
तमिलनाडु के नीलगिरी जिले में इस बार अल-नीनो और बारिश की कमी ने चाय की खेती को बुरी तरह प्रभावित किया है. लंबे समय से चल रहे सूखे के कारण चाय के पौधों की नई कोपलें मुरझा रही हैं और चाय फैक्ट्रियों को हरी पत्तियों की सप्लाई में भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है. इससे चाय के उत्पादन के साथ-साथ हजारों किसानों और मजदूरों की रोजी-रोटी पर भी संकट बढ़ गया है. नीलगिरी को देश के प्रमुख चाय उत्पादक क्षेत्रों में गिना जाता है. यहां 65 हजार से ज्यादा छोटे और सीमांत किसान चाय की खेती करते हैं, जिले की स्थानीय अर्थव्यवस्था में चाय का बड़ा योगदान है और बड़ी संख्या में लोग खेती और चाय उद्योग पर निर्भर हैं.
नीलगिरी में इस समय चाय का दूसरा सीजन शुरू हो गया है. इस मौसम में आमतौर पर चाय के पौधों पर नई और हरी कोपलें तेजी से निकलती हैं. लेकिन इस बार लंबे समय से बारिश नहीं होने के कारण कोमल कोपलें मुरझा रही हैं. ऊटी, कूनूर, कोटागिरी और मंजूर जैसे इलाकों में चाय फैक्ट्रियों को पहले के मुकाबले बहुत कम हरी पत्तियां मिल रही हैं. जिन फैक्ट्रियों को रोजाना करीब 4,000 किलो हरी चाय की पत्तियां मिलती थीं, वहां अब सिर्फ 600 से 800 किलो के आसपास पत्तियां पहुंच रही हैं. फैक्ट्री अधिकारियों के मुताबिक, पत्तियों की कमी का असर सीधे चाय पाउडर के उत्पादन पर पड़ रहा है. कई फैक्ट्रियों के उत्पादन में इस साल 20 से 25 प्रतिशत तक की गिरावट आई है.
UPASI चाय अनुसंधान संस्थान की एक स्टडी के मुताबिक, पिछले पांच साल में नीलगिरी में बारिश में करीब 31 प्रतिशत की कमी आई है. 2021 में जहां औसतन 173.3 सेंटीमीटर बारिश हुई थी, वहीं 2025 में यह घटकर 119.4 सेंटीमीटर रह गई. बारिश की कमी का असर चाय की पैदावार पर भी पड़ा है. 2023 में जहां प्रति हेक्टेयर करीब 2,315 किलो चाय का उत्पादन हुआ था, वहीं 2025 में यह घटकर 2,042 किलो रह गया यानी करीब 11.8 प्रतिशत की गिरावट आई. वहीं, इस साल स्थिति और ही ज्यादा खराब है. सामान्य तौर पर दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के दौरान नीलगिरी में करीब 874 मिलीमीटर बारिश होती है, लेकिन इस बार अब तक सिर्फ 283 मिलीमीटर बारिश हुई है. इससे बारिश में करीब 55 प्रतिशत की कमी बताई जा रही है.
बारिश की कमी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिन चाय बागानों में एक एकड़ से हर महीने करीब 500 किलो हरी पत्तियां मिलती थीं, वहां अब उत्पादन घटकर लगभग 200 किलो रह गया है. यानी पैदावार में करीब 60 प्रतिशत की गिरावट आई है. विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल कुल चाय उत्पादन में 10 से 20 प्रतिशत की कमी आई है. अगर सूखे की स्थिति आगे भी बनी रहती है तो उत्पादन में 50 प्रतिशत तक की गिरावट का खतरा हो सकता है.
चाय फैक्ट्री से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि बारिश नहीं होने से सिर्फ चाय किसान ही नहीं, बल्कि दूसरी फसलों पर निर्भर लोग भी परेशान हैं. कई जगह किसानों को खेती के लिए पानी खरीदना पड़ रहा है. चाय फैक्ट्री अधिकारी किशोर ने तमिलनाडु सरकार से छोटे चाय उत्पादकों की मदद करने की अपील की है. उन्होंने कहा कि जो किसान पूरी तरह चाय की खेती पर निर्भर हैं, उनके साथ-साथ गाजर और प्याज जैसी फसलें उगाने वाले किसानों को भी सहायता की जरूरत है.
हरी चाय की पत्तियों की सप्लाई कम होने से चाय पाउडर का उत्पादन घट सकता है. इसका असर आने वाले समय में चाय की कीमतों और निर्यात पर भी पड़ सकता है. टी बोर्ड ऑफ इंडिया के मुताबिक, 2024-25 में भारत का चाय निर्यात बढ़कर 257.88 मिलियन किलो हुआ था, लेकिन दक्षिण भारत से चाय का निर्यात 4.92 प्रतिशत घटकर 96.68 मिलियन किलो रह गया. वैज्ञानिकों के मुताबिक, समस्या सिर्फ बारिश कम होने की नहीं है. बारिश के बीच लंबा अंतराल भी चाय के पौधों को नुकसान पहुंचा रहा है. कम समय में तेज बारिश और फिर लंबे समय तक सूखा रहने से नई कोपलें ठीक से विकसित नहीं हो पातीं. इसके साथ ही नीलगिरी में तापमान में करीब 0.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी भी दर्ज की गई है. (ANI)