
आज जब बाजारों में चीनी के दाम बेतहाशा बढ़कर आसमान छू रहे हैं और आम आदमी की चाय की मिठास कड़वी हो गई है, तब जाकर हमारी सरकार की नींद टूटी है. अब इस बेलगाम महंगाई का 'पोस्टमार्टम' शुरू हुआ है. हाल ही में केंद्रीय खाद्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने बाकायदा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और बताया कि चीनी के बढ़ते दामों की मुख्य वजह खराब मौसम और गन्ने को लगने वाली ‘रेड रॉट’ यानी लाल सड़न बीमारी है. उन्होंने देश को बताया कि इस साल 340 लाख टन चीनी बनने की उम्मीद थी, लेकिन 2025-26 के सीजन में उत्पादन महज 306 लाख टन पर ही सिमट कर रह गया.
हैरानी की बात यह है कि सिस्टम को यह सब तब याद आ रहा है, जब वह पहले ही 15-16 लाख टन चीनी एक्सपोर्ट करने की हरी झंडी दे चुका था, जिसमें से करीब 7-8 लाख टन चीनी देश के बाहर जा भी चुकी है. नतीजतन, बाजार में जो चीनी कुछ समय पहले तक 45 से 48 रुपये प्रति किलो बिक रही थी, वह रातों-रात छलांग लगाकर 55 से 65 रुपये तक पहुंच गई. जब हालात पूरी तरह बेकाबू होने लगे और जनता का गुस्सा बढ़ने लगा, तो सरकार ने डैमेज कंट्रोल करते हुए आनन-फानन में 13 मई 2026 को एक्सपोर्ट पर फौरन पाबंदी लगा दी. अब आने वाले त्योहारी सीजन को देखते हुए चीनी के दामों को काबू करने के लिए सरकार ने एक और बड़ा कदम उठाया है. तकरीबन एक दशक में पहली बार ऐसा हुआ है कि 31 अक्टूबर 2026 तक 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी को बिना किसी इंपोर्ट ड्यूटी के विदेशों से मंगाने की परमिशन दे दी गई है.
इस पूरे वाकये में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि यह परेशानी कोई रातों-रात आसमान से नहीं टपकी है. इस तबाही की आहट बहुत पहले सुनाई दे गई थी. ठीक एक साल पहले, 30 सितंबर 2025 को नई दिल्ली के प्रतिष्ठित पूसा कैंपस में सहकारी गन्ना मिल संघ की एक बड़ी सभा आयोजित हुई थी. इसी खुले मंच से केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बिल्कुल साफ लफ्जों में अंदेशा जता दिया था कि गन्ने की सबसे बंपर पैदावार देने वाली 'Co-0238' किस्म अब 'लाल सड़न' यानी 'रेड रॉट' रोग का सबसे बड़ा शिकार बन चुकी है. रेड रॉट गन्ने की फसल के लिए एक बेहद खतरनाक बीमारी है, जिसे 'गन्ने का कैंसर' भी कहा जाता है, जो उपज को भारी नुकसान पहुंचा रही थी.
बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती. कई अन्य मंचों से भी कृषि विशेषज्ञों ने साल 2025 के अप्रैल-मई के दौरान गन्ने पर कहर बरपाने वाले 'टॉप बोरर' कीड़े को लेकर भी खतरे की घंटी बजा दी थी. खेतों में क्या हो रहा है, यह सब कुछ शीशे की तरह साफ था, लेकिन इसके बावजूद पूरा का पूरा सरकारी सिस्टम एसी कमरों में बैठकर गहरी नींद सोता रहा.
अगर इस संकट की जड़ में जाएं, तो गन्ने की पैदावार घटी या बढ़ी, इसका जवाब एक मशहूर गन्ने की किस्म की कहानी में छिपा है. पूरे देश में जहां 55 से 60 लाख हेक्टेयर में गन्ना बोया जाता है, वहीं अकेले यूपी में ही इसका रकबा 20 से 22 लाख हेक्टेयर के आस-पास है. एक वक्त था जब इसी यूपी में गन्ने की जादुई किस्म 'Co 0238' ने तहलका मचा रखा था. इसके आने से पहले जहां चीनी की रिकवरी महज 9 फीसदी और पैदावार 240-280 क्विंटल प्रति एकड़ होती थी, वहीं इस शानदार किस्म ने रिकवरी को 12-14 फीसदी और पैदावार को 480-500 क्विंटल तक पहुंचाकर किसानों और मिलों को जबरदस्त मुनाफा दिया था.
अकेले यूपी में ही साल 2021-22 तक गन्ने के कुल एरिया के 87 फीसदी हिस्से पर सिर्फ यही किस्म राज करती थी. लेकिन फिर इसे 'गन्ने के कैंसर' रेड रॉट की ऐसी नजर लगी कि इसने गन्ने को अंदर से लाल और खोखला कर दिया. सहारनपुर के पद्मश्री से सम्मानित प्रगतिशील किसान सेठपाल जी की बात इस जमीनी हकीकत को बिल्कुल सच साबित करती है. उनका दर्द है कि जहां पहले 400-500 क्विंटल तक गन्ना निकलता था, वो अब 300 से अधिकतम 350 क्विंटल पर सिमट गया है, और नई किस्में बोने पर भी Co 0238 के मुकाबले 20 से 30 फीसदी कम ही पैदावार मिल रही है.
