
देश में धान की उत्पादकता वृद्धि में कुछ धीमापन के संकेत हैं. ऐसे समय में भारत सरकार और कृषि वैज्ञानिक धान उत्पादन बढ़ाने के लिए जीनोम एडिटेड और हाइब्रिड धान की नई किस्मों को बड़े पैमाने पर किसानों तक पहुंचाने की तैयारी कर रहे हैं. साल 2025 में विकसित दो महत्वपूर्ण जीनोम एडिटेड धान किस्में, डीआरआर धान 100 (कमला) और पूसा राइस DST1, इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही हैं. इनमें से पूसा राइस DST1 को आगामी रबी सीजन में कमर्शियल खेती के लिए जारी करने की तैयारी चल रही है.
विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती आबादी और खाद्यान्न मांग को देखते हुए केवल खेती का क्षेत्रफल बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा. आने वाले वर्षों में प्रति हेक्टेयर उत्पादकता बढ़ाना ही सबसे बड़ा समाधान होगा.
धान उत्पादन के क्षेत्र में चीन और अमेरिका जैसे देशों ने हाइब्रिड तकनीक का बड़े पैमाने पर उपयोग किया है. इन देशों में कुल धान क्षेत्र के आधे से अधिक हिस्से में हाइब्रिड धान की खेती की जाती है, जबकि भारत में इसका हिस्सा अभी केवल 7 से 8 प्रतिशत के आसपास है.
जानकारों के अनुसार, भारत को ऐसी हाइब्रिड धान किस्मों की जरूरत है जो किसानों को कम से कम 25 प्रतिशत या उससे अधिक उत्पादन लाभ दे सकें. इसके साथ ही इन किस्मों में स्थानीय लोगों की पसंद के अनुरूप दाने की क्वालिटी और जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशीलता भी होनी चाहिए.
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि केवल नई और उन्नत बीज किस्में ही राष्ट्रीय उत्पादकता में बड़ा बदलाव नहीं ला सकतीं. बल्कि समय पर रोपाई, संतुलित पोषण प्रबंधन, कुशल जल प्रबंधन, बीजों का अधिक से अधिक अंकुरण और मजबूत कृषि सेवाओं की भी उतनी ही जरूरत है. विशेषज्ञ बताते हैं कि अगर आधुनिक किस्मों के साथ वैज्ञानिक खेती पद्धतियों को अपनाया जाए तो धान उत्पादन में बड़ी वृद्धि संभव है.
धान क्षेत्र के विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले दस वर्षों में भारत को 150 से 200 लाख टन अतिरिक्त चावल की जरूरत होगी. उनका मानना है कि इस अतिरिक्त जरूरत को पूरा करने का सबसे प्रभावी तरीका उत्पादकता में वृद्धि है, क्योंकि खेती योग्य भूमि के विस्तार की संभावनाएं सीमित हैं.
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश के उमरिया चौबे और बरौदा क्षेत्रों में हाइब्रिड धान को किसानों ने तेजी से अपनाया है. साल 2017-18 में जहां पारंपरिक किस्मों का चलन था, वहीं 2023-24 तक लगभग पूरा क्षेत्र हाइब्रिड धान के अंतर्गत आ गया.
उमरिया चौबे में हाइब्रिड धान का क्षेत्रफल 2018-19 में केवल 20 हेक्टेयर था, जो 2023-24 में बढ़कर 685 हेक्टेयर तक पहुंच गया. इसी प्रकार बरौदा में हाइब्रिड धान का क्षेत्रफल 20 हेक्टेयर से बढ़कर 377 हेक्टेयर हो गया. दोनों क्षेत्रों में हाइब्रिड धान का हिस्सा 99 प्रतिशत के आसपास पहुंच चुका है.
यह आंकड़े दर्शाते हैं कि यदि किसानों को बेहतर तकनीक, क्वालिटी के बीज और सही जानकारी उपलब्ध कराई जाए तो हाइब्रिड धान का विस्तार तेजी से संभव है.
विशेषज्ञों का मानना है कि जीनोम एडिटेड और हाइब्रिड धान किस्मों का मेल भारत की खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाने में बड़ी भूमिका निभाएगा. जलवायु परिवर्तन, घटते जल संसाधनों और बढ़ती खाद्यान्न मांग के बीच नई तकनीकों से विकसित किस्में किसानों की आय बढ़ाने के साथ देश की चावल उत्पादन क्षमता को भी नई ऊंचाई दे सकती हैं.
आने वाले वर्षों में सरकार, अनुसंधान संस्थानों और निजी बीज कंपनियों के संयुक्त प्रयास यह तय करेंगे कि भारत धान उत्पादकता के नए लक्ष्य को कितनी तेजी से हासिल कर पाता है.