
हर साल रबी सीजन में सरकार गेहूं की खरीद करती है. खरीद से पहले लक्ष्य तय किया जाता है. गेहूं खरीद के लिए भारी-भरकम और बड़े आंकड़े रखे जाते हैं. लेकिन हैरत की बात ये है कि सरकार खुद अपने ही तय किए गए लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाती है. ये कहानी किसी एक साल के गेहूं खरीद की नहीं है. बीते चार साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो सरकार के लक्ष्य और प्राप्ति के आंकड़ों का खुलासा हो जाता है. जबकि किसान इस इंतजार में है कि उसे मौका मिले तो वो न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर सरकार को गेहूं बेचे.
लेकिन खरीद के नियम ऐसे बना दिए गए हैं कि एमएसपी में ज्यादा पैसा मिलने के बाद भी किसान 100-200 रुपये प्रति क्विंटल कम में ओपन मार्केट में बेच रहे हैं. इस साल तो हालात और भी खराब हैं. गेहूं खरीद करने वाली एजेंसिया अभी भी लक्ष्य से दो करोड़ टन पीछे चल रही हैं. जबकि गोदामों में भी पहले से ही गेहूं भरा हुआ है. ऐसे में इस बार भी लक्ष्य पीछे छूटता हुआ दिखाई दे रहा है.
गेहूं की कटाई के साथ ही सरकार गेहूं खरीद के लक्ष्य तय कर देती हैं. गेहूं खरीद वाले सभी 11 राज्यों को उनके उत्पादन के हिसाब से लक्ष्य दे दिए जाते हैं. लेकिन जानकारों की मानें तो कई बार सरकार खुद गेहूं खरीद के लक्ष्यों को संशोधित भी करती है.
एमएसपी पर गेहूं बेचने के लिए किसानों को अपनी फसल मंडी में लानी होती है. और सरकार ने मंडी के लिए कुछ नियम बनाए हैं. पहला नियम तो यही है कि किसानों को अपना खुद का रजिस्ट्रेशन कराना होगा. साथ ही उस वाहन का भी रजिस्ट्रेशन कराना होगा जिसमे वो अपनी फसल लाएंगे. इसके साथ ही किसानों को अपनी फसल मंडी में लाने के लिए एक टाइम स्लॉट दिया जाएगा. उस टाइम स्लॉट पर किसान से गेहूं खरीदा जाएगा.
बहुत सारे ऐसे किसान हैं जिनके पास अपना कोई वाहन नहीं है. किराए के वाहन में उन्हें गेहूं मंडी ले जाना होता है. ऐसे में वो किस वाहन का रजिस्ट्रेशन कराएं. पता चला जिस वाहन का पहले रजिस्ट्रेशन कराया है वो मंडी आने के वक्त किराए पर मिला ही नहीं. दूसरा ये कि जब किसान गेहूं लेकर मंडी के गेट पर जाता है तो उसका बायोमीट्रिक होता है. अगर सर्वर सही काम कर रहा है तो वक्त से काम हो जाता है, नहीं तो इंतजार करो. इस इंतजार करने के चक्कर में किराए के वाहन का भाड़ा बढ़ता रहता है. वहीं जो टाइम स्लॉट मिला है वो भी सर्वर डाउन होने के चलते निकल जाता है.
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