सुपरफूड’ जौ की वापसी: DBWR-244 छिलका रहित किस्म से सेहत और खेती दोनों में फायदा

सुपरफूड’ जौ की वापसी: DBWR-244 छिलका रहित किस्म से सेहत और खेती दोनों में फायदा

बिना छिलका वाले जौ DBWR-244 की बाजार में काफी अच्छी मांग है. किसानों की आय बढ़ाने में भी मददगार साबित होगी. बाजार में हेल्दी फूड की बढ़ती मांग के बीच छिलका रहित जौ किसानों की आमदनी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता हैं.

जौ की होगी घर वापसीजौ की होगी घर वापसी
धर्मेंद्र सिंह
  • Karnal ,
  • Apr 16, 2026,
  • Updated Apr 16, 2026, 5:17 PM IST

जौ दुनिया का सबसे प्राचीन अनाज माना गया है. 8000 से लेकर 10000 ईसा पूर्व तक जौ की खेती के प्रमाण मिलते हैं. भारत में प्राचीन समय से जौ की खेती का विशेष महत्व रहा है. सिंधु घाटी सभ्यता में भी जौ के उपयोग के प्रमाण मिलते हैं, लेकिन समय के साथ यह पौष्टिक अनाज भारतीय थाली से धीरे-धीरे दूर होता चला गया. इसका मुख्य कारण गेहूं का बढ़ता उत्पादन और जौ के छिलके की वजह से इसे पकाने और खाने में आने वाली कठिनाई रही.

अब इस समस्या का समाधान भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल ने निकाल लिया है. संस्थान के वैज्ञानिकों ने छिलका रहित जौ की नई किस्में DBWR-223 और DBWR-244 विकसित की हैं, जो सीधे गेहूं की तरह उपयोग में लाई जा सकती हैं.

गेहूं की तरह इस्तेमाल होगी नई किस्म

इनमें से DBWR-244 एक खास वैरायटी है, जो पूरी तरह छिलका रहित है. इस किस्म को बिना अतिरिक्त प्रोसेसिंग के सीधे आटे या अन्य खाद्य उत्पादों में इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे न केवल उपभोक्ताओं के लिए इसे अपनाना आसान होगा, बल्कि बाजार में इसकी मांग भी तेजी से बढ़ सकती है.

कम समय में ज्यादा उत्पादन

यह नई किस्म 120 से 125 दिनों में तैयार हो जाती है और इसकी औसत उपज लगभग 5 टन प्रति हेक्टेयर तक बताई जा रही है. यानी यह किस्म किसानों के लिए कम समय में बेहतर उत्पादन और अधिक मुनाफा देने वाली साबित हो सकती है.

37 साल बाद मिली बड़ी सफलता

देश में आखिरी बार साल 1989 में छिलका रहित जौ की एक किस्म विकसित की गई थी. अब करीब 37 साल बाद वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र में नई सफलता हासिल की है. संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. रविंद्र सिंह शेखावत के अनुसार, यह किस्म अपने औषधीय गुणों और बेहतर उत्पादन क्षमता के कारण किसानों के लिए बेहद फायदेमंद साबित होगी.

सेहत के लिए ‘सुपरफूड’

नई जौ की किस्म पोषक तत्वों से भरपूर है. इसमें मौजूद बीटा-ग्लूकॉन शरीर के लिए बेहद लाभकारी माना जाता है. यह मधुमेह, बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल, हृदय और लीवर से जुड़ी समस्याओं को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है.

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह तत्व आंतों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है, घाव भरने में सहायक है और न्यूरो-प्रोटेक्टर के रूप में भी काम करता है. इसके साथ ही यह किडनी स्टोन बनने की संभावना को भी कम करता है.

पोषण के मामले में भी अव्वल

इस किस्म में बीटा-ग्लूकॉन की मात्रा 6 से 8 प्रतिशत तक है, जबकि प्रोटीन 12 प्रतिशत से अधिक पाया गया है. खास बात यह है कि इसमें गेहूं की तुलना में लगभग आधा ग्लूटन होता है, जिससे यह ग्लूटन-संवेदनशील लोगों के लिए बेहतर विकल्प बन सकता है.

इसके अलावा, इसमें आयरन 44 पीपीएम और जिंक 48 पीपीएम पाया गया है, जो अब तक विकसित गेहूं और जौ की किस्मों में काफी अधिक माना जा रहा है.

किसानों के लिए बेहतर अवसर

कृषि विशेषज्ञों का मानना है की जौ आज भी अपनी विशेषताओं के चलते काफी लोकप्रिय है. वहीं किसानों के द्वारा छिलका रहित प्रजाति की बाजार में काफी अच्छी मांग है. किसानों की आय बढ़ाने में भी मददगार साबित होगी. बाजार में हेल्दी फूड की बढ़ती मांग के बीच छिलका रहित जौ किसानों के लिए एक नया और लाभकारी विकल्प बनकर उभर सकता है.

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