आज (2025-26) हालात ये हैं कि बीमारी और सरकारी हिदायतों के चलते Co 0238 की बुवाई 87 फीसदी से लुढ़ककर महज 29 फीसदी रह गई है. सीधे शब्दों में कहें तो, इस बंपर पैदावार वाली किस्म के रकबे में पूरे 58 फ़ीसदी की भारी गिरावट आई है. अब जाहिर सी बात है कि जब सबसे ज्यादा पैदावार देने वाली किस्म का एरिया 58 फीसदी कम हो जाएगा और नई किस्मों से भी वैसी पैदावार नहीं मिलेगी, तो कुल उत्पादन भी धड़ाम से गिरेगा ही. दूसरी ओर, सरकारी फाइलों में पैदावार कैसे बढ़ गई?
यहीं से शुरू होता है सिस्टम की बाजीगरी का असली खेल. गन्ने की फसल तैयार होने में पूरा एक साल लगता है, इसलिए 2024-25 की बुवाई ही 2025-26 की पैदावार तय करती है. जमीनी हकीकत यह थी कि साल 2023-24 में देश में गन्ने का कुल रकबा 57.39 लाख हेक्टेयर था, जो 2024-25 में करीब 3 लाख हेक्टेयर सिकुड़कर 54.49 लाख हेक्टेयर रह गया था.
मगर राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार में बैठे अफसरों का हाल देखिए! यह बात बिल्कुल समझ से बाहर है कि जमीन पर उत्पादन घटने के बावजूद, गन्ना विभाग और कृषि मंत्रालय ने कागजों पर उत्पादन का आंकड़ा बढ़ाकर कैसे दिखा दिया. हकीकत से आंखें चुराकर, अफसरों ने अपनी नाकामी छिपाने के लिए फाइलों में ऐसा फरेब बुना कि 2025-26 के लिए गन्ने का उत्पादन 45.46 करोड़ टन बता दिया गया, जबकि ज्यादा रकबे वाले पिछले साल 2023-24 में यह 45.31 करोड़ टन था.
कागज़ों पर 15 लाख टन अधिक गन्ना उगाने का यह तिलिस्म देश को गुमराह करने की एक सोची-समझी कोशिश थी, जिसे 12 दिसंबर की पीआईबी प्रेस रिलीज में भी बड़ी शान से बताया गया था. शायद ये कागजी बाजीगरी इसलिए की गई क्योंकि विभाग अपनी 10 साल की इस बड़ी कामयाबी का रुतबा इतनी आसानी से कम नहीं होने देना चाहता था.
अगर आप फाइलों के इस फरेब से बाहर निकलकर जमीनी हकीकत पर गौर करेंगे, तो हर तरफ किसानों और शुगर मिलों की गहरी मायूसी ही नजर आएगी. उत्तर प्रदेश के रूपापुर शुगर मिल के एक बड़े अफसर ने खुद यह कुबूल किया है कि भारी बारिश, बाढ़ और बीमारी के चलते पिछले साल की तुलना में इस बार करीब 12 लाख टन गन्ना मिल तक कम पहुंचा है.
बिल्कुल यही बदहाली उत्तर प्रदेश के घाटमपुर गन्ना विकास सोसायटी इलाके में भी दिखी. इस एरिया से 2023-24 में जहां 13 लाख टन गन्ने की सप्लाई मिलों को होती थी, वहीं 2024-25 और 2025-26 के पेराई सत्र में वहां से अब महज 6.25 लाख टन गन्ना ही मिलों तक पहुंच सका है. यह गिरावट आधे से भी अधिक है. शाहजहांपुर के एक प्रगतिशील किसान कौशल मिश्रा का दर्द भी सिस्टम के दावों की पोल खोलता है. उनका कहना है कि मौसम की दोहरी मार और जमीन की घटती उर्वरा शक्ति की वजह से उनका उत्पादन 2 साल पहले तक जो 1000 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हुआ करता था, वह अब गिरकर सिर्फ 850 क्विंटल रह गया है.
गन्ने के इन झूठे आंकड़ों का सीधा असर चीनी के दाम और आम जनता की जेब पर पड़ा है. 340 लाख टन का सुनहरा ख्वाब दिखाने वाले कागजी दावों और 306 लाख टन की जमीनी हकीकत के बीच का यह 34 लाख टन का भारी फासला, चीख-चीख कर सिस्टम की नाकामी की गवाही दे रहा है. इसी बढ़े हुए गन्ना उत्पादन के झूठे आंकड़ों के भरोसे सरकार में बैठे नीति-निर्धारकों ने चीनी का इथेनॉल में इस्तेमाल करने और विदेश में एक्सपोर्ट करने की मंजूरी दे दी. मुनाफे के लालच में शुगर मिलों ने भी बिना देर किए चीनी देश के बाहर भेज दी.
इस पूरी संगीन दास्तां से एक बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि गन्ने के रकबे का सर्वे करने वाले छोटे कर्मचारियों से लेकर राज्य गन्ना विभाग के बड़े अफसरों तक, सबने जमीनी हकीकत से आंखें चुराईं. इधर, केंद्र का कृषि मंत्रालय इन्हीं फर्जी आंकड़ों को ढोता रहा और उधर, खाद्य मंत्रालय ने बिना जांचे-परखे इन्हीं दावों की बुनियाद पर एक्सपोर्ट की हरी झंडी दिखा दी.
जब खुद कृषि मंत्री ने साल भर पहले ही खेतों में होने वाली इस तबाही का साफ अंदेशा जता दिया था, तो फिर आंखें मूंदकर ऐसे फैसले क्यों लिए गए? अब सख्त वक्त आ गया है कि सरकार इस भारी सिस्टम फेल्योर की जवाबदेही तय करे, ताकि भविष्य में देश के आम उपभोक्ता की जेब और किसानों के पसीने के साथ ऐसा घिनौना खेल फिर कभी न खेला जा सके.