
बीड जिले सहित पूरे मराठवाड़ा क्षेत्र में बारिश की लंबी खींच ने किसानों के सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है. पानी के अभाव में फसलें सूख रही हैं, जिससे अन्नदाताओं की मेहनत और पूंजी दोनों बर्बाद हो रही है. बीड तालुका के सालेगांव के किसान बालासाहेब गित्ते को अपनी डेढ़ एकड़ जमीन पर लगी टमाटर की खड़ी फसल को मजबूरी में खुद ही उखाड़कर फेंकना पड़ा है.
किसान बालासाहेब गित्ते ने बेहद उम्मीदों के साथ डेढ़ एकड़ में टमाटर की खेती की थी. पौधे खरीदने, मजदूरी, खेत की जुताई-बुवाई, फसल की बंधाई के लिए धागे (सुतली), बांस और तारों पर उन्होंने कुल दो से ढाई लाख रुपये का भारी-भरकम खर्च किया था. किसानों का कहना है कि अगर समय पर बारिश हो जाती, तो टमाटर की अच्छी फसल से उन्हें 5 से 6 लाख रुपये तक की आय हो सकती थी, लेकिन पानी न मिलने के कारण सारा निवेश डूब गया.
इस साल मराठवाड़ा में स्थिति यह है कि सब्जियों का कुल प्रोडक्शन पिछले साल के मुकाबले 80 से 90 फीसदी तक कम हुआ है. तापमान बढ़ने और बारिश न होने से मिट्टी में नमी खत्म हो चुकी है, जिससे फसलों की ग्रोथ रुक गई है और फलों-फूलों का साइज छोटा हो रहा है. इसके अलावा, क्लाइमेट चेंज की वजह से फसलों में बीमारियां बढ़ रही हैं, जिससे पेस्टीसाइड्स (कीटनाशकों) का खर्च और बढ़ गया है. जो किसान सब्जियों की खेती से लाखों कमाते थे, उनके लिए अब 40 से 50 हजार रुपये की बुनियादी लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है.
महाराष्ट्र सरकार द्वारा घोषित 5 हजार रुपये की मामूली मदद को लेकर किसानों में भारी नाराजगी है. किसानों का सवाल है कि इस छोटी सी राशि से वे अपना परिवार कैसे पालेंगे और दिवाली कैसे मनाएंगे? किसानों ने इसे 'जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा' बताया है. बीड जिले के किसानों ने सरकार से मांग की है कि स्थिति की गंभीरता को समझते हुए तत्काल प्रति हेक्टेयर 1 लाख रुपये की आर्थिक सहायता और फसल बीमा का लाभ दिया जाए.
महाराष्ट्र सरकार ने बीड जिले के कई तालुकों में आधिकारिक तौर पर सूखा घोषित कर दिया है. केंद्रीय टीम (सेंट्रल टीम) और स्थानीय प्रशासन ने मिलकर 7 लाख से ज्यादा किसानों की फसलों का 90 प्रतिशत से अधिक पंचनामा भी पूरा कर लिया है. हालांकि, कागजी प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद किसानों के खातों में वास्तविक मदद नहीं पहुंची है, जिससे उनका गुस्सा और चिंता दोनों बढ़ती जा रही है. ऐसे मुश्किल वक्त में कुछ किसान कम पानी वाली फसलों या ड्रिप इरिगेशन की ओर रुख कर रहे हैं, लेकिन जलस्त्रोत पूरी तरह सूख जाने के कारण उनके विकल्प भी सीमित होते जा रहे हैं.