Cotton Import: एक तरफ कपास का‍ंति मिशन, दूसरी ओर जीरो ड्यूटी पर रिकॉर्ड आयात... सरकारी नीति का किसानों पर बुरा असर

Cotton Import: एक तरफ कपास का‍ंति मिशन, दूसरी ओर जीरो ड्यूटी पर रिकॉर्ड आयात... सरकारी नीति का किसानों पर बुरा असर

Cotton Import: देश में एक ओर सरकार 5659 करोड़ रुपये के कपास कांति मिशन के जरिए उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने का लक्ष्य लेकर चल रही है, वहीं दूसरी ओर रिकॉर्ड स्तर पर ड्यूटी फ्री कपास आयात से किसानों की चिंता बढ़ गई है. अक्टूबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच 41.95 लाख गांठ कपास का आयात हो चुका है, जो पिछले पूरे सीजन से भी अधिक है. ऐसे में नई फसल आने के समय घरेलू बाजार में किसानों को बेहतर दाम मिलने पर सवाल खड़े हो रहे हैं.

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प्रतीक जैन
  • Noida,
  • Jul 03, 2026,
  • Updated Jul 03, 2026, 5:40 PM IST

देश में इस समय कपास को लेकर अजीब-सी दुविधा दिखाई दे रही है. एक ओर सरकार 5659.22 करोड़ रुपये के कपास कांति मिशन के जरिए उत्पादकता-उत्‍पादन बढ़ाने, किसानों की आय में सुधार और भारत को बेहतर क्‍वालिटी वाले कपास में आत्मनिर्भर बनाने की बात कर रही है. दूसरी ओर, देश में रिकॉर्ड स्तर पर विदेशी कपास का आयात हो रहा है, वह भी ऐसे समय जब खरीफ सीजन में कपास की बुवाई पिछले साल की तुलना में काफी पीछे चल रही है. यही विरोधाभास अब कपास उत्‍पादन में आत्‍मनिर्भरता को लेकर बड़ा सवाल बनकर उभर रहा है. अगर सरकार का उद्देश्य देश में कपास उत्पादन बढ़ाना, किसानों की आय मजबूत करना और आयात पर निर्भरता घटाना है तो फिर लगातार ड्यूटी फ्री आयात को बढ़ावा देने की जरूरत क्यों पड़ रही है?

7 महीने में ही टूटा आयात का रिकॉर्ड

कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CAI) के अनुसार, अक्टूबर 2025 से अप्रैल 2026 यानी 7 महीनों में ही भारत में 41,94,547 गांठ (170 किलोग्राम प्रति गांठ) कपास का आयात हुआ है. यह करीब 7.13 लाख टन के बराबर है. यह मात्रा पूरे 2024-25 सीजन के 41,39,933 गांठ आयात से भी अधिक है. इससे पहले 2023-24 में 15.20 लाख गांठ, 2022-23 में 14.60 लाख गांठ और 2021-22 में 21.13 लाख गांठ कपास आयात हुआ था. यानी मौजूदा सीजन में सिर्फ सात महीने में ही पुराने सभी रिकॉर्ड टूट चुके हैं. व्यापार जगत का अनुमान है कि सितंबर तक यह आयात 60 से 65 लाख गांठ तक पहुंच सकता है.

ड्यूटी फ्री इंपोर्ट ने बिगाड़ा किसानों का खेल

सरकार ने पहले अगस्त से दिसंबर 2025 के बीच कपास के ड्यूटी फ्री आयात की अनुमति दी थी. इसके बाद 1 जून 2026 से 31 अक्टूबर 2026 तक कपास पर लगने वाली 11 प्रतिशत आयात शुल्क को भी शून्य कर दिया. यानी जिस समय देश में नई फसल की खेती चल रही है, उसी दौरान विदेशी कपास के लिए भारतीय बाजार के दरवाजे और ज्यादा खोल दिए गए हैं. इससे आयात की रफ्तार और तेज होने की आशंका है.

पिछले साल भी सस्‍ते विदेशी कपास के चलते किसानों को घरेलू बाजार में उपज का एमएसपी भी हासिल नहीं हो पा रहा था. वहीं, अब फिर सरकार इस कदम को दोहरा रही है. इस नीत‍ि का सबसे ज्‍यादा और बुरा असर भी छोटे किसानों पर पड़ता है, जो अपनी जरूरतों के चलते अक्‍टूबर से जनवरी के बीच बाजार में अपनी फसल को बेचने के लिए मजबूर होते हैं. इस दौरान ही दाम में मुख्‍य गिरावट देखी जाती है. इसके बाद बाजार में ज्‍यादातर बड़ी जोत वाले किसान और व्‍यापारी ही फसल की बि‍क्री करते हैं.

