सरसों में सफेद रस्ट का खतरा, समय रहते करें ये उपाय, वरना होगा नुकसान

सरसों में सफेद रस्ट का खतरा, समय रहते करें ये उपाय, वरना होगा नुकसान

सरसों की फसल में सफेद रस्ट और पाउडरी मिल्ड्यू रोग किसानों को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं. पत्तियों पर सफेद फफोले दिखें तो समय पर उपचार जरूरी है. जानें रोगों के लक्षण, नुकसान और सरसों की बेहतर पैदावार के लिए आसान व कारगर बचाव के तरीके.

सरसों में सफेद रस्ट का खतरासरसों में सफेद रस्ट का खतरा
क‍िसान तक
  • Noida ,
  • Jan 26, 2026,
  • Updated Jan 26, 2026, 9:27 AM IST

सरसों रबी सीजन की प्रमुख तिलहनी फसल है, जिसे देशभर के किसान बड़े पैमाने पर उगाते हैं. कम लागत, कम सिंचाई और बेहतर मुनाफे के कारण सरसों को किसान “पीला सोना” भी कहते हैं. यह फसल न केवल किसानों की आमदनी बढ़ाती है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और मिट्टी की सेहत सुधारने में भी अहम भूमिका निभाती है. लेकिन बदलते मौसम और बढ़ते रोगों के कारण सरसों की फसल पर खतरा बढ़ता जा रहा है, जिससे किसानों की चिंता भी बढ़ गई है.

मौसम के उतार-चढ़ाव से बढ़ा रोगों का खतरा

मौजूदा समय में तापमान और नमी में लगातार बदलाव देखने को मिल रहा है. ऐसे मौसम में सरसों की फसल पर सफेद रस्ट और पाउडरी मिल्ड्यू जैसे रोग तेजी से हमला करते हैं. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार ये दोनों रोग समय पर नियंत्रण न किए जाएं तो फसल को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं. इनका सीधा असर पौधों की बढ़वार, दानों के आकार और तेल की मात्रा पर पड़ता है.

सफेद रस्ट और पाउडरी मिल्ड्यू के लक्षण

सफेद रस्ट रोग में सरसों की पत्तियों की निचली सतह पर छोटे-छोटे सफेद फफोले दिखाई देने लगते हैं. धीरे-धीरे ये फफोले बढ़ जाते हैं, जिससे पौधे का प्रकाश संश्लेषण रुक जाता है और पौधा कमजोर व विकृत हो जाता है. वहीं पाउडरी मिल्ड्यू यानी चूर्णिल आसिता में पत्तियों पर सफेद पाउडर जैसी परत जम जाती है, जिससे पत्तियां सूखने लगती हैं. यदि इन रोगों पर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो पैदावार में 30 से 60 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है.

समय पर उपचार क्यों है जरूरी

सरसों की अच्छी पैदावार और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए रोगों की पहचान और उनका समय पर इलाज बेहद जरूरी है. देर होने पर न केवल दानों का आकार छोटा रह जाता है, बल्कि तेल की मात्रा और गुणवत्ता भी प्रभावित होती है, जिससे किसानों को सीधा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है.

रोगों से बचाव के आसान और कारगर उपाय

सरसों की फसल को रोगों से बचाने के लिए किसानों को शुरुआत से ही सतर्क रहना चाहिए. बुवाई से पहले बीज उपचार जरूर करें और प्रमाणित बीजों का ही उपयोग करें. यदि खेत में रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई दें, तो प्रभावित पत्तियों और टहनियों को तुरंत तोड़कर खेत से बाहर 2 फीट गहरे गड्ढे में दबा दें. सफेद रस्ट के नियंत्रण के लिए मैंकोजेब या जिनेब की 2 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें. वहीं पाउडरी मिल्ड्यू से बचाव के लिए घुलनशील गंधक (सल्फर) का छिड़काव करना प्रभावी माना जाता है. सही समय पर सही दवा का इस्तेमाल कर किसान अपनी सरसों की फसल को सुरक्षित रख सकते हैं और बेहतर उत्पादन हासिल कर सकते हैं.

समय पर सावधानी और वैज्ञानिक तरीके अपनाकर सरसों की फसल को रोगों से बचाया जा सकता है और “पीले सोने” से अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है.

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