
मध्यप्रदेश अब सिर्फ “सोयाबीन प्रदेश” ही नहीं, बल्कि तेजी से “गेहूं प्रदेश” के रूप में भी अपनी मजबूत पहचान बना रहा है. मुख्यमंत्री मोहन यादव की किसान हितैषी नीतियों, आधुनिक कृषि तकनीकों और बेहतर समर्थन व्यवस्था के चलते प्रदेश में गेहूं उत्पादन लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है. यही वजह है कि आज मध्यप्रदेश का गेहूं ओमान, यमन, यूएई, कतर, सऊदी अरब, बांग्लादेश और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में अपनी खास पहचान बना चुका है.
प्रदेश में इस वर्ष गेहूं उत्पादन बढ़कर 365.11 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गया है, जबकि उत्पादकता 3780 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई है. देश के कुल गेहूं उत्पादन में मध्यप्रदेश की हिस्सेदारी लगभग 18 प्रतिशत हो चुकी है. वहीं भारत से होने वाले कुल गेहूं निर्यात में प्रदेश का योगदान 35 से 40 प्रतिशत तक माना जा रहा है.
मध्यप्रदेश का शरबती और ड्यूरम गेहूं अपनी प्राकृतिक मिठास, चमक और उच्च क्वालिटी के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में काफी पसंद किया जा रहा है. जर्मनी, अमेरिका, इटली, यूके, दुबई, दक्षिण अफ्रीका समेत कई देशों में इसकी मांग लगातार बनी हुई है. प्रदेश का गेहूं विशेष रूप से ब्रेड, बिस्किट और पास्ता निर्माण के लिए उपयुक्त माना जाता है. ओमान, यमन, यूएई, कतर, सऊदी अरब, दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया, मलेशिया और बांग्लादेश जैसे देशों में मध्यप्रदेश के गेहूं की मांग बढ़ने से किसानों को बेहतर कीमत मिलने लगी है. इससे प्रदेश के कृषि निर्यात को भी मजबूती मिली है.
भारत सरकार के गेहूं अनुसंधान निदेशालय द्वारा किए गए परीक्षणों में मध्यप्रदेश के गेहूं की गुणवत्ता बेहद बेहतर पाई गई है. करीब 2000 सैंपलों के परीक्षण में सामान्य किस्मों के गेहूं में औसतन 12.6 प्रतिशत प्रोटीन, 43.6 पीपीएम आयरन और 38.2 पीपीएम जिंक पाया गया. कठिया गेहूं की किस्मों में प्रोटीन, आयरन, मैग्नीज और जिंक भरपूर मात्रा में मौजूद हैं. यही पोषक तत्व मध्यप्रदेश के गेहूं को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अलग पहचान दिलाते हैं और किसानों को बेहतर दाम सुनिश्चित करते हैं.
प्रदेश में विकसित गेहूं की कई किस्में कम सिंचाई में अधिक उत्पादन देने के लिए जानी जाती हैं. जेडब्ल्यूएस-17, जे.डब्ल्यू. 3020 और जे.डब्ल्यू. 321 जैसी किस्में एक सिंचाई में ही 35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देने में सक्षम हैं. इसके अलावा जे.डब्ल्यू. 1142, जे.डब्ल्यू. 3288 और जे.डब्ल्यू. 1203 जैसी किस्में अधिक तापमान में भी बेहतर उत्पादन देती हैं. वहीं जे.डब्ल्यू. 1202, जे.डब्ल्यू. 3288 और जे.डब्ल्यू. 1106 प्रोटीन से भरपूर मानी जाती हैं. निर्यात के लिए एमपीआर-1215 और जे.डब्ल्यू. 3211 किस्में काफी उपयुक्त बताई जा रही हैं.
प्रदेश कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है. अब तक मध्यप्रदेश में गेहूं की 51 किस्मों का विकास किया जा चुका है. इनमें से 12 किस्में पिछले एक दशक में विकसित हुई हैं. वर्ष 2026 में पौष्टिक आहार के लिए उपयोग में लाई जा रही पांच प्रमुख गेहूं किस्मों में से चार मध्यप्रदेश में विकसित की गई हैं. इनमें एमपीओ-1215, एमपी-3211, एमपी-1202 और एमपी-4010 शामिल हैं. इससे प्रदेश कृषि अनुसंधान और बीज उत्पादन के क्षेत्र में भी अग्रणी बनकर उभरा है.
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के प्रयासों से इस वर्ष गेहूं खरीदी का लक्ष्य 78 लाख मीट्रिक टन से बढ़ाकर 100 लाख मीट्रिक टन किया गया है. प्रदेश में समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीदी जारी है और किसानों के लिए उपार्जन केंद्रों पर व्यापक इंतजाम किए गए हैं. किसानों को 2585 रुपये प्रति क्विंटल समर्थन मूल्य के साथ राज्य सरकार द्वारा 40 रुपये प्रति क्विंटल बोनस भी दिया जा रहा है. यानी कुल 2625 रुपये प्रति क्विंटल की दर से गेहूं खरीदा जा रहा है.
मध्यप्रदेश देश का सबसे बड़ा प्रमाणित बीज उत्पादक राज्य भी बन चुका है. सहकारी क्षेत्र में प्रदेश बीज उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर हो गया है. बीज उत्पादन कंपनियों से तीन लाख से अधिक किसान जुड़े हुए हैं. अब ये कंपनियां भंडारण, विपणन और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में भी सक्रिय हो रही हैं. साथ ही फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन (FPO) को मजबूत बनाने पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है. इन प्रयासों से मध्यप्रदेश न केवल गेहूं बल्कि अन्य फसलों के उत्पादन में भी देश के अग्रणी राज्यों में शामिल हो गया है.