
ब्लैकबेरी एक जंगली बेरी है जो देश में लद्दाख इलाके के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में उगती है. पिछले कुछ सालों में जब यहां के लोगों को सिबकथन (Sibakthan) के बारे में पता चला है, तो अब पूरे देश में सिबकथन बेरी की मांग बढ़ रही है. कई कंपनियां अब लद्दाख की इस जंगली बेरी से अलग-अलग तरह के प्रोडक्ट बना रही हैं. अब इसका सीधा असर इसकी कीमतों पर पड़ा है.
पिछले साल लद्दाख में किसानों से सिबकथन को सिर्फ 25 रुपये प्रति किलो के भाव पर खरीदा जा रहा था. इस साल यह भाव 200 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है और फिर भी इसकी मांग बढ़ रही है.
सिबकथन एक जंगली बेरी है जो लद्दाख के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में उगती है. इसकी झाड़ियों में बहुत घने कांटे होते हैं, जिससे इसके बीज निकालना बहुत मुश्किल होता है. लद्दाख में किसान इन झाड़ियों का इस्तेमाल सुरक्षा के लिए भी करते थे और ये लद्दाख के पहाड़ी इलाकों में अपने-आप उगती हैं.
लेकिन जब इस बेरी की अहमियत लोगों को पता चली, तो लद्दाख के किसान अब न सिर्फ इन झाड़ियों को उगा रहे हैं, बल्कि अच्छी कीमत पाने के लिए अलग-अलग पहाड़ों से इसकी फसल भी इकट्ठा कर रहे हैं.
सिबकथन के पीछे एक दिलचस्प कहानी है. जब कुछ साल पहले DRDO लद्दाख ने इस जंगली बेरी पर रिसर्च शुरू की, तो उन्हें इसमें कुछ खास एंटीऑक्सीडेंट और विटामिन मिले. इतना ही नहीं, इसकी पत्तियों और जड़ों का इस्तेमाल चाय बनाने में भी किया जाता है.
अब बढ़ती मांग की वजह से सिबकथन की कीमतें भी बढ़ गई हैं और मांग अभी भी बढ़ रही है.
सिबकथन के पीछे एक दिलचस्प कहानी यह है कि कहा जाता है कि जब चंगेज खान मंगोलिया जीत रहा था, तो उसकी सेना को मंगोलिया के पहाड़ों में कुछ भी खाने को नहीं मिल रहा था. उन्होंने गलती से ये बेरी खा ली और पाया कि ये न सिर्फ पौष्टिक थीं, बल्कि इनसे उन्हें अच्छी ऊर्जा भी मिली.
तब से, सिबकथन पर रिसर्च और इसका इस्तेमाल पहाड़ी इलाकों तक ही सीमित था. लेकिन अब पूरे देश में लोग इसे खा रहे हैं और इसका सीधा असर लद्दाख के किसानों की आमदनी बढ़ने के तौर पर दिख रहा है.
हालांकि खाने के तौर पर यह उतना मीठा नहीं होता है लेकिन जो अब इससे कई तरह के प्रोडक्ट्स तैयार किए जा रहे हैं.
देश भर में अलग अलग कंपनियों के द्वारा उनकी मांग न सिर्फ देश में बल्कि दुनिया में बहुत तेजी से बढ़ रही है.
इस बेरी में सबसे बेहतरीन antioxidant पाए जाते हैं बल्कि साथ ही साथ इसमें उस तरह के vitamins हैं जो बाकी खाने वाली चीजों में जल्दी नहीं पाई जाती हैं.
न सिर्फ इसका फल इस्तेमाल किया जाता है बल्कि इसकी पत्तियां और इसके जड़ भी चाय के तौर पर काफी लोकप्रिय हो रहे हैं.
सिबकथान का कलेक्शन करने वाले नजीर ने बताया कि वह गांवों से रोजाना करीब एक टन तक फल इकट्ठा करते हैं. इसके बदले ग्रामीणों को करीब 180 रुपये प्रति किलो की दर से भुगतान किया जाता है.
उनके मुताबिक, आमतौर पर एक व्यक्ति करीब एक क्विंटल या उससे अधिक सिबकथान लेकर आता है. ऐसे में इस फल से जुड़े ग्रामीणों को अच्छी आमदनी हो रही है.
नजीर के मुताबिक, सिबकथान को इकट्ठा करने का काम इसकी उपलब्धता पर निर्भर करता है. फल ज्यादा होने पर कलेक्शन का काम करीब एक महीने तक चलता है, जबकि कई बार इसका सीजन सिर्फ 15 दिनों तक ही सीमित रहता है. इस दौरान इकट्ठा किए गए फलों को फैक्ट्री भेजा जाता है, जहां उनकी प्रोसेसिंग कर आगे उपयोग के लिए तैयार किया जाता है.
उन्होंने बताया कि फिलहाल उनकी फैक्ट्री में सिबकथान के पत्तों से कोई उत्पाद तैयार नहीं किया जाता. मुख्य रूप से इसके फल से जूस निकाला जाता है और प्रोसेसिंग के बाद बचने वाले सूखे अवशेष का भी उपयोग किया जाता है. इस तरह सिबकथान की मांग ग्रामीणों के लिए सीमित सीजन में अतिरिक्त आमदनी का एक महत्वपूर्ण जरिया बन रही है.