
देश में इस बार कमजोर मॉनसून और अल नीनो के असर ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है. खरीफ सीजन के अंतिम चरण में जारी केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि फसलों की बुवाई पिछले साल के मुकाबले पीछे चल रही है. इसका सबसे ज्यादा असर धान की खेती पर दिखाई दे रहा है, जो देश की खाद्य सुरक्षा और करोड़ों लोगों के भोजन से सीधे जुड़ी फसल है.
28 अगस्त तक देश में खरीफ फसलों की कुल बुवाई 1071.10 लाख हेक्टेयर में दर्ज की गई है. पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 1090.01 लाख हेक्टेयर था. यानी इस बार लगभग 18.91 लाख हेक्टेयर कम क्षेत्र में बुवाई हुई है. यह रकबा सामान्य खरीफ क्षेत्र 1104.25 लाख हेक्टेयर से भी कम है, जिससे साफ संकेत मिलता है कि मौसम की मार खेती पर पड़ रही है.
खरीफ फसलों में सबसे बड़ी गिरावट धान की बुवाई में दर्ज की गई है. इस साल 414.10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान बोया गया है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह रकबा 428.46 लाख हेक्टेयर था. इसका मतलब है कि धान की खेती का क्षेत्रफल 14.36 लाख हेक्टेयर कम हो गया है.
कर्नाटक में सबसे अधिक 3.61 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है. इसके अलावा तेलंगाना, झारखंड, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में भी धान का रकबा घटा है. हालांकि कुछ राज्यों जैसे असम और हरियाणा में बुवाई बढ़ी है, लेकिन इससे राष्ट्रीय स्तर पर हुई कमी की भरपाई नहीं हो सकी.
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार देश में औसतन धान की पैदावार करीब 29 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रहती है. यदि घटे हुए रकबे को इसी आधार पर देखा जाए तो इस साल करीब 40 लाख टन धान उत्पादन कम हो सकता है.
धान को चावल में बदलने पर यह कमी लगभग 28 लाख टन के आसपास बैठती है. यह कोई छोटा आंकड़ा नहीं है, क्योंकि भारत में गेहूं के बाद चावल सबसे ज्यादा खाया जाने वाला खाद्यान्न है. इसके अलावा चावल से कई खाने के प्रोडक्ट भी तैयार किए जाते हैं. ऐसे में उत्पादन में कमी आने का असर बाजार और उपभोक्ताओं दोनों पर पड़ सकता है.
पिछले कुछ वर्षों में चावल का उपयोग केवल भोजन तक सीमित नहीं रहा है. सरकार ने इथेनॉल उत्पादन में भी चावल को अहम स्थान दिया है. गन्ना और मक्का के अलावा बड़ी मात्रा में चावल का उपयोग इथेनॉल बनाने के लिए किया जा रहा है.
सरकार का तर्क है कि देश में चावल का पर्याप्त भंडार उपलब्ध रहता है. राशन व्यवस्था और अन्य जरूरतों को पूरा करने के बाद भी काफी मात्रा में स्टॉक बच जाता है. ऐसे में अतिरिक्त चावल का उपयोग इथेनॉल उत्पादन में करने से भंडारण पर आने वाला खर्च कम किया जा सकता है.
हालांकि कई कृषि और कमोडिटी विशेषज्ञ इस व्यवस्था को लेकर चिंता जता रहे हैं. कमोडिटी एक्सपर्ट शंकर ठक्कर का मानना है कि यदि किसी साल उत्पादन में बड़ी गिरावट आती है तो खाद्य सुरक्षा और कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि खाद्यान्न और ईंधन की जरूरतों को पूरी तरह एक-दूसरे से जोड़ना जोखिम भरा हो सकता है.
हाल के महीनों में चीनी की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अगर उत्पादन घटा और इथेनॉल की मांग बनी रही तो आने वाले समय में चावल पर भी दबाव बढ़ सकता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी साल कमजोर मॉनसून के कारण धान उत्पादन घट जाए, तो बाजार में उपलब्धता कम हो सकती है. ऐसे हालात में कीमतों को नियंत्रित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है. इसलिए अभी से उत्पादन, भंडारण और उपयोग के बीच संतुलन बनाए रखने की जरूरत है.
धान की फसल के लिए सितंबर का महीना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. इसी दौरान कई इलाकों में फसल दूधिया अवस्था में पहुंचती है और उसे पर्याप्त पानी की जरूरत होती है. 'किसान तक' से एक खास बातचीत में बांदा यूनिवर्सिटी के मौसम विभाग प्रभारी डॉ. दिनेश शाह ने कहा, अल नीनो के प्रभाव से सितंबर में बारिश सामान्य से कम भी हो सकती है और कुछ इलाकों में अत्यधिक बारिश भी देखने को मिल सकती है. दोनों स्थितियां धान के लिए नुकसानदेह हैं.
डॉ. शाह कहते हैं, कम बारिश होने पर फसल को पर्याप्त नमी नहीं मिलती, जबकि ज्यादा बारिश से खेतों में जलभराव हो सकता है. इससे पौधों में सड़न और रोग बढ़ने का खतरा रहता है. दलहन फसलें भी ऐसी परिस्थितियों से प्रभावित हो सकती हैं.
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि सितंबर का मौसम इस साल धान की अंतिम पैदावार तय करने में अहम भूमिका निभाएगा. यदि बारिश का वितरण संतुलित नहीं रहा तो उत्पादन में और गिरावट आ सकती है.
ऐसी स्थिति में किसानों को कम पैदावार का नुकसान झेलना पड़ सकता है, जबकि दूसरी ओर बाजार में चावल की कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका रहेगी. इसलिए अगले कुछ सप्ताह धान की खेती और देश की खाद्य व्यवस्था, दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं.