
जनवरी के आखिरी हफ्ते में उत्तर भारत के मौसम ने जो करवट ली है, उसने किसानों के चेहरे पर खुशी और चिंता दोनों एक साथ ला दी है. जिस तरह गरज-चमक के साथ दो तीन दिनों तक झमाझम बारिश हुई, उसने खेतों का पूरा माहौल बदल दिया है. गेहूं की खेती करने वाले किसानों के लिए तो यह कुदरत के किसी 'वरदान' से कम नहीं है. इस समय गेहूं की फसल में दाने बनने और बढ़वार की प्रक्रिया चल रही है, जिसके लिए प्राकृतिक नमी बहुत फायदेमंद होती है. इस पानी से गेहूं की पैदावार में अच्छी बढ़ोतरी देखने को मिलेगी. लेकिन दूसरी तरफ, यही बारिश आलू और सरसों उगाने वाले किसानों में चिंता बढ़ा दी है.
सरसों की फसल इस समय फूलों से लदी हुई है. तेज बारिश और हवाओं की वजह से ये नाजुक फूल झड़ सकते हैं, जिसका सीधा असर पैदावार पर पड़ेगा. वहीं, आलू के खेतों में ज्यादा नमी होना फसल के लिए खतरा है. ऐसे में जहां एक तरफ गेहूं की फसल लहलहा रही है, वहीं दूसरी तरफ सरसों और आलू की सुरक्षा अब किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है.
मेरठ स्थित केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान रीजनल सेंटर के हेड डॉ.आर.के. सिंह का कहना है कि वर्तमान में जिन इलाकों में 10 मिलीमीटर से अधिक बारिश हुई है, वहां किसानों को सबसे पहले अपने खेतों से पानी की निकासी का पुख्ता इंतजाम करना चाहिए. अगर खेतों में पानी जमा रहता है, तो मिट्टी के अंदर आलू के कंद का गलने या सड़ने का खतरा बढ़ जाता है, जिससे पूरी फसल बर्बाद हो सकती है.
इसके अलावा, जिन किसानों ने आलू की देर से बुवाई की है, फसल पूरी तरह तैयार हो चुकी है, आलू की खुदाई से पहले उसकी पत्तियां काट दी हैं, वे अभी खुदाई करने की जल्दबाजी न करें. गीली मिट्टी में खुदाई करने से आलू खराब हो सकते हैं और उन पर मिट्टी चिपकने से बाजार में दाम भी कम मिलता है. इसलिए, खेत की नमी सूखने तक धैर्य रखें और मौसम साफ होने का इंतजार करें.
बारिश के बाद होने वाली नमी और ठंडी हवाएं 'पछेती झुलसा' नामक घातक बीमारी के लिए सबसे ज्यादा मुफीद होती हैं. मेरठ स्थित केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान के रीजनल सेंटर के प्रधान वैज्ञानिक और पौध सुरक्षा विशेषज्ञ डॉ ध्रुव कुमार ने बताया कि आलू के किसानों के लिए वैज्ञानिकों ने सुरक्षा की एक पुख्ता रणनीति तैयार की है, जिसे अपनाकर आप अपनी फसल को 'पछेती झुलसा' जैसी घातक बीमारी से बचा सकते हैं.
सबसे पहले उन किसानों को ध्यान देने की जरूरत है जिनकी फसल अभी स्वस्थ है. अगर आपने अब तक किसी फफूंदनाशक का स्प्रे नहीं किया है, तो बचाव के तौर पर मैन्कोजेब या क्लोरोथेलॉनील जैसी दवा का 2.0 से 2.5 किलोग्राम मिश्रण 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव तुरंत करें. यह आपकी फसल के लिए एक 'सुरक्षा कवच' की तरह काम करेगा.
वहीं, अगर आलू के खेत में झुलसा रोग के लक्षण दिखने लगे हैं, तो आपको थोड़ी और असरदार दवाओं का सहारा लेना होगा. ऐसे में एमेक्ट्रोडीन+डाई मेथोमार्फ 2 मिली प्रति लीटर या फ्लुपिकोलाइड+प्रोपेमोकार्ब 3 मिली प्रति लीटर जैसे रसायनों का इस्तेमाल करें. छिड़काव करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि दवा का घोल पौधों के हर हिस्से, खासकर पत्तियों को अच्छी तरह भिगो दे.
डॉ ध्रुव ने सुझाव दिया कि एक ही दवा का बार-बार इस्तेमाल न करें, बल्कि बदल-बदल कर दवाओं का छिड़काव करें. आमतौर पर 10 दिनों के अंतराल पर स्प्रे दोहराना चाहिए, लेकिन अगर मौसम ज्यादा खराब हो या बीमारी तेजी से बढ़ रही हो, तो इस अंतराल को कम भी किया जा सकता है. चूंकि अभी बारिश का मौसम है, इसलिए दवा के साथ 'स्टिकर जरूर मिलाएं. इससे दवा पत्तियों पर अच्छी तरह चिपक जाएगी और बारिश में घुलने का डर नहीं रहेगा.
आईएआरआई के प्रधान वैज्ञानिक राजीव कुमार सिंह ने बताया है कि सरसों के लिए यह बारिश मिली-जुली रही है. अच्छी बात यह है कि बारिश से हानिकारक माहू कीट धुल गए हैं, जिससे किसानों को फायदा होगा. हालांकि, अगर तेज बारिश जारी रही तो फूल झड़ सकते हैं, जिससे उत्पादन घटेगा. किसानों को सलाह है कि अभी कुछ दिनों तक फसल में न तो सिंचाई करें और न ही कोई छिड़काव, क्योंकि गीली मिट्टी में तेज हवा चलने पर सरसों के पौधे गिर सकते हैं.
वैज्ञानिक ने स्पष्ट किया है कि जब तक आसमान साफ न हो जाए, किसी भी खड़ी फसल में सिंचाई या खाद का छिड़काव न करें. चने की फसल में फली छेदक कीट की निगरानी के लिए खेतों में 'फेरोमोन ट्रैप' लगाएं और पक्षियों के बैठने के लिए 'T' आकार के बसेरे बनाएं. सरसों में चेपा कीट की निगरानी जारी रखें और शुरुआत में ही प्रभावित हिस्सों को काटकर नष्ट कर दें ताकि संक्रमण आगे न फैले.