मौसम की मार के खिलाफ बड़ी ढाल, असम में महफूज हुआ जंगली चावल का अनोखा खजाना!

मौसम की मार के खिलाफ बड़ी ढाल, असम में महफूज हुआ जंगली चावल का अनोखा खजाना!

असम के सोनितपुर जिले के बोरजुली क्षेत्र को 'बायोडायवर्सिटी हेरिटेज साइट' घोषित कर जंगली चावल (Oryza rufipogon) की दुर्लभ प्रजातियों को संरक्षित करने की दिशा में बड़ी सफलता मिली है. NRAA, ICAR-NBPGR और असम स्टेट बायोडायवर्सिटी बोर्ड की संयुक्त पहल से यह अनोखा आनुवंशिक खजाना सुरक्षित हुआ है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इन जंगली चावल प्रजातियों के जीन्स भविष्य में जलवायु परिवर्तन, सूखा और प्रतिकूल मौसम का सामना करने वाली उच्च उत्पादक और पोषक फसल किस्मों के विकास में अहम भूमिका निभाएंगे. यह पहल भारत की खाद्य सुरक्षा और टिकाऊ कृषि को मजबूती देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है.

बासमती पछेती किस्मेंबासमती पछेती किस्में
क‍िसान तक
  • New Delhi,
  • Jul 02, 2026,
  • Updated Jul 02, 2026, 5:16 PM IST

भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के तहत आने वाली नेशनल रेनफेड एरिया अथॉरिटी (NRAA) ने असम में जंगली चावल की नस्लों को महफूज रखने के अपने मिशन में एक बहुत बड़ी कामयाबी हासिल की है. साल 2022 से चल रहे एक खास प्रोजेक्ट के तहत, असम के सोनितपुर जिले में मौजूद 'बोरजुली' नाम की जगह को अब नेशनल बायोडायवर्सिटी अथॉरिटी ने आधिकारिक तौर पर 'बायोडायवर्सिटी हेरिटेज साइट' यानी जैव विविधता विरासत स्थल घोषित कर दिया है. इस ऐतिहासिक फैसले के बाद साइंटिस्टों की एक खास टीम ने एनआरएए के चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (CEO) डॉ. चंद्र शेखर कुमार (IAS) से मुलाकात की और उन्हें इस मुहिम की तरक्की और अब तक के नतीजों की पूरी जानकारी दी. इस पूरे प्रोजेक्ट को कामयाब बनाने में नई दिल्ली के ICAR–नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज (ICAR-NBPGR) और असम स्टेट बायोडायवर्सिटी बोर्ड ने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया है.

मौसम की मार झेलेगी नई फसल

​इस खास कामयाबी के मौके पर डॉ. चंद्र शेखर कुमार ने रिसर्च टीम की जमकर हौसला अफजाई की और इस कदम को देश की खेतीबाड़ी के भविष्य के लिए मील का पत्थर बताया. उन्होंने साफ तौर पर कहा कि जंगली चावल (Oryza rufipogon) की ये किस्में मामूली नहीं हैं, बल्कि ये ऐसे कीमती जीन्स का खजाना हैं जिनकी मदद से आने वाले वक्त में मौसम की मार और क्लाइमेट चेंज को झेलने वाली फसलें तैयार की जा सकेंगी. इन कुदरती बीजों के जरिए हम ऐसी नई किस्में विकसित कर सकते हैं जो कम पानी या खराब मौसम में भी बंपर पैदावार देंगी और जिनमें भरपूर न्यूट्रिशन होगा. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हिंदुस्तान के अलग-अलग कोनों में मौजूद दूसरी फसलों की जंगली नस्लों को बचाने के लिए भी देशव्यापी स्तर पर ऐसे ही प्रोजेक्ट्स की सख्त जरूरत है.

​इन-सिटु कंजर्वेशन का मास्टरप्लान

​इस पूरी बातचीत और मीटिंग को मुमकिन बनाने में एनआरएए के डायरेक्टर  डॉ. पंकज कुमार शाह और वॉटरशेड मैनेजमेंट के टेक्निकल एक्सपर्ट डॉ. अनिल कुमार मिश्रा ने बेहद अहम रोल अदा किया. इस प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा मकसद जंगली चावल के कुदरती ठिकाने को बिना किसी नुकसान के उसी माहौल में बचाकर रखना था, जिसे  'इन-सिटु कंजर्वेशन' कहा जाता है. असम का यह इलाका हमेशा से अपनी कुदरती दौलत और उपजाऊ जमीनों के लिए मशहूर रहा है, और अब इसे कानूनी तौर पर महफूज कर दिए जाने से यहां की जमीन और इस नायाब पौधे की नस्ल को इंसानी दखलअंदाजी या अंधाधुंध शहरीकरण से पूरी तरह बचाया जा सकेगा.

आने वाली नस्लों के लिए अनमोल तोहफा

​यह बड़ा फैसला सिर्फ असम के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी भारतीय खेती के लिए एक ढाल की तरह काम करेगा, क्योंकि आज के वक्त में जब ग्लोबल वार्मिंग और सूखा जैसी परेशानियां तेजी से बढ़ रही हैं, तब ऐसे कुदरती बीज ही हमारी फूड सिक्योरिटी की सबसे बड़ी गारंटी हैं.आने वाले वक्त में इन सुरक्षित बीजों पर और ज्यादा रिसर्च की जाएगी ताकि किसानों को ऐसी मजबूत फसलें दी जा सकें जो हर तरह के बदलते मिजाज और मौसमी बदलावों का डटकर मुकाबला कर सकें. सरकार की इस पहल से न सिर्फ हमारे मुल्क की पारंपरिक खेती को एक नई ताकत मिलेगी, बल्कि कुदरत के इस अनमोल खजाने को हम अपनी आने वाली नस्लों के लिए भी पूरी हिफाजत के साथ रख पाएंगे.

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