं, तो उन्हें कमरतोड़ मेहनत करनी पड़ती है. जून-जुलाई की चिलचिलाती धूप और उमस भरे मौसम में घंटों झुककर काम करने से मजदूरों की पीठ और घुटने जवाब दे जाते हैं. इस शारीरिक तकलीफ के साथ-साथ सबसे बड़ी मुसीबत आती है मजदूरों की भारी किल्लत की. सही वक्त पर मजदूर न मिलने से रोपाई में देरी होती है, जिससे फसल की पैदावार पर सीधा बुरा असर पड़ता है. ऊपर से हर साल बढ़ती मजदूरी की दरों और ठेकेदारों की मनमानी से किसानों की जेब पर भारी डाका पड़ता है. एक तरफ पानी की किल्लत, दूसरी तरफ डीजल की बढ़ती कीमतें और उस पर रोपाई का यह भारी-भरकम खर्च—साधारण किसान के लिए धान की खेती फायदे का सौदा नहीं, बल्कि घाटे का सौदा साबित होने लगती है.
पंजाब के जिला संगरूर के छोटे से गांव 'पेदनी' के रहने वाले किसान गुरसेवक सिंह भी हर साल इसी कशमकश और परेशानी से गुजरते थे. लेकिन उन्होंने इस लाचारी के आगे घुटने टेकने के बजाय कुछ नया करने की ठानी. गुरसेवक जानते थे कि अगर खेती को बचाना है, तो कोई न कोई ऐसा देसी और सस्ता जुगाड़ ढूंढना होगा जो बड़े और महंगे ट्रांसप्लांटर के बिना भी काम आसान कर दे. उन्होंने अपने तजुर्बे और सूझबूझ का इस्तेमाल करते हुए एक बेहद अनोखा आइडिया निकाला.
उन्होंने एक 14 फीट लंबा ट्रैक्टर से चलने वाला 'प्लैंकर' (लकड़ी तख्ता, जिसे आम भाषा में सुहागा या पाटा भी कहते हैं) तैयार किया. इस प्लैंकर के ऊपर उन्होंने एक नालीदार शीट फिट कर दी, जो मजदूरों के खड़े होने के लिए एक मजबूत और सुरक्षित प्लेटफॉर्म का काम करती है. यह साधारण सा दिखने वाला ढांचा आज धान के किसानों के लिए एक बहुत बड़ा वरदान साबित हो रहा है.
यह अनोखी और शानदार तरकीब बेहद आसान है और उतनी ही असरदार भी. खेत को अच्छे से कद्दू करने के बाद, इस 14 फीट लंबे प्लैंकर को ट्रैक्टर के पीछे जोड़ दिया जाता है. इस प्लैंकर पर बने प्लेटफॉर्म पर एक साथ छह लोग बड़े आराम से खड़े हो सकते हैं. ट्रैक्टर को बहुत ही धीमी रफ्तार में चलाया जाता है. जैसे-जैसे ट्रैक्टर धीरे-धीरे आगे बढ़ता है, प्लेटफॉर्म पर मौजूद छह मजदूर अपने हाथ में थामी हुई नर्सरी पौध को खेत में रोपते चले जाते हैं. हर एक शख्स एक बार में 3 कतारों में धान लगाने का काम करता है, यानी एक ही फेरे में कुल 18 कतारें लग जाती हैं.
ट्रैक्टर की गति इतनी सुस्त और नियंत्रित होती है कि मजदूरों को बिना किसी हड़बड़ाहट के, तसल्ली से और बिल्कुल सही दूरी पर धान रोपने का पूरा वक्त मिल जाता है. इस तरीके से न तो मजदूरों को कीचड़ में लगातार चलना पड़ता है और न ही घंटों झुककर अपनी कमर तोड़नी पड़ती है.
गुरसेवक सिंह के इस जुगाड़ी तकनीक से किसानों को सीधे तौर पर दो बड़े फायदे हुए हैं. समय और पैसों की बचत. आंकड़ों और तजुर्बे की नजर से देखें, तो इस देसी तकनीक के इस्तेमाल से धान की रोपाई में लगने वाले वक्त और खर्च में करीब 35 फीसदी तक की सीधी बचत होती है. जहां पहले रोपाई के सीजन में हजारों रुपये सिर्फ बाहरी मजदूरों को खोजने में नुकसान हो जाते थे, वहीं अब किसान अपने ही परिवार के सदस्यों या आस-पड़ोस के दो-चार हमदर्द किसानों के साथ मिलकर 'आपसी मदद' से पूरे खेत की रोपाई चुटकियों में निपटा लेते हैं.
आर्थिक रूप से देखें तो इस तकनीक की बदौलत प्रति हेक्टेयर 3,500 रुपये से लेकर 4,000 रुपये तक की बचत बहुत आसानी से हो जाती है. यह बचत किसी भी साधारण और मध्यम वर्गीय किसान के सालाना बजट को सुधारने के लिए काफी बड़ी रकम है.