कश्‍मीर में धान किसानों पर टूटा मुसीबत का पहाड़! बाढ़ के बाद अब कम बारिश ने बढ़ाई मुश्किलें

कश्‍मीर में धान किसानों पर टूटा मुसीबत का पहाड़! बाढ़ के बाद अब कम बारिश ने बढ़ाई मुश्किलें

कश्मीर में धान की खेती दोहरी मार झेल रही है जहां पिछले साल की बाढ़ के नुकसान के बाद इस बार बारिश की कमी और सूखती नहरों ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है. कई इलाकों में सिंचाई संकट गहराने से फसल पर खतरा मंडरा रहा है.

Jammu And Kashmir Paddy FarmingJammu And Kashmir Paddy Farming
क‍िसान तक
  • Noida,
  • May 12, 2026,
  • Updated May 12, 2026, 9:06 AM IST

दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले के पाहू इलाके के किसान मुजफ्फर अहमद अब भी पिछले सीजन के नुकसान से पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं. भारी बारिश के चलते सितंबर में आई बाढ़ ने धान के खेतों को पूरी तरह बर्बाद कर दिया था. झेलम नदी के किनारे बसे खेतों में मोटी गाद जम गई, जिससे फसल कटाई तक संभव नहीं हो पाई. कई किसानों को पूरी फसल छोड़नी पड़ी, जिससे उनकी लागत भी नहीं निकल सकी और आर्थिक दबाव बढ़ गया.

सूखती नहरों के कारण बढ़ा खर्च का बोझ

‘बिजनेसलाइन’ की रि‍पोर्ट के मुताबिक, मुजफ्फर अहमद ने कहा कि इस बार हालात और मुश्किल हो गए हैं. हमारे इलाके में सिंचाई की नहरें सूखने लगी हैं और हमें बुवाई से पहले ही पंप लगाकर पानी निकालना पड़ रहा है. पहले इतनी जल्दी सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती थी, लेकिन इस बार पानी की कमी ने खेती को जोखिम में डाल दिया है.

बारिश की कमी ने बढ़ाई नई चुनौती

जहां किसान इस सीजन में नई उम्मीदों के साथ खेत तैयार कर रहे हैं, वहीं इस बार मौसम ने फिर चिंता बढ़ा दी है. एक ओर बाढ़ के घाव ताजा हैं, दूसरी ओर सामान्य से कम बारिश ने हालात को और मुश्किल बना दिया है. सिंचाई के पारंपरिक स्रोत सूखने लगे हैं, जिससे किसानों को समय से पहले ही खेतों में पानी पहुंचाने के लिए वैकल्पिक उपाय करने पड़ रहे हैं.

इस साल 1 मार्च के बाद से जम्मू-कश्मीर में बारिश में करीब 26 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है. घाटी के प्रमुख धान उत्पादक जिलों में यह कमी और ज्यादा है. कुलगाम में सबसे ज्यादा करीब 53 प्रतिशत बारिश की कमी रही है, जबकि अनंतनाग में 46 प्रतिशत और बडगाम में 40 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई है. ये सभी जिले धान उत्पादन के लिहाज से बेहद अहम माने जाते हैं.

दूसरे किसानों को भी नुकसान का डर

वहीं, अनंतनाग जिले के किसान अली मोहम्मद ने कहा कि पिछले साल की बाढ़ ने उन्हें भारी नुकसान पहुंचाया था. उन्होंने बताया, "हम अपनी लागत भी नहीं निकाल पाए क्योंकि पूरी फसल खराब हो गई थी." वह आशंका जताते हैं कि अगर इस बार भी बारिश की कमी बनी रही और नहरें सूखी रहीं, तो धान की फसल फिर संकट में पड़ सकती है.

किसानों का कहना है कि लगातार बदलते मौसम और पानी की कमी के चलते खेती का पारंपरिक ढांचा टूट रहा है. पहले ही कई किसान धान की जगह सेब की खेती की ओर रुख कर चुके हैं. अब पानी की बढ़ती किल्लत इस बदलाव को और तेज कर सकती है. इससे क्षेत्र में खाद्य फसलों का रकबा घटने का खतरा भी बढ़ रहा है.

धान का रकबा लगातार सिमट रहा है

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, कश्मीर में 2012 में धान की खेती करीब 1.62 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में होती थी. लेकिन 2023 तक यह घटकर करीब 1.29 लाख हेक्टेयर रह गई है. यानी करीब 33 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में कमी दर्ज की गई है. यह गिरावट कृषि क्षेत्र में आ रहे बड़े बदलाव की ओर संकेत करती है.

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सिंचाई व्यवस्था को मजबूत नहीं किया गया और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों का समाधान नहीं निकाला गया तो धान की खेती पर संकट और गहरा सकता है. बार-बार आने वाली प्राकृतिक आपदाएं और पानी की कमी किसानों को पारंपरिक खेती से दूर कर सकती हैं, जिसका असर पूरे क्षेत्र की खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है.

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