धान सीजन से पहले पंजाब सरकार पर बड़ा दबाव, बिजली खपत करेगी नया धमाका

धान सीजन से पहले पंजाब सरकार पर बड़ा दबाव, बिजली खपत करेगी नया धमाका

पंजाब में 1 जून से शुरू होने वाले धान सीजन के साथ बिजली की मांग रिकॉर्ड 18 हजार मेगावॉट तक पहुंच सकती है. बढ़ती गर्मी, कमजोर मानसून और लाखों ट्यूबवेल के कारण बिजली और पानी दोनों पर दबाव बढ़ेगा. चुनाव से पहले सरकार किसानों को निर्बाध बिजली देने की तैयारी में जुटी है, लेकिन भूजल गिरावट चिंता बढ़ा रही है.

पंजाब में बिजली खपत करेगी नया धमाकापंजाब में बिजली खपत करेगी नया धमाका
क‍िसान तक
  • Noida,
  • May 10, 2026,
  • Updated May 10, 2026, 11:16 AM IST

पंजाब में धान की खेती का सीजन शुरू होने वाला है और इसके साथ ही राज्य में बिजली की मांग भी तेजी से बढ़ने की उम्मीद है. इस बार अनुमान लगाया जा रहा है कि धान सीजन के दौरान बिजली की मांग 18 हजार मेगावॉट के पार पहुंच सकती है. यह अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा होगा. पिछले साल धान सीजन में बिजली की अधिकतम मांग करीब 17,200 मेगावॉट तक पहुंची थी.

इस बार स्थिति इसलिए भी ज्यादा अहम मानी जा रही है क्योंकि अगले साल पंजाब में विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में मौजूदा सरकार किसी भी हालत में बिजली कटौती या किसानों की नाराजगी नहीं चाहती. सरकार और बिजली विभाग दोनों इस सीजन को बिना किसी परेशानी के पूरा कराने की तैयारी में जुटे हुए हैं.

1 जून से शुरू होगी धान की बुवाई

पंजाब में हर साल जून की शुरुआत से धान की खेती शुरू होती है. इस बार भी सरकार ने 1 जून से जोन के हिसाब से धान की रोपाई की अनुमति दी है. राज्य में करीब 30 लाख हेक्टेयर जमीन पर धान की खेती होती है. धान की फसल को सबसे ज्यादा पानी की जरूरत होती है और इसके लिए लाखों ट्यूबवेल लगातार चलते हैं.

राज्य में करीब 13.94 लाख ट्यूबवेल हैं, जो खेतों की सिंचाई के लिए जमीन से भारी मात्रा में पानी निकालते हैं. इनमें से ज्यादातर ट्यूबवेल उन जिलों में हैं जहां पानी का स्तर पहले से काफी नीचे जा चुका है. इसके बावजूद धान की खेती का समय हर साल जल्दी शुरू कर दिया जाता है.

विशेषज्ञ लंबे समय से सलाह दे रहे हैं कि धान की बुवाई जून के आखिर में शुरू होनी चाहिए, क्योंकि उस समय मॉनसून करीब होता है और बारिश से सिंचाई का दबाव कम हो सकता है. लेकिन किसान और सरकार दोनों जल्दी बुवाई को ही प्राथमिकता देते हैं.

गर्मी और कमजोर मॉनसून बढ़ाएंगे मुश्किल

इस साल मौसम भी पंजाब के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है. मौसम विभाग के अनुमान के मुताबिक इस बार हीटवेव यानी लू वाले दिन पिछले साल से ज्यादा हो सकते हैं. साथ ही मॉनसून भी सामान्य से कमजोर रहने की संभावना है. ऐसे में किसानों को ज्यादा सिंचाई करनी पड़ेगी और बिजली की मांग और बढ़ सकती है.

पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (PSPCL) किसानों को रोजाना आठ घंटे बिजली देने की तैयारी कर रहा है. लेकिन इतनी बड़ी मांग को पूरा करना आसान नहीं होगा. अप्रैल महीने में ही राज्य की बिजली मांग 12 हजार मेगावॉट के पार पहुंच चुकी थी, जो पिछले साल अप्रैल से करीब 800 मेगावॉट ज्यादा थी.

बाहर से खरीदनी पड़ेगी बिजली

पंजाब अपनी जरूरत की पूरी बिजली खुद पैदा नहीं कर पाता. राज्य में करीब 6,500 मेगावॉट बिजली का उत्पादन होता है. बाकी बिजली दूसरे राज्यों और केंद्र के पावर ग्रिड से लेनी पड़ती है.

जानकारों के मुताबिक पंजाब इस बार 10,500 मेगावॉट से ज्यादा बिजली बाहर से खरीद सकता है. इसके अलावा बैंकिंग व्यवस्था, केंद्र के पावर प्लांट्स और दिन में सस्ती सोलर बिजली का इस्तेमाल करके मांग पूरी करने की कोशिश की जाएगी.

बताया जा रहा है कि इस धान सीजन में 2,000 मिलियन यूनिट से ज्यादा बिजली की अतिरिक्त खरीद करनी पड़ सकती है. सिर्फ खेती के लिए ही करीब 16,000 मिलियन यूनिट बिजली खर्च होने का अनुमान है.

हर हफ्ते निकल रहा अरबों लीटर पानी

धान की खेती का सबसे बड़ा असर पंजाब के भूजल पर पड़ रहा है. एक ट्यूबवेल हर हफ्ते करीब 30 लाख लीटर पानी जमीन से निकालता है. अगर पूरे राज्य के ट्यूबवेल का हिसाब लगाया जाए तो हर हफ्ते करीब 4,385 अरब लीटर पानी जमीन से बाहर निकाला जा रहा है.

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को दी गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर धान की रोपाई सिर्फ एक हफ्ते के लिए टाल दी जाए, तो पंजाब की 3 करोड़ आबादी के लिए साढ़े तीन साल तक पानी बचाया जा सकता है.

इन जिलों में सबसे ज्यादा खतरा

लुधियाना, गुरदासपुर, अमृतसर और संगरूर जैसे जिलों में सबसे ज्यादा ट्यूबवेल हैं. इन इलाकों में भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है. कई जगह किसानों को गहरे पानी तक पहुंचने के लिए ज्यादा ताकत वाले मोटर लगाने पड़ रहे हैं. बरनाला और संगरूर में किसान 17 बीएचपी मोटर का इस्तेमाल कर रहे हैं, ताकि जमीन के अंदर से पानी निकाला जा सके.

धान का यह सीजन पंजाब के लिए सिर्फ खेती या बिजली की चुनौती नहीं है, बल्कि पानी बचाने और भविष्य को सुरक्षित रखने की भी बड़ी परीक्षा बनता जा रहा है.

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