
महाराष्ट्र के विदर्भ जिले के किसान इस समय तिहरी मार झेल रहा है. पहले मॉनसून की देरी, फिर कई किसानों को सोयाबीन के बीजों का अंकुरण नहीं होने से दोबारा बुवाई और अब पिछले एक हफ्ते से बारिश थमने के कारण खेतों में खड़ी फसल सूखने लगी है. विदर्भ की 80 से 85 प्रतिशत खेती आज भी सिर्फ मानसून पर निर्भर है. ऐसे में किसान खेतों में गुड़ाई कर बची हुई नमी फसलों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि अगले आठ से दस दिनों तक अच्छी बारिश के संकेत नहीं हैं. ऐसे में सवाल यही है कि क्या तब तक फसल बच पाएगी?
इस साल विदर्भ में मॉनसून की शुरुआत देर से हुई. शुरुआती बारिश के बाद किसानों ने बड़े पैमाने पर सोयाबीन, कपास, धान और तूर की बुवाई कर दी. लेकिन सामान्य के मुकाबले अब तक कम बारिश का केवल करीब 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा ही दर्ज हो पाया है, जिससे बारिश का बैकलॉग बना हुआ है. पिछले एक हफ्ते से बारिश लगभग थम सी गई है. खेतों की नमी खत्म हो रही है, जिससे सोयाबीन की पत्तियां मुरझाने लगी हैं, कपास के पौधे गर्दन झुकाने लगे हैं. ऐसे में किसान ट्रैक्टर और हल से गुड़ाई कर मिट्टी के भीतर की बची हुई नमी फसल तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन लगातार बढ़ती गर्मी और बारिश के इंतजार ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है.
इस बार संकट सिर्फ बारिश का नहीं है. खरीफ सीजन की शुरुआत में कई किसानों ने सोयाबीन के बीजों का अंकुरण नहीं होने की शिकायत की थी. कई कंपनियों के बीज खराब निकलने के कारण हजारों किसानों को दोबारा बुवाई करनी पड़ी. पहली बुवाई में बीज, खाद और मजदूरी का खर्च हुआ. वहीं, दूसरी बार फिर से खेत तैयार कर बुवाई करनी पड़ी और अब वही दूसरी बार बोई गई फसल भी बारिश नहीं होने से सूखने लगी है. इतना ही नहीं, विदर्भ में अभी भी लगभग 25 प्रतिशत क्षेत्र में खरीफ की बुवाई बाकी है, लेकिन बारिश नहीं होने के कारण किसान खेतों में बीज डालने का जोखिम नहीं उठा पा रहे हैं. यानी एक तरफ दोबारा बोई गई फसल बचाने की चुनौती है और दूसरी तरफ बाकी बची बुवाई का संकट.
अकोला जिले के सिसामासा गांव के किसान संतोष खरोटकर और उनके भाई प्रमोद खरोटकर ने सोयाबीन और कपास की बुवाई की है. दोनों भाई पिछले कई दिनों से खेत में लगातार गुड़ाई कर रहे हैं, ताकि जमीन के अंदर बची हुई नमी पौधों तक पहुंच सके. लेकिन अब उनका कहना है कि अगर अगले दो-तीन दिनों में बारिश नहीं हुई तो पूरी फसल खत्म हो जाएगी. उन्होंने बताया कि खेती के लिए बैंक से कर्ज लिया, घर का सोना गिरवी रखा अब अगर बारिश नहीं हुई तो फसल भी नहीं बचेगी और कर्ज भी नहीं चुका पाएंगे. किसान प्रमोद खरोटकर ने कहा कि हम दिन-रात खेत में मेहनत कर रहे हैं. लेकिन पानी नहीं होने से फसल आंखों के सामने मर जाएगी.
अकोला के अलावा अमरावती, बुलढाणा, वाशिम, यवतमाल से लेकर नागपुर, भंडारा, चंद्रपुर, गोंदिया और गढ़चिरौली तक किसान इसी संकट से जूझ रहे हैं. वहीं, धान उत्पादक जिलों में भी पर्याप्त बारिश नहीं होने से खेत सूखने लगे हैं. अगर अगले कुछ दिनों में अच्छी बारिश नहीं हुई तो खरीफ के साथ-साथ रबी सीजन पर भी इसका सीधा असर पड़ सकता है.
विभाग प्रमुख, कृषि विद्याविभाग, डॉ. पंजाबराव देशमुख कृषि विद्यापीठ, अकोला की डॉ. अनीता चोरे के अनुसार, जिन किसानों की खरीफ फसल 25 से 30 दिन की हो चुकी है, वे फसल पर पोटेशियम नाइट्रेट का अनुशंसित मात्रा में छिड़काव करें. इससे नमी की कमी और गर्मी के तनाव से पौधों को कुछ समय के लिए राहत मिल सकती है और उनकी बढ़वार बनाए रखने में मदद मिलती है. उन्होंने बताया कि अगले 8 से 10 दिनों तक अच्छी बारिश की संभावना कम दिखाई दे रही है. ऐसे में किसानों को अपनी फसलों की नियमित निगरानी करनी चाहिए और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार सिंचाई और अन्य आवश्यक कृषि प्रबंधन के उपाय अपनाने चाहिए.
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जल्द पर्याप्त बारिश नहीं हुई और यही स्थिति बनी रही, तो इसका असर खरीफ फसलों के उत्पादन पर पड़ सकता है. साथ ही मिट्टी में नमी की कमी के कारण रबी सीजन की बुवाई और उत्पादन भी प्रभावित होने की आशंका रहेगी. इसलिए किसानों को मौसम के पूर्वानुमान पर लगातार नजर रखते हुए कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार खेती का प्रबंधन करना चाहिए.