हरियाणा में कपास की खेती पर संकट, 7 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंचा रकबा

हरियाणा में कपास की खेती पर संकट, 7 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंचा रकबा

कपास की खेती में लगातार आ रही गिरावट ने कृषि विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों की चिंता बढ़ा दी है. उनके अनुसार, कपास एक महत्वपूर्ण नकदी फसल है और धान की तुलना में कम पानी की जरूरत होने के कारण पर्यावरण के लिए भी बेहतर विकल्प मानी जाती है.

cotton custom duty waived till 31st october 2026cotton custom duty waived till 31st october 2026
क‍िसान तक
  • Noida,
  • Jun 06, 2026,
  • Updated Jun 06, 2026, 9:40 AM IST

हरियाणा में कपास की चमक लगातार फीकी पड़ती जा रही है. इस खरीफ सीजन में कपास का रकबा घटकर महज 2.82 लाख हेक्टेयर रह गया है, जो पिछले सात वर्षों का सबसे निचला स्तर है. कीटों के बढ़ते हमले, मौसम की मार और जलभराव से परेशान किसान अब कपास की जगह धान, बाजरा और दूसरी फसलों की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं. कभी कपास उत्पादन के गढ़ माने जाने वाले सिरसा, हिसार और फतेहाबाद जिलों में भी किसान इस फसल से दूरी बनाते नजर आ रहे हैं.

हरियाणा कृषि और किसान कल्याण विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में कपास की खेती का रकबा 50 फीसदी से अधिक और पिछले सात वर्षों में लगभग 70 प्रतिशत कम हो गया है. वहीं, नए सीजन में पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 28 फीसदी की भारी गिरावट दर्ज की गई है, जब लगभग 3.9 लाख हेक्टेयर में कपास की खेती की गई थी.

रकबे में गिरावट से चिंतित कृषि विशेषज्ञ

कपास की खेती में लगातार आ रही गिरावट ने कृषि विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों की चिंता बढ़ा दी है. उनके अनुसार, कपास एक महत्वपूर्ण नकदी फसल है और धान की तुलना में कम पानी की जरूरत होने के कारण पर्यावरण के लिए भी बेहतर विकल्प मानी जाती है. हालांकि, किसानों का कहना है कि बार-बार कीटों के हमले, भारी बारिश और खेतों में जलभराव की वजह से उन्हें लगातार नुकसान उठाना पड़ रहा है. ऐसे में कपास की खेती अब उनके लिए फायदे का सौदा नहीं रह गई है. कृषि विभाग के अधिकारियों ने भी माना है कि कपास की खेती को बढ़ावा देने के लिए किए गए प्रयास अब तक ज्यादा सफल नहीं हो पाए हैं.

कपास का रकबा घटकर पहुंचा 2.82 लाख हेक्टेयर

एक अधिकारी ने बताया कि 2019-20 में कपास की खेती लगभग आठ लाख हेक्टेयर में की गई थी, जो पिछले साल घटकर 3.9 लाख हेक्टेयर रह गई और फिर घटकर 2.82 लाख हेक्टेयर हो गई. हालांकि विभाग ने कपास की खेती को बढ़ावा देने के लिए एक विशेष विंग भी स्थापित किया, जिसका ध्यान सिरसा, फतेहाबाद, हिसार, भिवानी, चरखी दादरी, रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ जैसे प्रमुख कपास उत्पादक जिलों पर केंद्रित था. किसानों को सूक्ष्म पोषक तत्वों के समर्थन के लिए 2,000 रुपये प्रति एकड़ और देसी कपास की खेती के लिए 4,000 रुपये प्रति एकड़ का प्रोत्साहन भी दिया गया, लेकिन ये योजनाएं गिरते रुझान को रोकने में विफल रहीं.

क्या है खेती में गिरावट का मुख्य कारण

विशेषज्ञों का मानना ​​है कि इस गिरावट का मुख्य कारण बार-बार होने वाली फसल नुकसान है. कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक (कपास) डॉ. आत्मा राम गोदारा के अनुसार, अगस्त और सितंबर के दौरान भारी बारिश से हुए दीर्घकालिक नुकसान, 2025 में कई जिलों में आई बाढ़ जैसी स्थिति और गंभीर कीट हमलों, विशेष रूप से गुलाबी सुंडी के प्रकोप ने पैदावार को काफी कम कर दिया है और किसानों को कपास की खेती करने से हतोत्साहित किया है.

किसानों को दाम नहीं मिलने से हुई गिरावट

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (एचएयू) के कृषि वैज्ञानिक डॉ. विनय महला द्वारा किए गए एक अध्ययन में कपास उत्पादकों की आर्थिक बदहाली पर प्रकाश डाला गया है. रिपोर्ट में कपास की खेती की औसत लागत 40,024 रुपये प्रति एकड़ बताई गई है, जबकि उपज की बिक्री से प्राप्त आय मात्र 24,081 रुपये प्रति एकड़ है. उप-उत्पादों से होने वाली आय में 801 रुपये प्रति एकड़ की वृद्धि हुई है, जिससे किसानों को औसतन 15,142 रुपये प्रति एकड़ का नुकसान हो रहा है. डॉ. महला के अनुसार, हरियाणा में कपास के किसान 2017 से लगातार कीटों के हमलों और बीमारियों के कारण नुकसान का सामना कर रहे हैं. 

MORE NEWS

Read more!