
देश का मुंह मीठा करने वाला गन्ना किसान आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है. सरकारें पीठ थपथपाती हैं कि चीनी मिलें अब सिर्फ चीनी नहीं बना रहीं, बल्कि इथेनॉल, बिजली और बायो-गैस बनाकर देश को आत्मनिर्भर कर रही हैं. लेकिन हकीकत यह है कि इन तमाम नए व्यापारों से मिलों की तिजोरियां तो भर रही हैं, मगर जिसके गन्ने से यह सब मुमकिन हो रहा है, उस किसान की झोली आज भी खाली है. कहने को गन्ने का दाम तय करने का एक वैज्ञानिक फॉर्मूला है, लेकिन गहराई से देखें तो यह व्यवस्था आज के आधुनिक दौर में पूरी तरह बेमानी और किसानों के साथ अन्याय बन चुकी है.
आज भी गन्ने की कीमत का मुख्य आधार 'चीनी की रिकवरी' (Sugar Recovery Rate) को बनाया जाता है. केंद्र सरकार द्वारा गन्ने का उचित और लाभकारी मूल्य (FRP) 10.25% की बेसिक चीनी रिकवरी के आधार पर तय किया जाता है. यही पैमाना एसएपी (SAP-State Advised Price) का भी है. यदि रिकवरी 10.25% से कम होती है, तो मूल्य में प्रति 0.1% की कमी पर 3.56 रुपये प्रति क्विंटल की कटौती की जाती है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब मिलें अब सिर्फ चीनी की फैक्ट्री नहीं रहीं, बल्कि एक 'बायो-रिफाइनरी' बन चुकी हैं, तो दाम तय करने का पैमाना सिर्फ चीनी क्यों हो?
* प्रेस मड (Press Mud): जिससे अब महंगी कंप्रेस्ड बायो गैस (CBG) बनाई जा रही है.
* बैगास (Bagasse): जिससे बिजली पैदा कर ग्रिड को बेची जा रही है.
* मोलासेस (Molasses): जिससे इथेनॉल का बंपर उत्पादन हो रहा है.
जब मुनाफा इन सभी सह-उत्पादों (By-Products) से आ रहा है, तो गन्ने के मूल्य निर्धारण में इथेनॉल, बिजली और सीबीजी की आय को अनिवार्य रूप से क्यों नहीं जोड़ा जाता? किसानों का साफ कहना है कि मिलों के इस मल्टिपल मुनाफे में गन्ने की कीमत तय करते समय किसान को भी हिस्सेदार बनाया जाए.
सरकार और मिल मालिकों द्वारा बार-बार यह ढिंढोरा पीटा जाता है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम से गन्ना किसानों को भारी फायदा हो रहा है. लेकिन यह एक सफेद झूठ से ज्यादा कुछ नहीं है. कड़वी सच्चाई यह है कि मिलें इथेनॉल बेचकर करोड़ों रुपये कमा रही हैं, लेकिन इसके बदले गन्ना किसान को एक रुपये लीटर भी अतिरिक्त यानी प्रीमियम नहीं मिल रहा है.उन्हें बस गन्ने का दाम मिल रहा है, वो भी वर्षों पुराने फार्मूले पर.
रही बात समय पर भुगतान की, तो 14 दिनों के भीतर भुगतान करने का कानून दशकों पुराना है. मिलें इसका पालन आज भी नहीं करतीं और सरकारें मूकदर्शक बनी हुई हैं. ऐसे में पहले के मुकाबले थोड़ा पहले मिलने वाले भुगतान को इथेनॉल की 'कृपा' बताकर पेश करना किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है. क्योंकि 14 दिन के भीतर तो अब भी किसानों को गन्ना का भुगतान नहीं मिल रहा है. भुगतान में देरी कोई सरकार की रियायत या अधिकार नहीं, बल्कि कानून का उल्लंघन है.
मौजूदा व्यवस्था में किसानों की लागत की गणना भी ईमानदारी से नहीं होती. सरकार फसल की लागत तो जोड़ती है, लेकिन उसमें जमीन का वास्तविक किराया, लगाई गई पूंजी पर ब्याज, खेती का जोखिम और किसान के चौबीस घंटे के मैनेजमेंट को शामिल नहीं किया जाता. इन बुनियादी खर्चों को छोड़े बिना गन्ने की सही उत्पादन लागत निकल ही नहीं सकती. लेकिन हो ऐसे ही रहा है.
इसके अलावा, गन्ना मूल्य तय करते समय एक सबसे बड़ा रोड़ा है "उपभोक्ता को उचित मूल्य पर चीनी की उपलब्धता" का प्रावधान. यह प्रावधान सीधे तौर पर किसानों के अधिकार का हनन करता है. उपभोक्ताओं के हितों की आड़ लेकर सरकारें चीनी के दाम जानबूझकर नियंत्रित रखती हैं, जिसका सीधा नुकसान किसानों को कम गन्ने के दाम के रूप में उठाना पड़ता है. अगर सरकार आम जनता को सस्ती चीनी देना चाहती है, तो वह अपनी जेब से सब्सिडी दे, किसानों की कीमत पर उपभोक्ताओं को खुश करने को कौन उचित ठहरा सकता है.
अब गन्ने का दाम तय करने का पुराना चश्मा बदलने का वक्त आ चुका है क्योंकि गन्ना सिर्फ चीनी तक सीमित नहीं है, बल्कि इथेनॉल, बिजली और बायो-गैस जैसे उत्पादों का मुख्य स्रोत बन चुका है. इसके बावजूद, किसानों को गन्ने की कीमत सिर्फ चीनी की रिकवरी के पुराने फॉर्मूले पर मिल रही है, जो उनके साथ सरासर नाइंसाफी है. भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) के राष्ट्रीय प्रवक्ता धर्मेंद्र मलिक ने खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय को पत्र लिखकर बेहद तीखा और तार्किक स्टैंड लिया है.
उनकी मांग है कि प्रस्तावित 'शुगर (कंट्रोल) ऑर्डर-2026' में इन सभी सह-उत्पादों की कुल कमाई को गन्ना मूल्य के कानूनी फॉर्मूले में अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए. अब गेंद सरकार के पाले में है और यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि वह इस नीतिगत बदलाव के जरिए किसानों की वास्तविक खुशहाली का रास्ता चुनती है या फिर चीनी मिल मालिकों के हितों के पक्ष में खड़ी होती है.
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