डीएसआर तकनीक से धान की खेतीभारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार जून 2026 के शुरुआती दो हफ्तों में सामान्य से कम बारिश का पूर्वानुमान है. ऐसे सूखे जैसे हालातों से निपटने के लिए उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद (उपकार) ने यूपी के किसानों के लिए एक विशेष एडवाइजरी जारी की है. कम पानी में अच्छी पैदावार लेने के लिए इस बार पारंपरिक खेती को छोड़कर आधुनिक तकनीकों और वैकल्पिक फसलों को अपनाने की सख्त जरूरत है. इस साल कम बारिश की आशंका को देखते हुए वैज्ञानिकों ने पारंपरिक तरीके लेव लगाकर रोपाई के बजाय धान की सीधी बुआई (DSR) को प्राथमिकता देने की सलाह दी है.
सीधी बुआई दो तरीकों से की जा सकती है- पहला, 'ड्रम सीडर' तकनीक या छिटकवां विधि से, जिसमें अंकुरित बीजों को तैयार कीचड़युक्त खेत में बोया जाता है. दूसरा तरीका सीड ड्रिल मशीन का है, जिसमें बिना कीचड़ वाले सूखे खेत में सीधी बुआई होती है. ड्रम सीडर से बुआई मॉनसून शुरू होने से ठीक पहले जल्द से जल्द कर लेनी चाहिए ताकि पौधे समय पर स्थापित हो जाएं. इसके लिए बीज दर की बात करें, तो सीड ड्रिल मशीन से 15-20 किलोग्राम एकड़ हेक्टेयर बीज की जरूरत होती है. कम पानी में बेहतर उत्पादन के लिए डी.एस.आर. विधि एक अचूक हथियार है.
धान की खेती में सीधी बुआई (DSR) की कामयाबी सबसे ज्यादा इस बात पर निर्भर करती है कि आप अपने खेत की स्थिति के हिसाब से सही किस्म चुन रहे हैं या नहीं. जैसे ऊंचे क्षेत्रों के लिए कम समय 100 से 120 दिन में पकने वाली किस्में सबसे बेस्ट मानी जाती हैं, जबकि मध्यम सिंचित खेतों के लिए 120 से 135 दिन में तैयार होने वाली किस्में लगाना ज्यादा फायदेमंद रहता है. वहीं निचली भूमि या बाढ़ वाले इलाकों के लिए लंबी अवधि 130 से 145 दिन वाली किस्में सबसे सही होती हैं.
इस विधि में पारंपरिक रोपाई के मुकाबले खेतों में जंगली घास और खरपतवार की समस्या थोड़ी ज्यादा होती है. इससे निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने सलाह दी है कि बुआई के 20 दिन बाद खेत में बेनसल्फ्यूरान मिथाइल या मेटसल्फ्यूरान मिथाइल खरपतवारनाशी दवा का छिड़काव करें. अगर खेत में खरपतवार की 2 से 3 पत्तियां निकल आई हों, तो बिस्पारीबैक सोडियम दवा का इस्तेमाल करना सबसे बढ़िया रहता है.
कृषि विशेषज्ञो का कहना है जो किसान पूरी तरह से बारिश के भरोसे खेती करते हैं, उन्हें इस साल धान लगाने की जिद छोड़ देनी चाहिए. कम बारिश की वजह से धान की फसल सूख सकती है और भारी नुकसान हो सकता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि धान की जगह कम पानी में तैयार होने वाले 'श्री अन्न' जैसे सावां, कोदो, मक्का, उड़द, मूंग और तिल जैसी फसलों को प्राथमिकता दें.
सावां की बुआई के लिए टी-46, यू.पी.टी.-8, और कोदो के लिए जे.के.-6, जे.के.-2 जैसी उन्नत किस्मों के बीजों का इंतजाम करके 15 जून से बुआई शुरू कर दें. कोदो में बीज जनित रोग 'अरगट' से बचाव के लिए बोने से पहले बीजों को 20% नमक के घोल में डुबोकर खराब बीजों को अलग कर लें और साफ पानी से धोकर ही बोएं.
अरहर, मक्का और श्री अन्न की बुआई हमेशा 'कुंड और नाली विधि' से ही करें, जिससे बारिश के पानी की एक-एक बूंद का सही इस्तेमाल हो सके. सिंचित क्षेत्रों में अरहर की अगेती किस्म 'पारस' की बुआई जून के पहले हफ्ते में और अन्य किस्में जैसे पूसा 2018-4 की बुआई जून के दूसरे पखवाड़े में करें. बुआई से पहले थिरम या ट्राइकोडर्मा से बीजों का शोधन करना न भूलें.
वहीं गन्ने के किसानों को सलाह दी गई है कि वे खेत में नमी की स्थिति में फसल की तेज बढ़त के लिए नैनो यूरिया और नैनो डी.ए.पी. 2.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी का पत्तियों पर छिड़काव करें. गन्ने में हर 10 से 12 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहें और चोटी बेधक कीट दिखने पर ग्रसित पौधों को जमीन की सतह से काटकर नष्ट कर दें.
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