
सरकार में बैठे लोग और दिल्ली दरबार वाले अर्थशास्त्री किसानों पर अक्सर यह आरोप लगाते हैं कि वो बदलना नहीं चाहते. कुछ नया नहीं करना चाहते. धान-गेहूं छोड़कर किसी और फसल की ओर देखते ही नहीं. क्रॉप डायवर्सिफिकेशन के रास्ते में किसान ही सबसे बड़ी बाधा हैं...न जाने उन पर ऐसी कितनी तोहमत लगाई जाती है. लेकिन जब किसान खुद को बदलता है, कुछ नया करता है तो सरकार और सिस्टम सब उसको बीच भंवर में छोड़ जाते हैं. ताजा उदाहरण मक्के का है. कहा गया था कि मक्का किसानों को ऊर्जादाता बना देगा. इससे इथेनॉल बनेगा जिसकी वजह से किसानों को ज्यादा दाम मिलेगा. किसानों ने सरकार और इंडस्ट्री की बातों पर यकीन करके मक्के की खेती का दायरा और उत्पादन बढ़ा लिया, लेकिन, अब उन्हें जो दाम मिल रहा है वो न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से कम से कम 1000 रुपये क्विंटल कम है. मक्का बाजार में हाहाकार मचा हुआ है. जिन किसानों को मक्का की खेती बढ़ाने के लिए पुरस्कृत किया जाना चाहिए था उन्हें बाजार और सरकार दोनों ने धोखा दे दिया.
इथेनॉल और पोल्ट्री फीड के लिए मक्के की मांग काफी बढ़ेगी. यही सब्जबाग दिखाकर किसानों से अपील की गई कि वो मक्के की खेती बढ़ा लें. वो अन्नदाता ही नहीं ऊर्जादाता भी कलाएंगे. लेकिन अब ऊर्जादाता बनने की उनकी चाहत और सरकारी वादे पर यकीन शुद्ध धोखे में बदल गया है. मक्के की खेती में धान-गेहूं के मुकाबले पानी की खपत बहुत कम होती है इसलिए यह पर्यावरण के लिहाज से अच्छी फसल मानी जाती है. पिछले पांच साल में ही भारत में मक्के की खेती का एरिया करीब 22 लाख हेक्टेयर और उत्पादन 118 लाख मीट्रिक टन बढ़ गया. किसानों ने अपना फर्ज निभा दिया तब सरकार और निजी क्षेत्र दोनों ने उसे मंझधार में छोड़ दिया.
पिछले 11 महीने से मक्के का दाम एमएसपी से नीचे ही है, फिर भी सरकार मौन बैठी है. कोई भी मंत्री और अधिकारी यह नहीं बता रहा है कि जिसे वो मक्के की खेती करके ऊर्जादाता बनाने का ख्वाब दिखा रहे थे उसे क्यों एमएसपी से बहुत कम कीमत पर मक्का बेचने को मजबूर होना पड़ रहा है. सवाल यह है कि मक्का किसान और कितने महीने तक घाटे में अपनी उपज बेचेंगे. जब उद्योगपतियों के लिए इथेनॉल का दाम फिक्स है, उसकी गारंटी मिली हुई है तो मक्के की कीमत क्यों फिक्स नहीं हो सकती.
इस समय मक्के का एमएसपी 2400 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि जनवरी 2026 के दौरान देश में इसका औसत बाजार भाव 1663.23 रुपये प्रति क्विंटल रहा. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का गृह प्रदेश एमपी देश का सबसे बड़ा मक्का उत्पादक है. जनवरी में मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में आने वाली रेहटी मंडी में मक्के का भाव 1486.4, शिवपुरी की खटोरा कृषि उपज मंडी में 1487.73 और विदिशा में 1496.35 रुपये प्रति क्विंटल रहा. जबकि सरकार खुद मानती है कि किसान प्रति क्विंटल मक्का पैदा करने में 1508 रुपये खर्च करता है. अब आप अंदाजा लगाईए कि किसानों को मक्के की खेती बढ़ाने का इनाम मिला या फिर धोखा.
सरकार ने इस समय 2400 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से जो मक्के की एमएसपी तय की हुई है वह ए2+एफएल (Actual paid out cost plus imputed value of family labour) फार्मूले के आधार पर तय की गई है, जबकि किसान सी-2 (Comprehensive Cost) फार्मूले के आधार पर एमएसपी तय करने की मांग कर रहे हैं. सी-2 फार्मूले की ही वकालत स्वामीनाथन कमीशन भी करता है.
इसके आधार पर प्रति क्विंटल मक्का पैदा करने में 1952 रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं. कृषि लागत और मूल्य आयोग ने इस आंकड़े की तस्दीक की है. इस फार्मूले के आधार पर लागत में 50 फीसदी का मुनाफा जोड़कर मक्के की एमएसपी 2928 रुपये प्रति क्विंटल होनी चाहिए. इसका मतलब यह है कि इस समय किसानों को मक्का पैदा करने पर जो खर्च किया, उसे वह भी नहीं मिल पा रहा है. ऐसे में आने वाले समय में मक्के के रकबे में गिरावट आना तय माना जा रहा है.
किसानों को क्यों मक्का की सही कीमत नहीं मिल रही है? यह सवाल आपके मन भी कौंध रहा होगा. आखिर ऐसा क्या हुआ कि इथेनॉल बनाने वाली कंपनियों ने मक्का लेना कम कर दिया. कमोडिटी एक्सपर्ट संतोष शर्मा के मुताबिक, 'सितंबर 2025 में केंद्र सरकार ने इथेनॉल को लेकर एक नया नियम लागू किया है. यदि कोई इथेनॉल प्लांट एक साल में एक लाख टन अनाज की खपता करता है तो उसमें 60 हजार मीट्रिक टन मक्का और 40 हजार मीट्रिक टन चावल रखना होगा.'
कहा जा रहा है कि इस नियम से इथेनॉल बनाने वाली कंपनियों को डबल नुकसान हो रहा है. मक्के का एमएसपी 2400 रुपये प्रति क्विंटल है, जो इससे कम कीमत पर भी उपलब्ध हो जाता है, जबकि भारतीय खाद्य निगम (FCI) वाले चावल का दाम 2,320 प्रति क्विंटल तय है. यानी चावल और मक्के का दाम लगभग बराबर है, जबकि चावल से बने इथेनॉल की कीमत मक्के से बने इथेनॉल की तुलना में 11.54 रुपये प्रति किलो कम है. चावल से बने इथेनॉल की कीमत 60.32 प्रति लीटर, जबकि मक्के से तैयार इथेनॉल का दाम 71.86 प्रति लीटर है. इस पॉलिसी ने काम मक्के का काम खराब कर दिया है.
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