गांव के गुड़ का ग्लोबल जलवा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में फूंकी नई जान

गांव के गुड़ का ग्लोबल जलवा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में फूंकी नई जान

भारतीय गुड़ आज दुनिया भर में अपनी मिठास का डंका बजा रहा है। वैश्विक बाज़ार में 70 फीसद से अधिक की हिस्सेदारी के साथ इसका निर्यात पिछले एक दशक में 106% से भी ज़्यादा बढ़ा है, जिससे इंडोनेशिया, अमेरिका और यूएई जैसे बड़े देश इसके मुरीद हो चुके हैं। सेहत के प्रति जागरूकता के कारण घरेलू बाज़ार में भी चीनी के मुक़ाबले गुड़ की मांग तेज़ी से बढ़ी है.केमिकल से दूर, प्राकृतिक उत्पाद को जीआई टैग और सरकारी योजनाओं का भी भरपूर साथ मिल रहा है. सही मायने में यह बढ़ता उद्योग लाखों ग्रामीणों को स्थानीय स्तर पर रोज़गार देकर हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई जान फूंक रहा है.

 गुड़ का बढ़ता बाज़ार औऱ निर्यात में इज़ाफ़ा , AI image गुड़ का बढ़ता बाज़ार औऱ निर्यात में इज़ाफ़ा , AI image
जेपी स‍िंह
  • नई दिल्ली,
  • Jun 28, 2026,
  • Updated Jun 28, 2026, 1:57 PM IST

गुड़ सिर्फ़ एक खाद्य पदार्थ या मीठी चीज़ नहीं है, बल्कि इसका हमारी संस्कृति, खान-पान और इतिहाससे बहुत गहरा ताल्लुक है. ऐतिहासिक  साक्ष्यों के अनुसार, गुड़ पूरी तरह से एक स्वदेशी भारतीय उत्पाद है, जिसकी कहानी गन्ने की खेती के प्राचीन इतिहास के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती है. इसी समृद्ध विरासत की बदौलत भारत आज दुनिया भर में गुड़ उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है. वैश्विक स्तर के कुल उत्पादन में अकेले भारत की हिस्सेदारी 70% से भी ज़्यादा है, जो इसे मिठास के मामले में दुनिया का सरताज़ बनाती है.

हमारे ग्रामीण इलाक़ों में यह सिर्फ़ एक पारंपरिक व्यवसाय नहीं, बल्कि एक बेहद अहम कृषि-आधारित उद्योग का रूप ले चुका है. आंकड़ों के लिहाज़ से देखें, तो देश के कुल गन्ना उत्पादन का करीब 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा सीधे गुड़ और खांडसारी बनाने में इस्तेमाल होता है. यह पूरा सेक्टर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए रीढ़ की हड्डी की तरह काम करता है, क्योंकि यह सीधे तौर पर लगभग 25 लाख लोगों की रोज़ी-रोटी को संभाल रहा है.

इस उद्योग की सबसे बड़ी ख़ासियत इसका विकेंद्रीकृत होना है. गुड़ बनाने की इकाइयां जिन्हें स्थानीय भाषा में कोल्हू या क्रेशर कहते हैं) सीधे खेतों के पास ही लगाई जाती हैं, जिससे किसानों का ट्रांसपोर्ट का ख़र्च बच जाता है. लघु और कुटीर उद्योगों के रूप में फैले इस नेटवर्क ने छोटे और सीमांत किसानों के भीतर उद्यमिता को ज़िंदा रखा है. कम लागत में ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए यह उद्योग एक बेहतरीन और कामयाब ज़रिया साबित हो रहा है.

घरेलू बाज़ार से ग्लोबल मार्केट तक

भारत का गुड़ उद्योग अब सिर्फ़ घरेलू बाज़ारों तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भी इसकी मांग में ज़बर्दस्त इज़ाफ़ा हुआ है. पिछले एक दशक 2015-16 से 2024-25में गुड़ के निर्यात की क़ीमत में 106.5% की भारी बढ़त देखी गई है. जहां 2015-16 में हमारा निर्यात 197 मिलियन अमेरिकी डॉलर था, वहीं 2024-25 तक यह बढ़कर 406.8 मिलियन डॉलर पहुँच गया, जो वैश्विक बाज़ार में भारतीय गुड़ की बढ़ती साख का पुख़्ता सबूत है.