खेती घट रही, आयात बढ़ रहा

केंद्रीय कृषि मंत्रालय के 25 जून 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, देश में कपास की बुवाई 29.66 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि तक 45.36 लाख हेक्टेयर में बुवाई हो चुकी थी. यानी अभी कपास बुवाई 15.70 लाख हेक्टेयर पीछे चल रही है. हालांकि, इस साल बुवाई में गिरावट के पीछे एक बड़ा कारण अल नीनो के असर से कमजोर हुए मॉनसून को भी माना जा रहा है, क्‍योंकि जून महीने में ज्‍यादातर प्रमुख कपास उत्‍पादक इलाकों में बुवाई के लिहाज से पर्याप्‍त बारिश नहीं हुई.

वहीं, बुवाई का यह अंतर इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत पहले से ही उत्पादकता की चुनौती से जूझ रहा है. देश में दुनिया का सबसे बड़ा कपास रकबा होने के बावजूद औसत उत्पादकता केवल 437 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, जबकि वैश्विक औसत इससे काफी ज्‍यादा है. 2024-25 में कपास की बुवाई 114.47 लाख हेक्टेयर में दर्ज की गई थी. ऐसे में अगर रकबा घटता है और बाजार विदेशी कपास से भर जाता है, तो घरेलू उत्पादन बढ़ाने का लक्ष्य और कठिन हो सकता है.

उत्पादन और खपत का गणित

सरकारी आंकड़ो के अनुसार, भारत हर साल औसतन 300 से 330 लाख गांठ कपास का उत्पादन करता है और वैश्विक उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी लगभग 20 प्रतिशत है. वहीं, 2024-25 के दौरान यहां उत्पादन 294.25 लाख गांठ, जबकि घरेलू खपत 318 लाख गांठ आंकी गई थी. यानी मांग उत्पादन से अधिक है. यही अंतर आयात की जरूरत पैदा करता है. लेकिन सवाल यह है कि क्या इस अंतर को केवल आयात से भरना दीर्घकालिक समाधान है या फिर घरेलू उत्पादकता बढ़ाना ज्यादा टिकाऊ रास्ता हो सकता है.

सरकार का कपास कांति मिशन क्या कहता है?

इसी को देखते हुए हाल ही में केंद्र सरकार ने कपास कांति मिशन को मंजूरी दी है. 2026 से 2031 तक चलने वाले इस मिशन पर 5659.22 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे और इसका लक्ष्य करीब 32 लाख कपास किसानों को लाभ पहुंचाना है. मिशन का उद्देश्य खेत से लेकर फाइबर, फैक्ट्री, फैशन और निर्यात तक पूरी कपास मूल्य श्रृंखला को मजबूत करना है. इसके तहत किसानों को नई उत्पादन तकनीक, बेहतर कृषि पद्धतियों और आधुनिक फाइबर की जानकारी दी जाएगी.

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय और वस्त्र मंत्रालय मिलकर 14 राज्यों के 140 जिलों में आधुनिक तकनीकों के प्रसार पर काम करेंगे. मिशन का लक्ष्य 2031 तक कपास की उत्पादकता 440 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़ाकर 755 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर करना और उत्पादन को 498 लाख गांठ तक पहुंचाना है.

मिशन के तहत कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान विभाग (DARE) को 555.05 करोड़ रुपये दिए जाएंगे, जिनसे 24 नई उच्च उत्पादकता, जलवायु-प्रतिरोधी और बेहतर क्‍वाल‍िटी वाली कपास किस्में विकसित की जाएंगी. इनमें कीट प्रतिरोध, बेहतर रेशा क्‍वालिटी, अधिक जिनिंग प्रतिशत, जीनोम एडिटिंग, ट्रांसजेनिक तकनीक, एक्स्ट्रा लॉन्ग स्टेपल और देसी कपास पर विशेष ध्यान दिया जाएगा.

किसानों को साथ लिए बिना कैसे होंगे कपास में आत्‍मनिर्भर?

सरकार एक ओर कह रही है कि देश में कपास की उत्पादकता बढ़ानी है, किसानों की आय बढ़ानी है और कपास क्षेत्र को मजबूत बनाना है. दूसरी ओर रिकॉर्ड स्तर पर ड्यूटी फ्री आयात की अनुमति भी दी जा रही है. ऐसे में नीतिगत स्तर पर सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि अगर आने वाले वर्षों में देश को कपास उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना लक्ष्य है, तो क्या लगातार बढ़ता ड्यूटी फ्री आयात उस लक्ष्य को कमजोर नहीं करेगा?

खासकर तब, जब नई घरेलू फसल अक्टूबर से बाजार में आने वाली होगी और उसी समय बड़ी मात्रा में आयातित कपास भी बाजार में उपलब्ध होगी. ऐसी स्थिति में किसानों को मिलने वाले दाम प्रभावित होने की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. कपास कांति मिशन की सफलता आखिकार सिर्फ नई किस्में विकसित करने या बजट आवंटित करने से तय नहीं होगी. उसकी वास्तविक परीक्षा तब होगी, जब देश के कपास किसान यह महसूस करें कि बढ़े हुए उत्पादन का उन्हें उचित बाजार और प्रतिस्पर्धी कीमत भी मिल रही है.

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