
केरल के पारंपरिक रबर उत्पादक इलाकों में अब खेती का स्वरूप तेजी से बदल रहा है. रबर की गिरती कीमतों, मजदूरों की कमी और बदलते मौसम की चुनौतियों के बीच बड़ी संख्या में किसान अब रामबुतान फल की खेती की ओर रुख कर रहे हैं. कभी सिर्फ घरों के बगीचों तक सीमित रहने वाला यह विदेशी फल अब राज्य की तेजी से बढ़ती व्यावसायिक बागवानी फसलों में शामिल हो चुका है. खासकर पथानामथिट्टा, कोट्टायम, एर्नाकुलम, त्रिशूर, वायनाड और इडुक्की जैसे जिलों में रबर के बागानों की जगह रामबुतान के बगीचे दिखाई देने लगे हैं.
रामबुतान मैंगोस्टीन फार्मर्स ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार, इस समय केरल में करीब 25 हजार एकड़ क्षेत्र में रामबुतान की खेती हो रही है. मौजूदा सीजन में लगभग एक लाख टन उत्पादन का अनुमान है. इससे करीब 1000 करोड़ रुपये का कारोबार होने की उम्मीद जताई गई है. संगठन का कहना है कि अगर बेहतर बाजार और लॉजिस्टिक सुविधाएं मिलें तो इस फसल का दायरा और तेजी से बढ़ सकता है.
रामबुतान मैंगोस्टीन फार्मर्स ऑर्गेनाइजेशन के अध्यक्ष एम. सी. साजू ने बताया कि रामबुतान की खेती अलग-अलग डेन्सिटी वाले मॉडल में सफलतापूर्वक की जा सकती है. इसके पौधे तीसरे साल से फल देना शुरू कर देते हैं और समय के साथ उत्पादन लगातार बढ़ता है. तीसरे साल में एक पेड़ से लगभग 30 किलोग्राम, चौथे साल में 50 किलोग्राम और पांचवें वाल में करीब 70 किलोग्राम तक उत्पादन मिल सकता है. परिपक्व होने पर एक पेड़ से 300 किलोग्राम तक फल मिलने की संभावना रहती है.
एम. सी. साजू ने कहा कि अगर रामबुतान का बाजार भाव 100 रुपये प्रति किलोग्राम भी रहे तो 300 किलोग्राम उत्पादन देने वाला एक पेड़ किसान को करीब 30 हजार रुपये की सालाना आय दे सकता है. उन्होंने कहा कि एक हेक्टेयर में पारंपरिक फसलों से आमतौर पर 2.5 से 3 लाख रुपये तक की कमाई होती है, जबकि रबर की खेती बेहतर कीमत मिलने पर भी उस स्तर तक नहीं पहुंच पाती. इसी वजह से रामबुतान को केरल की संभावित नई नकदी फसल माना जा रहा है.
एर्नाकुलम जिले के एक किसान ने बताया कि उन्हें इस सीजन में एक हेक्टेयर रामबुतान बाग से लगभग 14 लाख रुपये की आय हुई. उन्होंने कहा कि कुल खर्च करीब 60 हजार रुपये रहा और यह उनके उत्पादन का चौथा साल था. किसानों का कहना है कि एक बार बाग तैयार हो जाने के बाद रामबुतान की देखभाल में रबर की तुलना में काफी कम मेहनत लगती है.
किसानों ने बताया किरामबुतान की सबसे बड़ी समस्या इसकी कम शेल्फ लाइफ है. यह ऐसा फल है, जो पेड़ से तोड़ने के बाद जल्दी खराब होने लगता है. इसलिए दूर-दराज के बाजारों तक भेजने के लिए कोल्ड स्टोरेज, रेफ्रिजरेटेड ट्रांसपोर्ट और आधुनिक पैकेजिंग की जरूरत पड़ती है. पर्याप्त कोल्ड चेन व्यवस्था नहीं होने से किसानों को सीमित बाजारों पर निर्भर रहना पड़ता है.
एम. सी. साजू का कहना है कि फिलहाल रैंबूटन की बिक्री मुख्य रूप से चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहरों में होती है. हैदराबाद, दिल्ली, मुंबई की एपीएमसी मंडी और उत्तर भारत के अन्य बाजारों तक पहुंच बनने पर किसानों को बड़ा फायदा मिल सकता है. उनका कहना है कि मजबूत कोल्ड चेन नेटवर्क तैयार होने पर उत्पादन बढ़ने के बावजूद 100 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास मूल्य स्थिर रखा जा सकता है.
किसान की मांग है कि सरकार दक्षिण भारत से बाहर नए बाजार तैयार करने के साथ-साथ खाड़ी देशों में निर्यात को भी बढ़ावा दे. केरल में रामबुतान की फसल ऐसे समय तैयार होती है, जब खाड़ी देशों में गर्मियों के दौरान इसकी अच्छी मांग रहती है. इसके अलावा प्रोसेस्ड उत्पादों को बढ़ावा देने, किसान उत्पादक संगठनों को मजबूत करने और सोशल मीडिया पर फैलने वाली भ्रामक जानकारियों पर रोक लगाने की भी मांग की जा रही है.
रामबुतान की संभावनाओं, बाजार विस्तार और किसानों की चुनौतियों पर चर्चा के लिए 8 अगस्त को कोठामंगलम क्षेत्र के कूथट्टुकुलम में रामबुतान कॉन्क्लेव 2026 आयोजित की जाएगी. इस कार्यक्रम में किसान, व्यापारी, स्टार्टअप, कृषि विशेषज्ञ और अन्य हितधारक हिस्सा लेकर इस उभरती फसल के भविष्य की रणनीति पर चर्चा करेंगे. (पीटीआई)