हालिया आंकड़ों की बात करें, तो अप्रैल 2025  जनवरी 2026 के दौरान निर्यात 450.1 मीट्रिक टन तक पहुंच चुका है, जिसकी कीमत 384.4 मिलियन अमेरिकी डॉलर है. आज इंडोनेशिया, अमेरिका, यूएई नाइजीरिया और नेपाल जैसे मुल्क इसके सबसे बड़े ख़रीदार हैं. दूसरी तरफ, घरेलू मोर्चे पर भी सेहत के प्रति जागरूकता बढ़ने से लोग रिफाइंड चीनी छोड़ गुड़ की मिठास की तरफ लौट रहे हैं. यही वजह है कि घरेलू बाज़ार में गुड़ और शहद की बिक्री में 15 से 20 प्रतिशत की सालाना चक्रवृद्धि दर दर्ज की जा रही है.

चीनी के मुक़ाबले , गुड़ सुपरहिट 

आज के दौर में गुड़ को केवल पारंपरिक मिठाई नहीं, बल्कि एक आधुनिक 'सुपरफ़ूड' माना जाता है. सफ़ेद रिफाइंड चीनी के मुक़ाबले यह सेहत के लिए बेहद फ़ायदेमंदहै. दरअसल, चीनी को केमिकल और अत्यधिक तापमान पर रिफ़ाइन करके बनाया जाता है, जिससे उसके पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं. इसके उलट, गुड़ को बिना किसी केमिकल के, गन्ने के रस को सीधे कढ़ाए में खौलाकर  करके प्राकृतिक रूप से तैयार किया जाता है. यही वजह है कि इसे 'मेडिसनल शुगर  भी कहते हैं और इसकी तुलना सीधे शहद से की जाती है.

गुड़ में गन्ने के रस के सभी प्राकृतिक खनिज और सूक्ष्म पोषक तत्व  पूरी तरह महफ़ूज़ रहते हैं.एकअच्छी गुणवत्ता वाले गुड़ में 70% से अधिक सुक्रोज़ के साथ-साथ ग्लूकोज़, फ्रक्टोज़ और लगभग 5% ज़रूरी खनिज होते हैं. इसमें आयरन की भरपूर मात्रा इसमें प्रति 100 ग्राम में 10 से 13 मिलीग्रामपाई जाती है, जो शरीर में हीमोग्लोबिन बढ़ाकर ख़ून की कमीको दूर करने में बेहद मददगार है.

वैल्यू एडिशन की कामयाब मिसालें

गुड़ का यह बढ़ता कारोबार भारत के ग्रामीण इलाक़ों की तक़दीर बदल रहा है. इसकी पहली शानदार मिसाल तमिलनाडु सरकार का पोषण कार्यक्रम है. यहाँ बच्चों को दिए जाने वाले पूरक आहार  में करीब 27% मात्रा गुड़ की होती है. नीति आयोग के मुताबिक, इस योजना से 32.75 लाख लाभार्थियों को पोषण मिल रहा है. सबसे ख़ास बात यह है कि इसे चलाने वाली 25 को-ऑपरेटिव सोसायटियाँ पूरी तरह से ग्रामीण, विधवा और आर्थिक रूप से कमज़ोर महिलाओं द्वारा संचालित हैं.

दूसरी मिसाल तिरुनेलवेली के प्रगतिशील किसान एंथोनीसामी हैं. उन्होंने जैविक तरीके से गन्ने की खेती कर 'ऑर्गेनिक गुड़ पाउडर' बनाना शुरू किया. जहाँ आम गुड़ 50 रूपये प्रति किलो बिकता है, वहीं उनका ऑर्गेनिक पाउडर 75 रूपये प्रति किलो की दर से बिकता है, जबकि दोनों की लागत सिर्फ ₹30 ही आती है.वल्यू एडिसन के इसी गणित से उन्होंने अपने बिज़नेस को बुलंदियों पर पहुंचाया है. यह उद्योग स्थानीय स्तर पर रोज़गार देकर शहरों की तरफ होने वाले पलायन को रोक रहा है.

सरकारी साथ और जीआई टैग

भारत सरकार भी इस सेक्टर को आधुनिक बनाने के लिए पूरी मजबूती से जुटी हुई है.PMKSY और PMFME योजना के ज़रिए हज़ारों माइक्रो-फ़ूड प्रोसेसिंग यूनिट्स को करोड़ों रुपये की सब्सिडी और तकनीकी मदद दी जा रही है. इसके साथ ही 'वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट' के तहत 19 ज़िलों में गुड़ को ख़ास पहचान दी गई है. वहीं, कोल्हापुरी गुड़ और मुज़फ्फरनगर के गुड़ जैसी मशहूर वैरायटीज़ को जीआई टैग (GI Tag) मिलने से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में इनकी साख  और क़ीमत दोनों बढ़ी हैं.बेहतर पैकेजिंग और सरकारी सहयोग के दम पर भारत का गुड़ उद्योग आने वाले वक़्त में ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनने के लिए तैयार है.

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